- वैज्ञानिक और पारंपरिक उपचार का संगम, 200 वर्षों तक सुरक्षित रखने की पहल
उपचार प्रक्रिया के अंतर्गत वृक्ष पर औषधीय तत्वों के साथ नीम तेल का जैविक मिश्रण तैयार कर छिड़काव किया गया। विशेष बात यह रही कि इस उपचार में लगभग 1200 लीटर गंगा नदी का जल तथा त्रिवेणी संगम का पवित्र जल सम्मिलित किया गया, जिससे आध्यात्मिक पवित्रता और पर्यावरणीय शुद्धता दोनों का ध्यान रखा गया। वृक्ष की वर्तमान स्थिति पर जानकारी देते हुए डॉ. प्रशांत ने बताया कि पीपल की पत्तियाँ पूर्णतः पीली हो चुकी हैं, जो हरितहीनता और पोषक तत्वों की कमी का संकेत है। सामान्य पत्तियों की तुलना में इसमें स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है। यदि समय रहते उपचार नहीं किया गया तो भविष्य में वृक्ष के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों द्वारा नियमित अंतराल पर उपचार और छिड़काव जारी रखने का निर्णय लिया गया है, ताकि यह प्राचीन पीपल वृक्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए आस्था, संस्कृति और पर्यावरण चेतना का प्रतीक बना रहे।

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