इंदौर : जहाँ जंगल अब भी इलाज जानता है - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

इंदौर : जहाँ जंगल अब भी इलाज जानता है

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इंदौर (रजनीश के झा), 16 फरवरी। शहरों में सेहत की परिभाषा एक इलाज ही मोड़ ले चुकी है। हर दर्द की गोली है, हर समस्या की दवा, लेकिन राहत के साथ-साथ एक अजीब-सी थकान भी। हम ठीक तो जल्दी हो जाते हैं, लेकिन उतना ही जल्दी स्वस्थ नहीं हो पाते। शायद इसलिए क्योंकि हमने इलाज को शरीर तक सीमित कर दिया है और उस ज्ञान से दूर होते चले गए हैं, जो कभी प्रकृति, मौसम और अनुभव से जुड़ा हुआ था। लेकिन, यह ज्ञान पूरी तरह खोया नहीं है। धार, झाबुआ और अलीराजपुर जैसे जनजातीय इलाकों में आज भी जंगल सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि एक जीवित औषधालय है। यहाँ पेड़-पौधे नामों से नहीं, बल्कि अपने अद्वितीय गुणों से पहचाने जाते हैं। कौन-सी जड़ी कब तोड़ना है, किस मौसम में कौन-सा काढ़ा बनता है, कौन-सी पत्ती किस तकलीफ में काम आती है, यह सब किसी किताब में नहीं, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव में दर्ज है। यहाँ इलाज जल्दी से ज्यादा, सही होता है। शहर और इस ज्ञान के बीच की दूरी को पाटने आ रहा है 'जात्रा-2026'।


इंदौर में पहली बार, 20 से 22 फरवरी, 2026 तक ऐतिहासिक गांधी हॉल परिसर में आयोजित होने वाला यह तीन दिवसीय आयोजन आदिवासी संस्कृति के साथ-साथ उस जीवनदृष्टि को भी सामने लाएगा, जहाँ स्वास्थ्य प्रकृति से अलग नहीं है। जनजातीय सामाजिक सेवा समिति के तत्वावधान में होने वाले इस आयोजन में धार, झाबुआ और अलीराजपुर के जनजातीय क्षेत्रों की प्रमुख औषधियाँ और वनोपज विशेष रूप से प्रदर्शित की जाएँगी। शहर की जानी-मानी पब्लिक रिलेशन्स एजेंसी, पीआर 24x7 इस आयोजन की पीआर पार्टनर है। 21 फरवरी, 2026 को अमू काका बाबा न पोरिया फेम ओरिजनल गायक आनंदीलाल भावेल अपनी टीम के साथ लाइव प्रस्तुति देंगे। आयोजन में 100 से ज्यादा स्टॉल लगाए जाएँगे और संस्था ट्रायबल फाउंडेशन द्वारा 25 से ज्यादा पेंटिंग्स प्रदर्शित की जाएँगी। जनजातीय सामाजिक सेवा समिति के अध्यक्ष देवकीनंदन तिवारी ने बताया, "आदिवासी समाज का ज्ञान सिर्फ परंपरा नहीं, अनुभव की कमाई है। देश-दुनिया भले ही आधुनिक हो चली है, लेकिन जंगल, मौसम और जीवन को समझकर विकसित हुई औषधीय परंपरा को नाकारा नहीं जा सकता, जो कि आज भी उतनी ही उपयोगी है। 'जात्रा-2026' के माध्यम से हम चाहते हैं कि लोग इस ज्ञान को करीब से देखें, समझें, महसूस करें और सबसे जरुरी, इनका भरपूर लाभ लें, ताकि यह सिर्फ स्मृति बनकर न रह जाए।"


वहीं, समिति के कोषाध्यक्ष गिरीश चव्हाण ने बताया, "जनजातीय क्षेत्रों की वनोपज और औषधियाँ सिर्फ उत्पाद नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जहाँ मनुष्य प्रकृति के साथ तालमेल में जीता है। 'जात्रा-2026' उसी सोच को शहर तक पहुँचाने की कोशिश है, ताकि यह ज्ञान अगली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके। 'जात्रा-2026' में लगाए जाने वाले स्टॉल सिर्फ खरीदी-बिक्री के माध्यम ही नहीं होंगे, बल्कि संवाद के छोटे-छोटे केंद्र होंगे। यहाँ खड़े होकर लोग सवाल पूछ सकेंगे, सुन सकेंगे और समझ सकेंगे कि सेहत सिर्फ इलाज से नहीं, जीवनशैली से बनती है। यह आयोजन हमें याद दिलाएगा कि आदिवासी समाज आधुनिक शब्दों के बिना भी संतुलित जीवन जीता आ रहा है।" आयोजन में कला, लोकनृत्य और पारंपरिक व्यंजन तो होंगे ही, लेकिन औषधि और वनोपज का यह पक्ष ‘जात्रा-2026’ को और भी खास बनाता है। यह बताता है कि आदिवासी संस्कृति सिर्फ देखने का जरिया नहीं, बल्कि सीखने की विरासत है। एक ऐसी विरासत, जो आज के समय में और भी प्रासंगिक हो गई है। यह कोई साधारण प्रदर्शनी नहीं होगी। यहाँ वनोपज सिर्फ देखने या खरीदने की चीज़ नहीं होंगी, बल्कि उनके पीछे छुपा ज्ञान भी सामने आएगा। कौन-सी जड़ किस दर्द में उपयोगी है, कौन-सी छाल किस मौसम में ली जाती है, कौन-सा बीज शरीर को कैसे संतुलित करता है, इन सब बातों को जानने और समझने का अवसर मिलेगा। यह अनुभव उस भरोसे को दोबारा जगाएगा, जो कभी इंसान और प्रकृति के बीच हुआ करता था।


'जात्रा-2026' के अन्य प्रमुख आकर्षण होंगे:

* जनजातीय कलाकारों द्वारा कला एवं हस्तशिल्प प्रदर्शनी

* जनजातीय समाज के पारंपरिक व्यंजनों के विशेष स्टॉल

* विभिन्न अंचलों के जनजातीय नृत्य और लोक नृत्यों की प्रस्तुतियाँ

* जनजातीय जीवन और परंपरा को दर्शाती 'पिथोरा' आर्ट गैलरी

* जनजातीय पर्व भगोरिया पर आधारित फोटो प्रदर्शनी

* जनजातीय साहित्य और परिधानों के स्टॉल

दरअसल, 'जात्रा-2026' हमें यह एहसास कराता है कि सेहत का रास्ता हमेशा फार्मेसी से होकर नहीं जाता। कभी-कभी वह जंगल की पगडंडियों से होकर भी आता है। और यदि आप यह जानना चाहते हैं कि इलाज समझ से कैसे शुरू होता है, तो आपको इस अनुभव का हिस्सा बनना चाहिए।

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