वाराणसी : काशी में महाशिवरात्रि पर वैश्विक सनातन चेतना का अभिनव अध्याय - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

वाराणसी : काशी में महाशिवरात्रि पर वैश्विक सनातन चेतना का अभिनव अध्याय

  • जब देश-विदेश के तीर्थ एक साथ झुके विश्वनाथ के श्रीचरणों में, काशी बनी आध्यात्मिक एकता का विश्व केंद्र

Spritual-hub-kashi
वाराणसी (सुरेश गांधी). सनातन परंपरा में पर्व केवल अनुष्ठान नहीं होते, वे सांस्कृतिक आत्मा के जागरण का अवसर भी बनते हैं। इसी भावभूमि पर महाशिवरात्रि के परम पावन अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास द्वारा एक ऐसी अभिनव आध्यात्मिक पहल प्रारंभ की गई है, जिसने संपूर्ण सनातन समाज को वैश्विक एकात्मता के सूत्र में पिरोने का मार्ग प्रशस्त किया है। यह पहल केवल धार्मिक परंपरा का विस्तार नहीं, बल्कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” के शाश्वत भारतीय दर्शन को सजीव स्वरूप देने का प्रयास है। इस अनूठे आध्यात्मिक समन्वय के अंतर्गत देश-विदेश के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों, सिद्धपीठों, शक्तिपीठों तथा प्राचीन तीर्थस्थलों से भगवान श्री विश्वेश्वर महादेव के श्रीचरणों में पावन प्रसाद, पूजित वस्त्र, मंदिरों की पवित्र रज, जल तथा श्रद्धा-उपहार अर्पित किए जा रहे हैं। 14 फरवरी 2026 तक इस महाअभियान में कुल 62 मंदिरों से पावन भेंट प्राप्त हो चुकी है, जो सनातन संस्कृति की अखंडता और आध्यात्मिक समरसता का जीवंत प्रमाण बन रही है।


दक्षिण से उत्तर तक श्रद्धा का प्रवाह

दक्षिण भारत विशेषकर चेन्नई सहित तमिलनाडु के अनेक प्राचीन मंदिरों से श्रद्धालुओं ने भक्ति-भाव से पूजित प्रसाद और पवित्र सामग्री भेजी है। इन मंदिरों की भक्ति परंपरा और शिव उपासना की विरासत सदियों से भारतीय संस्कृति को सशक्त करती रही है। दक्षिण भारत की आध्यात्मिक ऊर्जा जब काशी के ज्योतिर्लिंग से जुड़ती है तो यह सांस्कृतिक विविधता में एकता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है। इसी क्रम में ब्रजभूमि स्थित श्री कृष्ण जन्मस्थान से भी श्रद्धापूर्वक पावन प्रसाद अर्पित किया गया। यह दृश्य उस सनातन भाव का प्रतीक है जिसमें कृष्ण और शिव, भक्ति और तत्त्वज्ञान, सभी एक ही आध्यात्मिक चेतना के रूप माने जाते हैं।


हिमालय से काशी तक आस्था का सेतु

आध्यात्मिक भारत का हिमालयी स्वरूप भी इस दिव्य आयोजन से जुड़ा है। जम्मू स्थित श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड तथा उत्तराखंड के दिव्य धाम श्री केदारनाथ से प्राप्त पावन भेंटों ने इस आयोजन की गरिमा को और अधिक ऊँचाई प्रदान की है। हिमालय की तपोभूमि और काशी की मोक्षभूमि का यह आध्यात्मिक संगम सनातन परंपरा की अखंड आध्यात्मिक धारा को रेखांकित करता है।


सीमाओं से परे सनातन चेतना

इस पहल का सबसे प्रेरणादायी पक्ष यह है कि इसकी गूंज भारत की सीमाओं से निकलकर वैश्विक मंच तक पहुँची है। दक्षिण-पूर्व एशिया के देश मलेसिया तथा द्वीपीय राष्ट्र श्री लंका के मंदिरों से प्राप्त प्रसाद और पूजित सामग्री यह प्रमाणित करती है कि सनातन संस्कृति केवल भारत की पहचान नहीं, बल्कि वैश्विक आध्यात्मिक चेतना का आधार है।


महानगरों और सांस्कृतिक राज्यों की सहभागिता

पश्चिम भारत के सांस्कृतिक नगर मुंबई के प्रसिद्ध गणपति मंदिरों तथा गुजरात के ऐतिहासिक तीर्थ द्वारकाधीश मंदिर से भी पावन भेंट प्राप्त हुई है। इसी प्रकार राजस्थान के सांस्कृतिक नगर उदयपुर स्थित नाथद्वारा धाम की सहभागिता ने इस आयोजन को राष्ट्रीय सांस्कृतिक उत्सव का स्वरूप प्रदान किया है।


काशी के स्थानीय देवालयों की विशेष भूमिका

इस आध्यात्मिक यज्ञ में स्वयं वाराणसी के अनेक प्राचीन मंदिरों ने भी अपनी सहभागिता दर्ज कराई है। काशी की परंपरा में प्रत्येक देवालय, प्रत्येक घाट और प्रत्येक कुंड आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। स्थानीय मंदिरों द्वारा अर्पित पूजित वस्त्र, पुष्पमालाएँ और पवित्र रज यह दर्शाती है कि काशी स्वयं एक जीवंत आध्यात्मिक ब्रह्मांड है।


आध्यात्मिकता से राष्ट्रीय एकात्मता तक

इस पहल का महत्व केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक एकता, पारिवारिक समरसता और आध्यात्मिक बंधुत्व की उस परंपरा को पुनर्जीवित करता है, जिसने सदियों से भारतीय समाज को जोड़े रखा है। जब विभिन्न राज्यों, भाषाओं और परंपराओं के तीर्थ एक ही आध्यात्मिक केंद्र पर एकत्रित होते हैं, तब राष्ट्र की सांस्कृतिक शक्ति और अधिक सुदृढ़ हो जाती है।


वैश्विक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में काशी

महाशिवरात्रि पर प्रारंभ की गई यह परंपरा काशी की आध्यात्मिक प्रतिष्ठा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान प्रदान कर रही है। यह आयोजन यह भी संकेत देता है कि आधुनिक युग में भी भारत अपनी आध्यात्मिक विरासत के माध्यम से विश्व को सांस्कृतिक नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता रखता है। निस्संदेह, यह अभिनव पहल केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सनातन संस्कृति के वैश्विक पुनर्जागरण का संकेत है। यह प्रयास विविध तीर्थस्थलों को एक आध्यात्मिक सूत्र में जोड़ते हुए भविष्य में सांस्कृतिक संवाद और धार्मिक सद्भाव का नया अध्याय रचने की दिशा में ऐतिहासिक एवं प्रेरणादायी कदम सिद्ध होगा।

कोई टिप्पणी नहीं: