- अदालत ने कहा—“जब तक मौत न हो, तब तक फंदे पर लटकाया जाए”
एक रात में खत्म हो गया हंसता-खेलता परिवार
यह हृदयविदारक घटना 29 अक्टूबर 2013 की रात करीब साढ़े नौ बजे की है, जब हमलावर लाठी-डंडों और लोहे की रॉड से लैस होकर मोहनलाल जायसवाल के घर में घुसा। उस रात घर की चौखट पर जो खून बिखरा, उसने एक पूरे परिवार की सांसें छीन लीं। वह रात आज भी चंदापुर के लोगों के जेहन में सिहरन पैदा कर देती है। लोहे की रॉड और लाठियों से लैस हमलावर ने मोहनलाल जायसवाल के घर में घुसकर ताबड़तोड़ हमला किया। देखते ही देखते घर का आंगन चीखों और खून से भर गया। इस हमले में मोहनलाल, उनकी पत्नी कुसुम देवी, बेटे प्रदीप उर्फ गोलू और बेटी पूजा की बेरहमी से हत्या कर दी गई, जबकि दूसरे बेटे संदीप ने गंभीर चोटों के बावजूद जिंदगी की जंग जीत ली।
जुए और शराब के विरोध ने ली चार जानें
पुलिस जांच में सामने आया कि इस खूनी वारदात की जड़ एक साधारण सामाजिक विरोध था। मोहनलाल अपने घर के पास जुआ खेलने, शराब पीने और मांसाहार बनाने का विरोध करते थे। यही बात आरोपी को नागवार गुजरती थी। शिकायत परिवार तक पहुंचने के बाद उसकी खुन्नस और गहरी हो गई। इसी रंजिश ने एक शांत गांव में खून की होली खेल दी। और पूरा परिवार उसकी हिंसा का शिकार बन गया।
बेटी की सूझबूझ से बची जान
हमले के दौरान घर में मौजूद छोटी बेटी आरती ने अदम्य साहस का परिचय दिया। चारों ओर चीख-पुकार और हिंसा के बीच उसने खुद को कमरे में बंद कर लिया और चारपाई के नीचे छिपकर अपने चाचा को फोन कर घटना की जानकारी दी। उसकी इस सूझबूझ ने न केवल उसकी जान बचाई, बल्कि पुलिस को समय पर सूचना भी मिल सकी। और पुलिस कार्रवाई की पहली कड़ी बनी। घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत फैल गई थी। पुलिस ने तत्काल मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की और छह दिन के भीतर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।
25 गवाह, पुख्ता सबूत और लंबी सुनवाई
इस मामले में अदालत के समक्ष 25 गवाहों के बयान दर्ज हुए और खून से सने कपड़ों सहित तमाम साक्ष्य पेश किए गए। लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद अदालत ने इसे ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मानते हुए मृत्युदंड का फैसला सुनाया।
खामोश घर ने सुनी इंसाफ की दस्तक
आज भी चंदापुर गांव का वह मकान खामोश खड़ा है, जो कभी हंसी और खुशियों से गुलजार था। वर्षों तक बंद दरवाजों के पीछे जैसे न्याय की प्रतीक्षा ठहरी रही। नवरात्र की सप्तमी पर आया यह फैसला उस सन्नाटे को चीरता हुआ इंसाफ की दस्तक बनकर सामने आया है।
समाज के लिए सख्त संदेश
यह फैसला सिर्फ एक अपराधी को सजा नहीं, बल्कि समाज को चेतावनी भी है कि छोटी-सी रंजिश जब हिंसा में बदलती है तो उसका परिणाम कितना विनाशकारी हो सकता है। साथ ही यह भी साबित हुआ कि न्याय भले ही देर से मिले, लेकिन उसकी आहट अंततः पीड़ितों तक पहुंचती जरूर है।
ऑपरेशन कनविक्शन की बड़ी कामयाबी
वाराणसी में 13 साल पुराने सनसनीखेज हत्याकांड में आखिरकार न्याय की मुहर लग गई। “ऑपरेशन कनविक्शन” अभियान के तहत कमिश्नरेट पुलिस की सशक्त पैरवी के चलते अदालत ने आरोपी को मृत्युदंड सुनाया है।
क्या है पूरा मामला
जनपद वाराणसी के थाना चोलापुर क्षेत्र में वर्ष 2013 में दर्ज हत्या के मामले (मु0अ0सं0 0315/2013) में लंबे समय से सुनवाई चल रही थी। इस मामले में हत्या, हत्या के प्रयास, लूट, साक्ष्य छिपाने जैसी गंभीर धाराएं (302, 307, 394, 411, 201 भादवि) लगी थीं।
अदालत का बड़ा फैसला
बुधवार को स्पेशल जज भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (यूपीएसईबी), वाराणसी की अदालत ने आरोपी रविन्द्र उर्फ राजू पटेल को दोषी मानते हुए…
मृत्युदंड (फांसी).
₹1,10,000 का अर्थदंड की सजा सुनाई
ऑपरेशन कनविक्शन का असर
प्रदेश में चल रहे “ऑपरेशन कनविक्शन” अभियान के तहत पुलिस आयुक्त मोहित अग्रवाल के निर्देशन में इस केस की लगातार मॉनिटरिंग की गई। मजबूत साक्ष्य, सटीक विवेचना और प्रभावी पैरवी ने इस फैसले में अहम भूमिका निभाई।
पुलिस और अभियोजन की संयुक्त मेहनत रंग लाई
कमिश्नरेट वाराणसी पुलिस और लोक अभियोजक की टीम ने केस को मजबूती से अदालत में पेश किया। साक्ष्यों की सटीक प्रस्तुति के चलते आरोपी को कठोर सजा दिलाई जा सकी।
क्यों है फैसला अहम
यह फैसला न सिर्फ पीड़ित परिवार के लिए न्याय है, बल्कि अपराधियों के लिए कड़ा संदेश भी— संगीन अपराध करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा. कानून की पकड़ से बच पाना अब मुश्किल है. वाराणसी पुलिस की यह सफलता “ऑपरेशन कनविक्शन” की प्रभावशीलता को साबित करती है। लंबे इंतजार के बाद मिला यह न्याय, कानून व्यवस्था पर जनता का भरोसा और मजबूत करेगा।
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