विचार : डिजिटल अलगाव नहीं अब परिवेश से जुड़ाव की ओर जूमर्स - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 12 मार्च 2026

विचार : डिजिटल अलगाव नहीं अब परिवेश से जुड़ाव की ओर जूमर्स

Dr-rajendra-sharma
जूमर्स का इतनी जल्दी आभासी दुनिया से मोहभंग हो जाएगा यह समझ से परे लगता है पर टचिंग ग्रास की हालिया रिपोर्ट से तो यही सामने आ रहा है। दरअसल 1997 से 2012 तक की अवधि की पीढ़ी को जेन जेड या जूमर्स पीढ़ी के रुप में जाना जाता है। यह पीढ़ी इंटरनेट और स्मार्टफोन के साथ पली बढ़ी पीढ़ी है। डिजिटल सेवी होने से आभासी दुनिया में इस पीढ़ी का अलग ही अनुभव व सोच रहा है। पर बहुत कम समय में ही आभासी डिजिटल दुनिया से इस पीढ़ी का तेजी से मोहभंग होता जा रहा है। सोशियो-साइको भाषा में कहा जाएं तो जूमर्स एनालॉग पुनर्जागरण के दौर में आ गए हैं। आभासी दुनिया के साथ इस पीढ़ी में जो तेजी से बदलाव देखा जा रहा है वह अब अलगाव की जगह सहभागिता की और बढ़ता जा रहा है। एंड्रायड फोन की दुनिया से बाहर निकल कर अब सामाजिक मेल-मिलाप और अकेलेपन के स्थान पर सामाजिकता की और रुझान दिखाई देने लगा है। कहीं यह भी संकेत मिलने लगा है कि जूमर्स संस्कृति और आधुनिकता के बीच तारतम्य बैठाने की दिशा में बढ़ने लगे हैं। अब इस पीढ़ी द्वारा आभासी अनुभवों के स्थान पर धरातलीय अनुभवों को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। यही कारण है कि जूमर्स में अब पुरातन को नकार और तथाकथित आधुनिकता को स्वीकार के स्थान पर दोनों में सामंजस्य खोजने की नई सोच विकसित होने लगी है। अब डिजीटल अलगाव के स्थान पर जूमर्स मानवीय संवेदना, जमीनी हालातों के साथ ही साथ बेबाक होने लगे हैं। यह नई तरह की सामाजिक सामंजस्यता है जिसे सकारात्मक बदलाव के रुप में देखा जाना चाहिए।


जोमैटो के डिस्ट्रिक्ट प्लेटफार्म पर टचिंग ग्रास की हालिया रिपोर्ट में जेन जेड की जीवन शैली और सोच में बदलाव के यह संकेत उभर कर आये हैं। रिपोर्ट के अनुसार जूमर्स की प्राथमिकताओं में तेजी से बदलाव आया है। अब सप्ताहांत ही नहीं बीच में भी घर से बाहर डीनर लेने, आपसी मेल-मिलाप, दो लोगों के साथ समय बिताने, अपने परिवेश से जुड़ने डिजिटल दुनिया से बाहर आने आदि आदि सोच बनती जा रही है। यह डिजिटल दुनिया के दौर में सामाजिकता के लिए सकारात्मक बदलाव माना जा सकता है। यह सब भी तब है जब सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अधिक समय देने के बावजूद जिस तरह की रील्स देखने को मिल रही है वह बदलाव का स्पष्ट संकेत है। पिछले दिनों बैंक बड़ौदा में खाता खुलवाया लोकप्रिय हुआ या युवाओं द्वारा समूह में सुंदर कांड़, हनुमान चालीसा या भजन गायकी जेन जेड़ की बदलती मानसिकता की परिचायक है।  पिछले दिनों में युवाओं में भजन क्लबिंग का दौर देखा जा रहा है। यह बदलाव इस मायने में महत्वपूर्ण हो जाता है कि इंटरनेटी-सोशल मीडियाई दुनिया में जूमर्स अब सामाजिकता खोजने लगे हैं। यह सही है कि इंटरनेटी मायावी दुनिया के स्थान पर अपनी सामाजिक गतिविधियों को सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर पदर्शित करने लगे हैं। यह भले ही रील्स के माध्यम से ही क्यों ना हो। इसका ताजातरीन उदाहरण सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर चंग बजाते फागुनी गीत गाते युवाओं की टीमों को देखा जा सकता है। इसी तरह से सोशल मीडिया पर अब लोकगीतों और लोक परंपराओं की पालना करती महिलाओं को देखना आम होता जा रहा है। यह सोच के बदलाव का ही परिणाम है। अन्यथा हालात तो यह होते जा रहे हैं कि एक कमरें में बैठे हुए परिवार के सभी सदस्य चाहे बड़े-बुजुर्ग हो या बच्चे सभी स्क्रीन की दुनिया में खोते देखे जाते रहे हैं। बदलाव का यह दौर अब सोशल मीडिया पर तो सक्रिय है पर यह सक्रियता सामाजिकता को दर्शाती मूल्यात्मक सक्रियता है।


टचिंग ग्रास रिपोर्ट में खासतौर से 11 रुझान देखे गए हैं। इनमें कोलोजन इकोनोमी, एल्गोडिट्च, या एल्गोरिदम, साइडक्वेस्टकोर, मिथ मेकिंग आदि आदि है। जेन जेड युवा की समझ में अब प्रतिस्पर्धा का कोई महत्व ना होकर कोलोजन इकोनोमी यानी एक ही काम करने वाले प्रतिस्पर्धा के स्थान पर परस्पर सांठगांठ या समन्वय से कारोबार को बढ़ाने पर ध्यान देने लगे हैं। सटीक परिणाम पर विश्वास रखने लगे हैं तो स्टेप वाइज स्टेप आगे बढ़ने की रणनीति से अपनाने लगे हैं। पंरपरागत सांस्कृतिक परंपराओं का आधुनिक नाइट लाइफ से सामंजस्य बैठाया जाने लगा है। सोच में बदलाव यहां तक देखा जा सकता है कि अब अकेला होना आत्मविश्वास का परिचायक माना जाने लगा है और यह बोरियत से हटकर होता जा रहा है। जूमर्स आज फाउन्टेन पेन ढूंढने लगे हैं तो कम्प्यूटर पर अंगूलियां चलाने के साथ साथ लिखने का भी महत्व समझने लगे हैं। आज भले ही डिजिटल मीडिया कितनी ही तेजी से बढ़ रहा हो पर प्रिन्ट मीडिया की विश्वसनीयता बढ़ी है और टीवी चौनलों की चकाचौंध से आज का युवा दूर होता जा रहा है। अखबारों की वापसी के संकेत मिल रहे हैं तो जूमर्स की पढ़ने पढ़ाने की रुचि भी बढ़ने लगी है। पुस्तक मेलों में पाठकों की वापसी होने लगी है। यह कोई कहने की बात नहीं हैं अपितु सामने दिख रही है। सामाजिक विरुपता को जूमर्स समझने लगे हैं और अब उनका प्रयास सामाजिक परिवेश से जुड़ने का होने लगा है। यह बदलाव का साफ संकेत हैं। टचिंग ग्रास की रिपोर्टस से सकारात्मक बदलाव का संकेत सामने आने लगा है और इससे यह लगने लगा है कि तकनीक और व्यावहारिक जगत एक दूसरे के विरोधी ना होकर एक दूसरे के पूरक है और तकनीक के साथ साथ सामाजिक जुड़ाव शुभ संकेत माना जाना चाहिए।








डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

स्तंभकार

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