आलेख : लोकतंत्र की आवाज को कब मिलेगा सुरक्षा कवच? - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 12 मार्च 2026

आलेख : लोकतंत्र की आवाज को कब मिलेगा सुरक्षा कवच?

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी आवाज होती है, और उस आवाज को शब्द देने का काम पत्रकारिता करती है। लेकिन आज विडंबना यह है कि जो कलम सत्ता से सवाल पूछती है, वही खुद असुरक्षा और दबाव के साए में काम करने को मजबूर है। देश के कई हिस्सों में पत्रकारों पर हमले, धमकियां, फर्जी मुकदमे और आर्थिक-सामाजिक दबाव की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। दूसरी ओर बिना किसी मानक और जवाबदेही के फैलती फर्जी पत्रकारिता ने इस पेशे की विश्वसनीयता को भी चोट पहुंचाई है। ऐसे समय में यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि अगर लोकतंत्र की आवाज ही सुरक्षित नहीं होगी तो सच की रक्षा कौन करेगा? इसलिए अब वक्त आ गया है कि पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान और पेशे की गरिमा सुनिश्चित करने के लिए पत्रकार सुरक्षा कानून, पत्रकार आयोग और स्पष्ट संस्थागत व्यवस्था पर गंभीर और ठोस निर्णय लिया जाए...


Voice-of-democracy
लोकतंत्र को अक्सर चार स्तंभों वाला भवन कहा जाता है :- विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया। इन चारों में मीडिया की भूमिका सबसे अधिक संवेदनशील मानी जाती है, क्योंकि वही जनता और सत्ता के बीच संवाद का पुल बनता है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस पत्रकारिता को लोकतंत्र की आवाज कहा जाता है, वही आज कई तरह के संकटों से घिरी हुई है। एक ओर पत्रकारों पर हमले और उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ रही हैं, तो दूसरी ओर फर्जी पत्रकारिता और बिना किसी मानक के चल रही डिजिटल मीडिया ने भी इस पेशे की साख को गंभीर चुनौती दी है। ऐसे समय में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पत्रकारिता को भी अब एक व्यवस्थित ढांचे और कानूनी सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है? क्या पत्रकारों के अधिकारों, सुरक्षा और सम्मान के लिए कोई स्वतंत्र व्यवस्था नहीं होनी चाहिए? इन्हीं सवालों का उत्तर है, देश और प्रदेश में पत्रकार आयोग का गठन, पत्रकार सुरक्षा कानून, और पत्रकारिता के लिए स्पष्ट नियम-कायदे।


पत्रकार सुरक्षा कानून की बढ़ती आवश्यकता

पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारों पर हमले, धमकी, दबाव और मुकदमों की घटनाएं लगातार सामने आई हैं। कई बार किसी घोटाले, अवैध गतिविधि या सत्ता के दुरुपयोग की खबर उजागर करने पर पत्रकारों को प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। ग्रामीण और छोटे शहरों में काम करने वाले पत्रकारों की स्थिति तो और भी कठिन होती है, क्योंकि उनके पास न तो संस्थागत सुरक्षा होती है और न ही कानूनी सहायता का कोई सशक्त तंत्र। ऐसी स्थिति में पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग लंबे समय से उठती रही है। इस कानून के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि पत्रकारों पर हमला या उत्पीड़न किसी सामान्य अपराध की तरह न देखा जाए, बल्कि इसे लोकतंत्र पर हमला माना जाए। यदि पत्रकारों को स्वतंत्र और निर्भीक होकर काम करना है, तो उन्हें कानूनी सुरक्षा का मजबूत कवच मिलना ही चाहिए।


प्रत्येक जिले में पत्रकार सुरक्षा सेल की स्थापना

पत्रकारों की सुरक्षा केवल कानून बनाने से ही सुनिश्चित नहीं होगी, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए संस्थागत व्यवस्था भी जरूरी है। इसलिए प्रत्येक जिले में विशेष पत्रकार सुरक्षा सेल की स्थापना समय की मांग बन चुकी है। इस सेल के माध्यम से पत्रकारों की शिकायतों को तत्काल दर्ज किया जा सकेगा और उनका त्वरित निस्तारण भी संभव होगा। इसके साथ ही प्रत्येक जिले में पत्रकार हेल्प डेस्क स्थापित की जानी चाहिए, जहां पत्रकारों को प्रशासनिक और विधिक सहायता तुरंत मिल सके। आपातकालीन परिस्थितियों में किसी पत्रकार को धमकी या हमले का सामना करना पड़े तो उसे तुरंत पुलिस और प्रशासनिक सहयोग मिले, इसके लिए प्रत्येक जिले में एक नोडल अधिकारी भी नियुक्त किया जाना चाहिए। यह अधिकारी पत्रकारों से जुड़े मामलों की निगरानी करेगा और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करेगा।


प्रदेश स्तर पर स्वतंत्र पत्रकार आयोग

महिला आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, व्यापारी आयोग और अन्य आयोगों की तरह ही अब समय आ गया है कि पत्रकारों के लिए भी एक स्वतंत्र और प्रभावी पत्रकार आयोग का गठन किया जाए। यह आयोग पत्रकारों की सुरक्षा, अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए काम करेगा। साथ ही पत्रकारों से जुड़े विवादों, उत्पीड़न और शिकायतों की जांच भी करेगा। यदि किसी पत्रकार पर झूठे मुकदमे दर्ज किए जाते हैं या उसे दबाव में लाने की कोशिश की जाती है, तो पत्रकार आयोग ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है। पत्रकार आयोग का एक और महत्वपूर्ण कार्य यह भी होगा कि वह पत्रकारिता के मानकों और नैतिकता को बनाए रखने में भी सहयोग करे।


डिजिटल मीडिया के लिए पंजीकरण अनिवार्य हो

सूचना क्रांति के इस दौर में डिजिटल मीडिया का तेजी से विस्तार हुआ है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, यूट्यूब चैनल और वेबसाइटों के माध्यम से हजारों लोग खुद को पत्रकार बताने लगे हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश के पास न तो कोई प्रशिक्षण है और न ही कोई वैधानिक पहचान। इस स्थिति ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता को भी प्रभावित किया है। इसलिए आवश्यक है कि डिजिटल मीडिया को भी आरएनआई या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के माध्यम से पंजीकरण की प्रक्रिया में लाया जाए। यदि डिजिटल मीडिया को भी वैधानिक ढांचे में लाया जाएगा, तो फर्जी पत्रकारिता पर रोक लगेगी और पत्रकारिता की साख भी मजबूत होगी।


पत्रकारों के लिए शैक्षिक योग्यता तय हो

आज किसी भी क्षेत्र में प्रवेश के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निर्धारित होती है। डॉक्टर बनने के लिए मेडिकल शिक्षा आवश्यक है, वकील बनने के लिए विधि की पढ़ाई जरूरी है, लेकिन पत्रकार बनने के लिए अभी तक कोई स्पष्ट मानक निर्धारित नहीं है। ऐसे में यह जरूरी है कि पत्रकारिता के लिए भी न्यूनतम शैक्षिक योग्यता और प्रशिक्षण निर्धारित किया जाए। इससे इस पेशे में गंभीरता और पेशेवर दक्षता दोनों बढ़ेंगी।


सभी पत्रकारों के लिए समान पहचान पत्र

आज पत्रकारों के पास अलग-अलग संस्थानों द्वारा जारी किए गए अलग-अलग पहचान पत्र होते हैं। कई बार इसी का फायदा उठाकर फर्जी पत्रकार भी सक्रिय हो जाते हैं। इस समस्या का समाधान यह है कि सभी पत्रकारों को सरकार या किसी अधिकृत संस्था के माध्यम से एक समान और प्रमाणित पहचान पत्र जारी किया जाए। इससे असली और नकली पत्रकार के बीच अंतर स्पष्ट हो सकेगा।


स्वास्थ्य सुरक्षा और आयुष्मान योजना का लाभ

पत्रकार भी समाज का एक महत्वपूर्ण वर्ग हैं, जो दिन-रात जनता के लिए काम करता है। लेकिन उनकी सामाजिक सुरक्षा अक्सर कमजोर रहती है। इसलिए यह आवश्यक है कि पत्रकारों को आयुष्मान भारत योजना का लाभ दिया जाए, ताकि उन्हें और उनके परिवार को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें। यदि किसी प्रशासनिक कारण से सभी पत्रकारों को आयुष्मान योजना में शामिल करना संभव न हो, तो राज्य सरकार द्वारा “पत्रकार स्वास्थ्य सुरक्षा कार्ड” योजना लागू की जा सकती है। इससे पत्रकारों और उनके परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा मिल सकेगी।


पत्रकार पेंशन योजना की आवश्यकता

पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जिसमें कई लोग पूरी जिंदगी समाज के लिए काम करते हैं, लेकिन वृद्धावस्था में आर्थिक असुरक्षा का सामना करते हैं। इसलिए कई राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी पत्रकार पेंशन योजना लागू करने की मांग उठ रही है। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में पत्रकारों के लिए पेंशन योजनाएं लागू हैं। उसी तर्ज पर वाराणसी, भदोही, चंदौली, गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़, जौनपुर, मिर्जापुर, सोनभद्र सहित पूरे प्रदेश व देश में वरिष्ठ और सेवानिवृत्त पत्रकारों के लिए सम्मानजनक पेंशन योजना लागू की जानी चाहिए। यह न केवल उनके योगदान का सम्मान होगा, बल्कि उन्हें गरिमामय जीवन जीने का अवसर भी देगा।


पत्रकारिता की गरिमा बचाने की चुनौती

आज पत्रकारिता दोहरी चुनौती से गुजर रही है, एक ओर सुरक्षा और अधिकारों का संकट है, तो दूसरी ओर विश्वसनीयता का संकट भी है। यदि पत्रकारों के लिए स्पष्ट नियम, कानूनी सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की गई, तो आने वाले समय में पत्रकारिता की विश्वसनीयता और कमजोर हो सकती है। इसलिए सरकार, समाज और मीडिया संस्थानों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि पत्रकारिता केवल एक पेशा न रहे, बल्कि लोकतंत्र की मजबूत आवाज बनी रहे। सवाल केवल पत्रकारों की सुरक्षा का नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का भी है। क्योंकि जब पत्रकार सुरक्षित होंगे, तभी सच सुरक्षित रहेगा, और जब सच सुरक्षित रहेगा, तभी लोकतंत्र मजबूत रहेगा।




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सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार 

वाराणसी

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