- जब आस्था बनी अग्निपरीक्षा : अयोध्या महायज्ञ की लपटों में झुलसी व्यवस्था
- यह हादसा उस लापरवाही का आईना है, जो अक्सर बड़े आयोजनों की चमक-दमक के पीछे छिप जाती है
अयोध्या में हुआ यह अग्निकांड किसी एक आयोजन की विफलता नहीं, बल्कि एक व्यापक व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करता है। जिस महायज्ञ में 1251 हवन कुंड स्थापित किए गए हों, वहां अग्नि नियंत्रण को लेकर असाधारण सतर्कता की आवश्यकता होती है। लेकिन जिस तेजी से आग फैली, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि तैयारी उतनी ठोस नहीं थी, जितनी होनी चाहिए थी। धार्मिक आयोजनों में अग्नि का उपयोग परंपरा का हिस्सा है, लेकिन वहीअग्नि जब नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तो वह श्रद्धा को भय में बदल देती है। पंडालों में बांस, कपड़ा, घास-फूस जैसी ज्वलनशील सामग्री का प्रयोग आम बात है। ऐसे में एक छोटी सी चिंगारी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है, और अयोध्या में वही हुआ। यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आयोजकों ने जोखिम का सही आकलन किया था? क्या अग्निशमन के पर्याप्त इंतजाम पहले से मौजूद थे? या फिर सब कुछ “भगवान भरोसे” छोड़ दिया गया था?
बता दें, अयोध्या में राम मंदिर से बस थोड़ी ही दूर राजघाट पर पिछले नौ दिनों से एक बड़ा आयोजन चल रहा था, लेकिन आखिरी दिन वहां अचानक सब कुछ बदल गया. श्री लक्ष्मीनारायण महायज्ञ की पूर्णाहुति हो रही थी, तभी अज्ञात कारणों से वहां भीषण आग लग गई. देखते ही देखते आग की लपटें इतनी तेज हो गईं कि उन्होंने यज्ञशाला के सा-साथ पास की गौशाला को भी अपनी चपेट में ले लिया. उस वक्त वहां काफी लोग मौजूद थे, जिससे अचानक भगदड़ जैसी स्थिति बन गई. हैरानी की बात यह है कि सरयू तट पर बाटी वाले बाबा के पास करीब एक एकड़ में फैले इस महायज्ञ का आज ही पूर्णाहुति के साथ समापन हुआ था. यह महायज्ञ स्वामीजी महाराज द्वारा आयोजित किया गया था, जिसकी अध्यक्षता उत्तर प्रदेश के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह कर रहे थे. समापन के दिन ही अज्ञात कारणों से लगी इस आग ने उत्सव के माहौल को दहशत में बदल दिया.
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
जब कोई आयोजन इतने बड़े स्तर पर होता है, तो प्रशासन की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। अनुमति देना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए, बल्कि सुरक्षा मानकों की गहन जांच का हिस्सा होना चाहिए। क्या दमकल विभाग को पहले से तैनात किया गया था? क्या आपातकालीन निकासी के स्पष्ट रास्ते बनाए गए थे? क्या भीड़ नियंत्रण के लिए पर्याप्त पुलिस बल मौजूद था? अगर इन सभी सवालों के जवाब “नहीं” या “अधूरे” हैं, तो यह केवल चूक नहीं, बल्कि गंभीर लापरवाही है।
जिम्मेदारी तय होगी या फिर वही पुरानी कहानी?
हर बार जब ऐसा कोई हादसा होता है, तो जांच के आदेश दिए जाते हैं, जिम्मेदारों की पहचान की बात होती है, और कुछ दिनों बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। अयोध्या का यह मामला भी क्या उसी राह पर जाएगा? या फिर इस बार सच में जवाबदेही तय होगी? दयाशंकर सिंह जैसे जनप्रतिनिधि के नेतृत्व में हुए इस आयोजन में जवाबदेही और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि यह केवल व्यक्तिगत आयोजन नहीं था, बल्कि सार्वजनिक आस्था से जुड़ा कार्यक्रम था।
समस्या केवल व्यवस्था की नहीं, मानसिकता की भी है
हमारे समाज में एक धारणा गहराई से बैठी हुई है, “इतने बड़े आयोजन में कुछ नहीं होगा।” यही सोच सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। हम नियमों को नजरअंदाज करते हैं, जोखिम को हल्के में लेते हैं और फिर हादसे के बाद अफसोस करते हैं। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक न तो प्रशासन पूरी तरह सतर्क होगा और न ही आयोजक पूरी जिम्मेदारी निभाएंगे।
भविष्य के लिए सबक
अयोध्या की यह घटना एक चेतावनी है, बड़े धार्मिक आयोजनों के लिए सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल अनिवार्य किए जाएं. अग्निशमन व्यवस्था को पूर्व-तैयारी का हिस्सा बनाया जाए. पंडाल निर्माण में फायर-रेसिस्टेंट सामग्री का उपयोग हो. भीड़ नियंत्रण और निकासी के लिए स्पष्ट योजना तैयार हो. और सबसे जरूरी, जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया तेज और पारदर्शी हो.
आस्था को सुरक्षा का कवच चाहिए
अयोध्या की इस आग ने हमें एक कड़वी सच्चाई दिखाई है, आस्था जितनी शक्तिशाली होती है, उतनी ही संवेदनशील भी होती है। अगर उसके साथ सुरक्षा का संतुलन न हो, तो वही आस्था खतरे में बदल सकती है। अब समय आ गया है कि हम केवल भव्यता पर नहीं, बल्कि सुरक्षा पर भी उतना ही ध्यान दें। क्योंकि अंततः, “प्रार्थना तभी सार्थक है, जब जीवन सुरक्षित हो।”
सुरेश गांधी
वाराणसी

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