कविता : गांव की सोच - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 29 मार्च 2026

कविता : गांव की सोच

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बढ़ रही हूं मैं आगे हर एक कदम,

मगर चलते-चलते रुक सी गई थी मैं,

सुनकर गांव के ताने और लोगों की बातें,

उनकी बातों से मैं हो जाती हूं कभी-कभी दंग,

कोई कहे मिलता क्या है इसमें?

कोई पूछे फायदा क्या है इसमें?

पर यह तो मैं जानूँ और मेरा दिल जाने,

जब से हुई हूं मैं एक सशक्त किशोरी,

शर्म को छोड़ा, खत्म हुई झिझक मेरी,

मैंने बोलना सीखा, खुद को है जाना मैंने,

खुद से हुई है मुलाकात मेरी और,

कलम बनी है पहचान मेरी,

अब हुआ है मेरी जिंदगी का एक नया आगाज




किरण

कक्षा 11th

उत्तराखंड

टीम, गाँव की आवाज़

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