विशेष : “शीतलाष्टमी : जब ठंडे भोग से माता शीतला से मांगी जाती है रोगों से रक्षा” - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

विशेष : “शीतलाष्टमी : जब ठंडे भोग से माता शीतला से मांगी जाती है रोगों से रक्षा”

होली के उल्लास और रंगों के बाद भारतीय संस्कृति में एक ऐसा पर्व आता है जो जीवन में संयम, स्वच्छता और स्वास्थ्य का संदेश देता है। शीतलाष्टमी उसी लोकआस्था और आध्यात्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे रोगों से रक्षा करने वाली माता शीतला की आराधना के रूप में मनाया जाता है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत, राजस्थान, गुजरात और पूर्वांचल में गहरी श्रद्धा और परंपरा के साथ मनाया जाता है। इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता और एक दिन पहले तैयार किया गया ठंडा भोजन माता शीतला को अर्पित किया जाता है। इसके पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं बल्कि प्रकृति, मौसम और स्वास्थ्य से जुड़ी प्राचीन भारतीय समझ भी छिपी हुई है। माता शीतला के हाथ में झाड़ू, सूप, कलश और नीम की पत्तियाँ होती हैं, जो स्वच्छता, औषधीय शक्ति और रोगों से मुक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। लोकविश्वास है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने से चेचक, त्वचा रोग और अन्य संक्रामक बीमारियों से रक्षा होती है तथा परिवार में सुख-शांति और आरोग्य का वास होता है। इस प्रकार शीतलाष्टमी केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और संतुलित जीवन का भी महत्वपूर्ण संदेश देती है


Shitlashtami
भारत की सनातन परंपरा में प्रत्येक पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं होता, बल्कि उसके पीछे जीवन दर्शन, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना का गहरा संदेश छिपा होता है। ऐसा ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण और लोकआस्था से जुड़ा पर्व है शीतलाष्टमी। यह पर्व माता शीतला की आराधना का दिन है, जिन्हें रोगों की देवी माना जाता है। मान्यता है कि माता शीतला की कृपा से मनुष्य को महामारी, संक्रामक रोगों और विशेषकर त्वचा रोगों से रक्षा मिलती है। होली के रंगों और उल्लास के बाद जब प्रकृति धीरे-धीरे गर्मी की ओर बढ़ने लगती है, तब यह पर्व हमें संयम, स्वच्छता और स्वास्थ्य के महत्व का स्मरण कराता है। भारत के अनेक राज्यों—उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और झारखंड में शीतलाष्टमी का पर्व विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। पूर्वांचल और काशी क्षेत्र में तो यह पर्व लोकजीवन की परंपराओं के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता और एक दिन पहले तैयार किया गया भोजन माता को अर्पित किया जाता है। इस परंपरा के पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं बल्कि मौसम और स्वास्थ्य से जुड़ी गहरी समझ भी छिपी हुई है। शीतलाष्टमी केवल एक धार्मिक व्रत नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की उस परंपरा का प्रतीक है जिसमें आस्था और विज्ञान का सुंदर संगम दिखाई देता है। माता शीतला की पूजा हमें यह संदेश देती है कि जीवन में स्वास्थ्य और शांति सबसे बड़ा धन है। जब हम श्रद्धा के साथ माता शीतला की आराधना करते हैं, स्वच्छता बनाए रखते हैं और प्रकृति के नियमों का सम्मान करते हैं, तब जीवन में सुख, संतुलन और समृद्धि का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है। इस प्रकार शीतलाष्टमी का यह पावन पर्व हमें न केवल रोगों से रक्षा की कामना करना सिखाता है, बल्कि जीवन को शीतल, संतुलित और स्वस्थ बनाने का मार्ग भी दिखाता है।


तिथि, मुहूर्त और ज्योतिषीय योग

Shitlashtami
सनातन धर्म में किसी भी पूजा या व्रत का महत्व उसकी सही तिथि और मुहूर्त से जुड़ा होता है। पंचांग के अनुसार शीतलाष्टमी का पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। अष्टमी तिथि प्रारंभ – 10 मार्च, प्रातः लगभग 09:30 बजे, अष्टमी तिथि समाप्त – 11 मार्च, प्रातः लगभग 08:10 बजे. शुभ पूजा मुहूर्त : प्रातःकाल : 05:45 बजे से 09:00 बजे तक. यह समय माता शीतला की पूजा और व्रत अनुष्ठान के लिए विशेष शुभ माना जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से शीतलाष्टमी का दिन स्वास्थ्य और शांति की कामना के लिए अत्यंत अनुकूल माना जाता है। प्रातःकाल में मेष और वृष लग्न शुभ प्रभाव देते हैं। चंद्रमा मन, शरीर और रोगों का कारक ग्रह माना जाता है, इसलिए इस दिन चंद्रमा की स्थिति विशेष महत्व रखती है। ग्रहों की अनुकूल स्थिति स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और रोगों से मुक्ति की प्रार्थना के लिए उपयुक्त मानी जाती है। नक्षत्र योग : इस दिन चंद्रमा के प्रभाव वाले नक्षत्र का योग होने से यह पर्व रोग निवारण और मानसिक शांति के लिए विशेष फलदायी माना जाता है।


माता शीतला : लोकआस्था और पुराणों में वर्णन

Shitlashtami
माता शीतला को सनातन परंपरा में रोगों की देवी माना गया है। पुराणों और लोककथाओं में वर्णन मिलता है कि जब पृथ्वी पर महामारी और संक्रामक रोगों का प्रकोप बढ़ गया था, तब देवी ने शीतल स्वरूप धारण कर मानवता को रोगों से मुक्ति दिलाई। माता शीतला का स्वरूप अत्यंत प्रतीकात्मक माना जाता है। वे गधे पर सवार रहती हैं। उनके हाथ में झाड़ू, सूप, कलश और नीम की पत्तियाँ होती हैं। इन सभी प्रतीकों का गहरा अर्थ है :—

झाड़ू : अशुद्धता और रोगों को दूर करने का संकेत देता है।

सूप : वातावरण को शुद्ध करने और अशुद्ध तत्वों को अलग करने का प्रतीक है।

कलश : जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है।

नीम की पत्तियाँ : आयुर्वेद में नीम को रोगनाशक माना गया है। यह शुद्धता और औषधीय शक्ति का प्रतीक है। इन प्रतीकों से स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय समाज में स्वास्थ्य, स्वच्छता और प्रकृति के महत्व को धार्मिक परंपराओं के माध्यम से जनजीवन में स्थापित किया गया था।


पौराणिक कथा

शीतलाष्टमी से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक नगर में लोग माता शीतला की पूजा नहीं करते थे। वे स्वच्छता और धार्मिक नियमों की भी उपेक्षा करते थे। एक दिन नगर में भयंकर महामारी फैल गई। लोग एक-एक करके रोगों की चपेट में आने लगे। तब एक वृद्ध महिला ने लोगों को माता शीतला की पूजा करने और घर-परिवार में स्वच्छता बनाए रखने की सलाह दी। जब लोगों ने माता की आराधना की और नियमों का पालन किया, तब धीरे-धीरे महामारी समाप्त हो गई। तभी से यह परंपरा प्रचलित हुई कि चैत्र कृष्ण अष्टमी को माता शीतला की पूजा की जाए और उनसे रोगों से रक्षा की प्रार्थना की जाए।


पूजा विधि

शीतलाष्टमी की पूजा सरल लेकिन अत्यंत श्रद्धापूर्ण होती है। पूजा से एक दिन पहले इस दिन घरों में पूरी, पूआ, हलवा, कढ़ी, दही, चने और मीठे पकवान बनाए जाते हैं। यह भोजन अगले दिन माता को अर्पित किया जाता है। पूजा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के पूजा स्थान या मंदिर में माता शीतला की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। माता को ठंडा या बासी भोजन अर्पित करें। नीम की पत्तियाँ, जल और पुष्प अर्पित करें। माता की कथा और आरती करें। परिवार के सभी सदस्य प्रसाद ग्रहण करें। यह माना जाता है कि इस दिन माता शीतला की सच्चे मन से पूजा करने पर परिवार में रोगों का प्रवेश नहीं होता।


क्या करें

घर और आस-पास की साफ-सफाई रखें। माता शीतला के मंदिर जाकर दर्शन करें। नीम की पत्तियों का उपयोग करें। बच्चों और परिवार के स्वास्थ्य के लिए विशेष प्रार्थना करें।


क्या न करें

घर में चूल्हा या गैस नहीं जलाना चाहिए। ताजा भोजन बनाने से बचना चाहिए। घर में झगड़ा या कलह नहीं करना चाहिए। अशुद्धता या गंदगी नहीं फैलानी चाहिए। इन नियमों का पालन करना इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।


काशी और पूर्वांचल में शीतलाष्टमी की परंपरा

वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों में शीतलाष्टमी का पर्व विशेष आस्था के साथ मनाया जाता है। सुबह-सुबह महिलाएं और परिवार के सदस्य शीतला माता के मंदिरों में दर्शन करने जाते हैं। मंदिरों में माता को बासी भोजन, दही, गुड़ और पूड़ी का भोग लगाया जाता है। कई स्थानों पर मेले भी लगते हैं और भक्तों की लंबी कतारें देखी जाती हैं। पूर्वांचल के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं इस दिन बच्चों के स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं।


लोकजीवन और संस्कृति में शीतलाष्टमी

भारतीय समाज में त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते, बल्कि वे समाज को जोड़ने का माध्यम भी होते हैं। शीतलाष्टमी का पर्व भी इसी परंपरा का हिस्सा है। इस दिन परिवार एक साथ बैठकर भोजन करते हैं, मंदिर जाते हैं और माता शीतला से स्वास्थ्य की कामना करते हैं। गांवों में महिलाएं पारंपरिक गीत भी गाती हैं। यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में संतुलन, संयम और स्वच्छता कितनी महत्वपूर्ण है।


स्वास्थ्य और विज्ञान से जुड़ा संदेश

यदि हम शीतलाष्टमी की परंपराओं को वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो उनमें स्वास्थ्य से जुड़ा गहरा संदेश दिखाई देता है। नीम का उपयोग रोगनाशक है। स्वच्छता से संक्रामक रोगों का खतरा कम होता है। मौसम परिवर्तन के समय संयमित भोजन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। इस प्रकार शीतलाष्टमी का पर्व प्राचीन भारतीय समाज की स्वास्थ्य संबंधी समझ को भी दर्शाता है।


आधुनिक समय में शीतलाष्टमी का महत्व

आज के समय में जब दुनिया बार-बार महामारी और संक्रमण जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब शीतलाष्टमी का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि— स्वच्छता, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, प्रकृति के प्रति सम्मान और संयमित जीवन ही मानव जीवन की सबसे बड़ी शक्ति हैं।




Suresh-gandhi


सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार 

वाराणसी


कोई टिप्पणी नहीं: