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रविवार, 22 मार्च 2026

आलेख : आतंकी निर्यातक से नरसंहार का सौदागर बना पाकिस्तान

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पाकिस्तान एक बार फिर बेनकाब हुआ है—न केवल एक पड़ोसी देश के रूप में, बल्कि आतंक की उस फैक्ट्री के रूप में, जिसने दशकों से हिंसा को अपनी नीति का औजार बनाया है। काबुल के अस्पताल पर किया गया बर्बर हमला उसकी उसी सोच का ताजा प्रमाण है, जिसमें रणनीति के नाम पर इंसानियत को कुचल दिया जाता है। यह वही पाकिस्तान है, जिसने कभी आतंकियों को “संपत्ति” मानकर पाला-पोसा और आज उन्हीं के डर से बेगुनाहों पर बम बरसा रहा है। अपनी नाकामियों, आंतरिक अस्थिरता और विफल नीतियों को छिपाने के लिए वह खून की सियासत खेल रहा है। लेकिन यह भूल रहा है कि निर्दोषों का बहाया गया खून कभी भी स्थायी ताकत नहीं बन सकता—यह अंततः उसी को डुबोता है जो इसे बहाता है. मतलब साफ है आतंक की फैक्ट्री बना पाकिस्तान अब अपने ही पाले आतंकियों से डर रहा है, अब बेगुनाहों के खून से अपनी नाकामी ढक रहा है. काबुल के अस्पताल पर हमला उसकी दोगली नीति, बर्बर सोच और विफल रणनीति का जिंदा सबूत है…


दक्षिण एशिया एक बार फिर अस्थिरता की दहलीज पर खड़ा है, और इसकी सबसे बड़ी वजह वही पुराना खिलाड़ी है—पाकिस्तान। काबुल में अस्पताल जैसे संवेदनशील और मानवीय स्थल पर किया गया हवाई हमला केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक सुनियोजित बर्बरता है, जिसने यह साबित कर दिया है कि पाकिस्तान की नीतियां आज भी आतंक, अस्थिरता और दोगलेपन के इर्द-गिर्द घूमती हैं। रमजान के पाक महीने में, शब-ए-कद्र जैसी पवित्र रात पर सैकड़ों बेगुनाहों का खून बहाना न केवल अमानवीय है, बल्कि इस्लाम के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है, जिनका ढोंग पाकिस्तान अक्सर करता है। यह हमला अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे लंबे समय से पनप रहा अविश्वास, वर्चस्व की भूख और रणनीतिक असफलता छिपी हुई है। जिस तालिबान को कभी पाकिस्तान ने अपने हितों के लिए तैयार किया, उसे सत्ता तक पहुंचाया, वही आज उसके लिए चुनौती बन चुका है। अफगानिस्तान की जमीन पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की मौजूदगी और उसके हमलों ने इस्लामाबाद की नींद उड़ा रखी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस चुनौती का जवाब निर्दोष नागरिकों के खून से दिया जाएगा?


पाकिस्तान की नीति हमेशा से “अच्छे और बुरे आतंकवाद” के बीच अंतर करने की रही है। जो उसके हित में है, वह “रणनीतिक संपत्ति” और जो उसके खिलाफ है, वह “आतंकवादी”। यही दोहरा मापदंड आज उसके गले की फांस बन चुका है। टीटीपी उसी सोच की उपज है, जिसे अब पाकिस्तान खुद झेल रहा है। लेकिन अपनी नाकामियों को स्वीकार करने के बजाय वह अफगानिस्तान पर बम बरसाकर अपनी कमजोरी छिपाने की कोशिश कर रहा है। काबुल के अस्पताल पर हमला इस बात का भी संकेत है कि पाकिस्तान अब सीधे दबाव की राजनीति पर उतर आया है। वह यह संदेश देना चाहता है कि यदि तालिबान उसके इशारों पर नहीं चलेगा, तो उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। लेकिन यह रणनीति खतरनाक है, क्योंकि यह केवल अफगानिस्तान ही नहीं, पूरे क्षेत्र को हिंसा की आग में झोंक सकती है। इस हमले का समय भी बेहद संदिग्ध है। जब पूरी दुनिया पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्षों में उलझी हुई है, तब पाकिस्तान ने इस अवसर का लाभ उठाकर अपनी आक्रामक कार्रवाई को अंजाम दिया। उसे लगा कि वैश्विक ध्यान बंटा हुआ है और वह आसानी से बच निकलेगा। लेकिन यह आकलन गलत साबित हो सकता है, क्योंकि आज का वैश्विक परिदृश्य पहले जैसा नहीं है। मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन पर अब पहले से कहीं अधिक नजर रखी जा रही है।


भारत ने इस हमले की कड़ी निंदा कर बिल्कुल सही किया है। यह केवल कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक नैतिक और मानवीय दायित्व भी है। भारत हमेशा से आतंकवाद और निर्दोषों पर हमले के खिलाफ मुखर रहा है। अफगानिस्तान के साथ उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं, और ऐसे में वह इस तरह की बर्बरता पर चुप नहीं रह सकता। पाकिस्तान की यह कार्रवाई उसके उस पुराने चेहरे को उजागर करती है, जिसे वह बार-बार छिपाने की कोशिश करता है। दुनिया के सामने वह खुद को शांति का समर्थक और आतंकवाद का विरोधी बताता है, लेकिन उसकी जमीन पर पलने वाले आतंकी संगठन और उसके द्वारा किए जाने वाले ऐसे हमले उसकी सच्चाई बयां कर देते हैं। यह वही देश है जिसने दशकों तक आतंक को अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाए रखा और अब उसी का खामियाजा भुगत रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण पहलू है—अफगानिस्तान का बदलता रुख। तालिबान अब पूरी तरह पाकिस्तान के प्रभाव में नहीं है। वह अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना चाहता है और क्षेत्रीय संतुलन की नई राह तलाश रहा है। भारत के साथ उसके बढ़ते संपर्क इसी दिशा का संकेत हैं। यही बात पाकिस्तान को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है। उसे डर है कि यदि अफगानिस्तान उसके प्रभाव से बाहर निकल गया, तो उसकी रणनीतिक गहराई की नीति पूरी तरह विफल हो जाएगी। लेकिन क्या इस डर का समाधान बम और मिसाइल हैं? क्या निर्दोष नागरिकों को मारकर कोई देश अपनी ताकत साबित कर सकता है? इतिहास गवाह है कि ऐसी नीतियां कभी स्थायी सफलता नहीं देतीं। बल्कि वे और अधिक घृणा, हिंसा और अस्थिरता को जन्म देती हैं।


पाकिस्तान को यह समझना होगा कि आज का दौर बदल चुका है। अब आतंक और हिंसा के सहारे कोई भी देश लंबे समय तक अपनी स्थिति मजबूत नहीं रख सकता। उसे अपनी नीतियों में बदलाव लाना होगा, अपने अंदर झांकना होगा और यह स्वीकार करना होगा कि उसकी वर्तमान रणनीति उसे विनाश की ओर ले जा रही है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका भी इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण है। यदि ऐसे हमलों पर चुप्पी साध ली गई, तो यह एक खतरनाक मिसाल बन जाएगी। दुनिया को स्पष्ट संदेश देना होगा कि निर्दोषों के खिलाफ हिंसा किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। चाहे वह किसी भी देश द्वारा क्यों न की जाए। अंततः, यह केवल पाकिस्तान और अफगानिस्तान का मुद्दा नहीं है। यह पूरी मानवता का सवाल है। जब अस्पतालों पर बम गिरते हैं, जब मासूमों की जान ली जाती है, तब यह केवल एक देश का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का घाव बन जाता है। पाकिस्तान को यह समझना होगा कि खून से सनी जमीन पर स्थायी शांति नहीं उगती। यदि उसने अब भी अपनी नीतियों को नहीं बदला, तो वह न केवल अपने पड़ोसियों को, बल्कि खुद को भी विनाश के रास्ते पर धकेल देगा। यह समय है—दुनिया के जागने का, सच को पहचानने का और ऐसे अमानवीय कृत्यों के खिलाफ एकजुट होकर खड़े होने का।





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सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार 

वाराणसी

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