आलेख : बुलडोजर के सामने ‘बाहुबल’ की बगावत! 2027 से पहले जेल से सत्ता तक की साजिश? - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

आलेख : बुलडोजर के सामने ‘बाहुबल’ की बगावत! 2027 से पहले जेल से सत्ता तक की साजिश?

उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर वह पुराना साया लौटता दिख रहा है, जिसे “बाहुबली राजनीति” कहा जाता रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार चेहरे बदल गए हैं, लेकिन खेल वही पुराना है, जेल की सलाखों के पीछे से चुनावी बिसात बिछाने का। “माफिया मुक्त” अभियान और बुलडोजर कार्रवाई के बीच यह सवाल और तीखा हो गया है कि क्या सचमुच बाहुबल का अंत हो चुका है, या वह नई रणनीति के साथ फिर से सत्ता की दहलीज पर दस्तक दे रहा है। पूर्वांचल में विजय मिश्रा जैसे चेहरों के परिवार की सक्रियता, मऊ बेल्ट में अफजाल अंसारी और मुख्तार अंसारी के परिजनों की चुनावी तैयारियां, और विधानसभा में उठे बयान, ये सब मिलकर एक बड़े राजनीतिक संकेत दे रहे हैं। सवाल यह नहीं कि कौन चुनाव लड़ेगा, बल्कि यह है कि क्या 2027 में फिर वही “जेल से जनादेश” का मॉडल लौटेगा? और क्या सियासी दल, खासकर अखिलेश यादव की पार्टी, जीत के लिए इस रास्ते पर फिर चलने को तैयार हैं? यह लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति के चरित्र की है, जहां एक ओर बुलडोजर की सख्ती है, तो दूसरी ओर बैलेट की बिसात पर ‘बाहुबल’ की वापसी की जिद


Up-buldozar-politics
उत्तर प्रदेश, खासकर पूर्वांचल की राजनीति लंबे समय तक एक ऐसे दौर से गुजरी है, जहां “बाहुबल” और “जनाधार” का फर्क अक्सर धुंधला पड़ जाता था। चुनावी मैदान में ताकत का प्रदर्शन सिर्फ विचारों और नीतियों से नहीं, बल्कि प्रभाव, भय और नेटवर्क के सहारे भी तय होता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह “माफिया मुक्त उत्तर प्रदेश” का नारा और उस पर अमल देखने को मिला, उसने इस पूरे परिदृश्य को बदलने का दावा किया। फिर भी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जो संकेत सामने आ रहे हैं, वे यह सवाल उठाने के लिए पर्याप्त हैं, क्या बाहुबली राजनीति सचमुच खत्म हो गई है, या उसने बस अपना चेहरा और तरीका बदल लिया है? इसकी बड़ी वजह जेल से चुनाव की तैयारी, परिवार के सहारे वापसी की कोशिश और सियासी दलों की मजबूरियां है. ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या ‘माफिया युग’ सचमुच खत्म हुआ या सिर्फ रूप बदल रहा है?


Up-buldozar-politics
वैसे भी पूर्वांचल की राजनीति में यह कोई नई बात नहीं रही कि जेल में बंद रहते हुए भी कुछ प्रभावशाली चेहरे चुनाव जीतते रहे। यह लोकतंत्र की एक विचित्र विडंबना भी रही है, जहां कानून के शिकंजे में फंसा व्यक्ति भी जनता का प्रतिनिधि बन जाता है। इसी संदर्भ में विजय मिश्रा का नाम बार-बार चर्चा में आता है। कई बार अलग-अलग परिस्थितियों में चुनाव जीतना, जेल से भी राजनीतिक पकड़ बनाए रखना और स्थानीय स्तर पर मजबूत नेटवर्क खड़ा करना, यह सब उस मॉडल की ओर इशारा करता है, जिसे अब “जेल से जनादेश” की राजनीति कहा जाने लगा है। अब एक बार फिर उनके परिवार, बेटी, बहू, की सक्रियता यह संकेत देती है कि यह मॉडल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। बल्कि यह नए रूप में, परिवार के सहारे, फिर से मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है।


परिवार मॉडल : ‘बाहुबल’ का नया संस्करण

Up-buldozar-politics
समय के साथ रणनीति बदली है। पहले जहां बाहुबली खुद मैदान में उतरते थे, अब परिवार को आगे किया जा रहा है। पत्नी, बेटे या बेटी को उम्मीदवार बनाना. सहानुभूति का नैरेटिव गढ़ना. “राजनीतिक साजिश” बनाम “पीड़ित परिवार” की छवि बनाना. यह मॉडल सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। मऊ और आसपास के क्षेत्रों में भी इसी तरह की हलचल दिखाई दे रही है। अफजाल अंसारी की बेटी के चुनावी मैदान में उतरने की चर्चा हो, या मुख्तार अंसारी के बेटे और परिजनों की सक्रियता, यह सब मिलकर एक बड़े ट्रेंड की ओर इशारा करता है। यह ट्रेंड बताता है कि बाहुबल अब सीधे नहीं, बल्कि “परिवार” के जरिए राजनीति में अपनी मौजूदगी बनाए रखना चाहता है।


सियासत की मजबूरी या रणनीतिक वापसी?

Up-buldozar-politics
सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या राजनीतिक दल इस मॉडल को बढ़ावा दे रहे हैं या परिस्थितियां उन्हें इसके लिए मजबूर कर रही हैं? अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी के सामने 2027 का चुनाव एक बड़ी चुनौती है। पूर्वांचल में उसका जनाधार पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। ऐसे में चुनावी विश्लेषक यह तर्क दे रहे हैं कि : “अगर सपा को सत्ता में वापसी करनी है, तो उसे उन स्थानीय प्रभावशाली चेहरों को साथ लेना ही होगा, जो भले ही विवादित हों, लेकिन अपने क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।” यह तर्क राजनीतिक रूप से भले ही व्यावहारिक लगे, लेकिन नैतिक और लोकतांत्रिक दृष्टि से यह गंभीर सवाल भी खड़े करता है।


‘बुलडोजर नीति’ बनाम ‘बैलेट की ताकत’

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में जिस तरह से माफिया के खिलाफ कार्रवाई हुई, वह अभूतपूर्व मानी गई। गैंगस्टर एक्ट के तहत सख्ती, अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर, संगठित अपराध के नेटवर्क को तोड़ने की कोशिश. इन कार्रवाइयों ने यह संदेश जरूर दिया कि अब कानून से ऊपर कोई नहीं है। लेकिन अब जब वही चेहरे या उनके परिवार चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कानून की सख्ती राजनीतिक प्रभाव को पूरी तरह खत्म कर पाई है?


सदन के बयान और सियासी संकेत

हाल ही में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय के बयान ने इस बहस को और तेज कर दिया। उन्होंने विजय मिश्रा और उनके बेटे के संदर्भ में सवाल उठाए। इस बयान को कुछ लोग कानूनी दृष्टिकोण से देख रहे हैं, तो कुछ इसे संभावित राजनीतिक समीकरण के संकेत के रूप में। यही वह बिंदु है जहां सियासत और कानून की रेखाएं एक बार फिर धुंधली होती दिखती हैं।


पूर्वांचल का बदलता सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि अब जनता का मूड पहले जैसा नहीं रहा। युवा वर्ग रोजगार, शिक्षा और विकास को प्राथमिकता दे रहा है, महिलाओं के लिए सुरक्षा बड़ा मुद्दा बन चुका है, शहरीकरण और सूचना के विस्तार ने मतदाता को अधिक जागरूक बनाया है. इसके बावजूद, ग्रामीण इलाकों में जातीय समीकरण और स्थानीय प्रभाव अब भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही वह जगह है जहां बाहुबली राजनीति अपनी बची-खुची जमीन तलाशती है।


2027 : निर्णायक मोड़ या संक्रमणकाल?

2027 का विधानसभा चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह उत्तर प्रदेश की राजनीति के चरित्र को भी तय करेगा। तीन संभावनाएं साफ दिखती हैं :- सीमित पुनरुत्थान : बाहुबली परिवार कुछ सीटों तक सीमित प्रभाव बनाए रखें, नए चेहरे. पुराना नेटवर्क : परिवार के जरिए बाहुबल की राजनीति नए रूप में जारी रहे.  पूर्ण समाप्ति : सख्ती और बदले मतदाता के चलते इस राजनीति का अंत हो जाएं.


लोकतंत्र के लिए बड़ा सवाल

इस पूरी बहस के केंद्र में एक बड़ा सवाल है, क्या लोकतंत्र में “प्रभाव” और “भय” की राजनीति के लिए जगह होनी चाहिए? या फिर अब समय आ गया है कि राजनीति पूरी तरह मुद्दों, विकास और पारदर्शिता के आधार पर तय हो?


बदलता दौर, अधूरी कहानी

यह कहना जल्दबाजी होगी कि बाहुबली राजनीति पूरी तरह खत्म हो चुकी है। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि उसका स्वरूप बदल रहा है। अब यह खुला प्रदर्शन नहीं, बल्कि रणनीतिक और पारिवारिक ढांचे में ढलती जा रही है। “बुलडोजर दौर” ने इस राजनीति को कमजोर जरूर किया है, लेकिन खत्म नहीं। अब फैसला जनता के हाथ में है, क्या वह पुराने प्रभाव के साथ खड़ी होती है, या नए भारत की राजनीति को चुनती है? 2027 सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि पूर्वांचल की सियासत के भविष्य का जनमत संग्रह साबित हो सकता है।





Suresh-gsndhi

सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार 

वाराणसी

कोई टिप्पणी नहीं: