आलेख : खाड़ी की जंग से कांपा भारतीय निर्यात - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 19 मार्च 2026

आलेख : खाड़ी की जंग से कांपा भारतीय निर्यात

पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक व्यापार की धड़कनों को तेज कर दिया है। खाड़ी क्षेत्र में युद्ध की आशंका और समुद्री मार्गों पर बढ़े खतरे के कारण जहाजों का किराया बढ़ गया है, बीमा प्रीमियम में उछाल आया है और कई विदेशी खरीदार जोखिम लेने से बच रहे हैं। इसका सीधा असर भारत के निर्यात आधारित उद्योगों पर दिखाई देने लगा है। कालीन नगरी भदोही से लेकर देश के टेक्सटाइल, रत्न-आभूषण और इंजीनियरिंग उद्योग तक इस संकट की आंच महसूस कर रहे हैं


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पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक व्यापार की रफ्तार को अचानक धीमा कर दिया है। समुद्री मार्गों पर जोखिम, जहाजों के बढ़े किराये और बीमा प्रीमियम में उछाल ने भारत के निर्यात आधारित उद्योगों को चिंता में डाल दिया है। कालीन नगरी भदोही से लेकर देश के टेक्सटाइल, रत्न-आभूषण और इंजीनियरिंग निर्यातकों तक सभी पर इस संकट की छाया दिखाई देने लगी है। पश्चिम एशिया का खाड़ी क्षेत्र वैश्विक व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। एशिया से यूरोप और अमेरिका तक जाने वाले जहाजों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। जब इस क्षेत्र में युद्ध या तनाव की स्थिति बनती है तो समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो जाते हैं। जहाजों के लिए बीमा महंगा हो जाता है और शिपिंग कंपनियां अतिरिक्त शुल्क लगाने लगती हैं। वर्तमान हालात में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। कई शिपिंग कंपनियों ने जहाजों के मार्ग बदल दिए हैं, जिससे यात्रा का समय और लागत दोनों बढ़ गए हैं। मतलब साफ है दुनिया के किसी भी हिस्से में युद्ध केवल सैनिकों की लड़ाई नहीं होता, वह वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कनों को भी प्रभावित करता है। पश्चिम एशिया का खाड़ी क्षेत्र लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय व्यापार की जीवनरेखा माना जाता है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण उन देशों पर इसका सीधा असर पड़ता है जिनकी अर्थव्यवस्था निर्यात पर निर्भर है, और भारत भी उनमें शामिल है। यही कारण है कि खाड़ी क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर तुरंत भारतीय निर्यात उद्योगों पर दिखाई देने लगता है।


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व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खाड़ी क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक बना रहा तो इसका असर केवल कालीन उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा। भारत के कई अन्य निर्यात आधारित उद्योग भी प्रभावित हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार को निर्यातकों के लिए राहत पैकेज और लॉजिस्टिक सहायता पर विचार करना पड़ सकता है। मतलब साफ है पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव केवल एक क्षेत्रीय संकट नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। भारत के निर्यात उद्योगों के सामने आज जो चुनौतियां खड़ी हैं, वे केवल व्यापारिक आंकड़ों की कहानी नहीं हैं। इनके पीछे लाखों लोगों की मेहनत और उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। यदि जल्द ही स्थिति सामान्य नहीं हुई तो इसका असर उद्योगों के साथ-साथ रोजगार और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। इसलिए वैश्विक समुदाय के लिए यह आवश्यक है कि वह संवाद और कूटनीति के माध्यम से समाधान तलाशे, क्योंकि जब युद्ध की आग भड़कती है तो उसकी लपटें केवल रणभूमि तक सीमित नहीं रहतीं, वे करघों और कारखानों तक भी पहुंच जाती हैं।


भदोही का कालीन उद्योग सबसे ज्यादा प्रभावित

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उत्तर प्रदेश के भदोही और मिर्जापुर का कालीन उद्योग भारत के निर्यात में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दुनिया भर में हस्तनिर्मित कालीनों के लिए प्रसिद्ध यह क्षेत्र “कालीन नगरी” के नाम से जाना जाता है। इस उद्योग का वार्षिक कारोबार लगभग 17,500 करोड़ रुपये के आसपास है, जिसमें से लगभग 95 प्रतिशत उत्पादन विदेशों में निर्यात होता है। अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों में भारतीय कालीनों की भारी मांग है। लेकिन खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण निर्यातकों की चिंता बढ़ गई है। कई निर्यातकों का कहना है कि उनके कंटेनर बंदरगाहों पर फंस गए हैं और जहाजों का किराया काफी बढ़ गया है। यदि स्थिति लंबी चली तो उद्योग को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है।


कारपेट फेयर पर भी मंडराने लगा संकट

भदोही में हर वर्ष आयोजित होने वाला अंतरराष्ट्रीय कारपेट फेयर इस उद्योग के लिए बेहद महत्वपूर्ण आयोजन होता है। इसमें दुनिया भर से खरीदार आते हैं और करोड़ों रुपये के निर्यात सौदे होते हैं। लेकिन इस बार खाड़ी क्षेत्र में चल रहे तनाव के कारण इस आयोजन पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। कई विदेशी खरीदारों ने अपनी यात्रा को लेकर असमंजस जताया है और कुछ ने जोखिम के कारण आने से मना भी कर दिया है। यदि यह फेयर रद्द हो गया या अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाया तो उद्योग को लगभग 500 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है।


टेक्सटाइल उद्योग पर भी असर

भारत का वस्त्र और परिधान उद्योग भी निर्यात पर काफी हद तक निर्भर है। अमेरिका और यूरोप इसके प्रमुख बाजार हैं, लेकिन इन बाजारों तक पहुंचने के लिए समुद्री मार्गों का उपयोग करना पड़ता है। वर्तमान संकट के कारण जहाजों के मार्ग बदल रहे हैं और शिपिंग लागत में 30 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जा रही है। इससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ सकता है।


रत्न और आभूषण उद्योग की चिंता

मुंबई और सूरत जैसे शहर भारत के रत्न-आभूषण उद्योग के प्रमुख केंद्र हैं। यह उद्योग भी निर्यात पर आधारित है और वैश्विक बाजार में भारतीय आभूषणों की बड़ी मांग है।  लेकिन अंतरराष्ट्रीय परिवहन में आई अनिश्चितता और वैश्विक आर्थिक तनाव के कारण इस उद्योग की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।


इंजीनियरिंग और मशीनरी निर्यात

भारत का इंजीनियरिंग निर्यात भी तेजी से बढ़ रहा है। ऑटो पार्ट्स, मशीनरी और इलेक्ट्रिकल उपकरण बड़ी मात्रा में विदेशों में भेजे जाते हैं। लेकिन समुद्री मार्गों में आई बाधाओं के कारण इन उत्पादों के निर्यात पर भी असर पड़ रहा है। कई कंपनियों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ रहे हैं, जिससे लागत बढ़ रही है।


कालीन नगरी के करघों पर संकट की आहट

भदोही और मिर्जापुर क्षेत्र के हजारों गांवों में कालीन बुनाई आज भी बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका का साधन है। यहां लाखों बुनकर और कारीगर इस उद्योग से जुड़े हुए हैं। निर्यात में गिरावट आने पर सबसे पहले इन्हीं लोगों की आय प्रभावित होती है। इसलिए निर्यातकों के साथ-साथ बुनकरों में भी चिंता का माहौल है।


भारतीय कालीन उद्योग : एक नजर

कुल कारोबार : लगभग 17,500 करोड़ रुपये

निर्यात हिस्सेदारी : लगभग 95 प्रतिशत

संभावित नुकसान : 6-7 हजार करोड़ तक

कारपेट फेयर से संभावित व्यापार : 500 करोड़ रुपये

शिपिंग लागत में वृद्धि : 30-40 प्रतिशत


कृषि और समुद्री उत्पादों की चुनौती

भारत से चावल, मसाले, चाय और समुद्री उत्पाद भी बड़ी मात्रा में निर्यात किए जाते हैं। इन उत्पादों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शिपमेंट में देरी होने पर गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसलिए निर्यातकों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ रही है।


शिपिंग और बीमा लागत में उछाल

खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव का सबसे बड़ा आर्थिक असर शिपिंग और बीमा लागत पर पड़ा है। समुद्री जहाजों के लिए युद्ध जोखिम बीमा का प्रीमियम कई गुना बढ़ गया है। इसके अलावा शिपिंग कंपनियां भी जोखिम को देखते हुए अतिरिक्त शुल्क वसूल रही हैं।


भविष्य की रणनीति

यह संकट यह भी संकेत देता है कि भारत को अपनी व्यापारिक रणनीति में विविधता लानी होगी। यदि निर्यात का बड़ा हिस्सा कुछ सीमित मार्गों और बाजारों पर निर्भर रहेगा तो भविष्य में ऐसे संकट बार-बार सामने आ सकते हैं।


खाड़ी क्षेत्र : वैश्विक व्यापार की धुरी

पश्चिम एशिया का खाड़ी क्षेत्र लंबे समय से वैश्विक व्यापार की धुरी माना जाता है। फारस की खाड़ी और उसके आसपास के समुद्री मार्ग एशिया, यूरोप और अमेरिका के बीच व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता ह




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सुरेश गांधी 

वरिष्ठ पत्रकार 

वाराणसी 

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