बिहार में “हर घर नल का जल” योजना की शुरुआत 2016 में सात निश्चय कार्यक्रम के तहत की गई थी। इसका उद्देश्य था कि हर ग्रामीण और शहरी घर तक स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। इसके बाद 2019 में केंद्र सरकार की “जल जीवन मिशन” ने इस प्रयास को और गति दी। आंकड़ों के अनुसार, बिहार में 2016 से पहले ग्रामीण घरों में नल जल की पहुंच बहुत कम लगभग 1-2 प्रतिशत के आसपास थी। लेकिन 2024 तक राज्य सरकार के दावों के अनुसार यह आंकड़ा बढ़कर 95 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच गया है। सुनने में यह किसी जीत की कहानी जैसा लगता है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे थोड़ी अलग है। मुजफ्फरपुर के ग्रामीण इलाकों, खासकर मुसहरी ब्लॉक में, यह योजना पूरी तरह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाई है। कई गांवों में पाइप तो बिछी है, लेकिन पानी नहीं आता, कहीं टंकी बनी है लेकिन मोटर खराब है, और कहीं नरौला जैसे गांव भी हैं जहां पाइपलाइन ही अधूरी है क्योंकि लोगों ने अपनी जमीन देने से मना कर दिया। यह विरोध किसी आंदोलन के रूप में नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थ और असुरक्षा की भावना से उपजा है “मैं अपनी जमीन क्यों दूँ?” इस व्यक्तिगत और स्वार्थी सवाल ने पूरे गांव के विकास को ठप्प कर दिया है। सरकार की योजनाएं तभी सफल हो सकती हैं, जब समाज भी उसमें भागीदारी दिखाए। सिर्फ पाइप, टंकी और मोटर लगा देने से पानी हर घर तक नहीं पहुंचता, इसके लिए जरूरी है कि लोग एक-दूसरे के लिए थोड़ा सा स्थान छोड़ें। सिर्फ जमीन का नहीं, सोच का भी। नरौला गांव में आज सबसे बड़ी जरूरत तकनीक या पैसे की नहीं, बल्कि आपसी समझ और सहयोग की है।
अगर हम मुजफ्फरपुर जिले में नल जल योजना की प्रगति का आकलन करें तो औसतन अच्छी मानी जाएगी, लेकिन कई गांवों में “लास्ट माइल कनेक्टिविटी” अब भी एक बड़ी चुनौती है। यानी, मुख्य पाइपलाइन तो पहुंच गई, लेकिन हर घर तक उसका विस्तार नहीं हो पाया। यही वह आखिरी कड़ी है, जहां योजनाएं अटक जाती हैं। नरौला गांव इस समस्या का एक उदाहरण है। यह स्थिति हमें सीख देती है कि विकास सिर्फ सरकार का काम नहीं, यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी भी है। जब तक हम “मैं” से आगे बढ़कर “हम” की सोच नहीं अपनाएंगे, तब तक कोई भी योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकती। एक छोटी सी ज़मीन का टुकड़ा अगर किसी के जीवन को आसान बना सकता है, तो उसे रोकना सिर्फ एक व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि एक सामाजिक बाधा बन जाता है। अंत में, यह सवाल हम सबके सामने खड़ा होता है कि क्या हम अपनी छोटी-सी सुविधा के लिए किसी और की बड़ी जरूरत को नजरअंदाज कर सकते हैं? या फिर हम थोड़ा सा त्याग करके किसी के जीवन में राहत ला सकते हैं? अगर नरौला गांव के लोग अपनी जमीन का थोड़ा सा हिस्सा पाइपलाइन के लिए देने को तैयार हो जाएं, तो न सिर्फ पानी उनके पड़ोसियों तक पहुंचेगा, बल्कि एक मिसाल भी कायम होगी कि जब समाज साथ खड़ा होता है, तो विकास अधूरा नहीं रह सकता है।
मुजफ्फरपुर, बिहार
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)



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