रिपोर्ट का संकेत साफ है। ऊर्जा सुरक्षा और कृषि सुरक्षा अब अलग-अलग मुद्दे नहीं रह गए हैं। वे एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। अगर भारत को इस जोखिम से बाहर निकलना है, तो सिर्फ सप्लाई बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। उर्वरक उपयोग के तरीके बदलने होंगे, वैकल्पिक पोषक तत्वों को बढ़ावा देना होगा, और सबसे अहम, गैस पर निर्भरता कम करनी होगी। क्योंकि अगर समुद्र में उठी हलचल खेत तक असर डालने लगे, तो यह सिर्फ ऊर्जा का संकट नहीं रह जाता, यह भोजन और भविष्य दोनों का सवाल बन जाता है। टेक्सास विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री और फूड सिस्टम विशेषज्ञ Raj Patel इस संकट को एक बड़े ढांचे की समस्या मानते हैं। “यह कमजोरियां संयोग नहीं हैं. यह हमारी अपनी पसंद का नतीजा है. दुनिया भर में फॉसिल फ्यूल्स पर भारी सब्सिडी दी जाती है. और कृषि सिस्टम उसी पर टिका है. हमने इस निर्भरता को खुद बनाया है.” उनका इशारा साफ है। यह सिर्फ सप्लाई चेन का संकट नहीं, बल्कि नीति और निवेश का भी सवाल है।
इस संकट का सबसे सीधा असर किसान पर पड़ता है। ईस्टर्न अफ्रीकन फार्मर्स फेडरेशन के प्रमुख Stephen Muchiri कहते हैं, “उर्वरकों की कमी और बढ़ती कीमतों का डर पहले से ही किसानों की चुनौतियों को बढ़ा रहा है. कई जगहों पर मौसम भी अनिश्चित हो गया है. ऐसे में सरकारों को स्थानीय विकल्पों, जैसे बायो-फर्टिलाइजर और टिकाऊ खेती में निवेश करना होगा.” यानी, जलवायु और बाजार दोनों मिलकर दबाव बना रहे हैं। एशिया के किसानों के सामने भी यही दुविधा है। इंटर-कॉन्टिनेंटल नेटवर्क ऑफ ऑर्गेनिक फार्मर ऑर्गनाइजेशन्स की अध्यक्ष Shamika Mone कहती हैं, “उर्वरक महंगे हो रहे हैं और बुवाई का समय करीब है. किसान लागत और उत्पादन के बीच फंसे हैं. और उपभोक्ता पहले से ही महंगाई झेल रहे हैं. हमें इस चक्र से बाहर निकलना होगा.” यह “रोलरकोस्टर” सिर्फ किसानों के लिए नहीं, खाद्य कीमतों के जरिए हर उपभोक्ता तक पहुंचता है। वर्ल्ड रूरल फोरम की निदेशक Belén Citoler इसे एक बड़े संकट की तरह देखती हैं, “यह सिर्फ उर्वरक या कमोडिटी का संकट नहीं है. यह एक कमजोर खाद्य प्रणाली की परीक्षा है, जो लचीली नहीं है.” उनके मुताबिक, समाधान मौजूद हैं, लेकिन वे अक्सर छोटे किसानों के हाथों में हैं, जो एग्रोइकोलॉजी जैसे तरीकों को अपनाते हैं।
विकल्प क्या हैं?
रिपोर्ट और विशेषज्ञ दोनों एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं। रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करना प्राकृतिक और जैविक विकल्पों को बढ़ावा देना फसल चक्र और मिट्टी की सेहत पर ध्यान देना और सबसे अहम, कृषि सब्सिडी के ढांचे को बदलना। एग्रोइकोलॉजी को बढ़ावा देने वाले Oliver Oliveros कहते हैं, “कई देश अब समझ रहे हैं कि हमें फॉसिल फ्यूल आधारित उर्वरकों से आगे बढ़ना होगा. अगर हम सब्सिडी को सही दिशा में लगाएं, तो हम किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को इन झटकों से बचा सकते हैं.” यहां एक गहरा सवाल उठता है। आज की खेती ज्यादा उत्पादन देती है। लेकिन क्या यह टिकाऊ है? जर्मनी के किसान Olivier Jung अपने अनुभव से कहते हैं, “जब ऊर्जा महंगी होती है या सप्लाई चेन टूटती है, तो खेत सबसे पहले प्रभावित होते हैं. इसलिए हम अपनी खेती को ज्यादा आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश कर रहे हैं.” कहानी यहीं खत्म नहीं होती। हॉर्मुज़ में उठी हलचल शायद कुछ समय बाद शांत हो जाए। लेकिन इसने एक स्थायी सवाल छोड़ दिया है। क्या दुनिया की खाद्य प्रणाली बहुत ज्यादा बाहरी इनपुट्स पर निर्भर हो चुकी है? और अगर हां, तो अगला झटका कहां से आएगा? क्योंकि यह संकट सिर्फ समुद्र का नहीं है। यह मिट्टी, किसान और हमारे खाने की थाली का भी है।

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