वाराणसी : रंगों में घुली व्यापारियों की आत्मीयता, काशी में सजा होली मिलन - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 7 मार्च 2026

वाराणसी : रंगों में घुली व्यापारियों की आत्मीयता, काशी में सजा होली मिलन

  • रंगों के बहाने बढ़े रिश्ते, काशी में सजा व्यापारियों का होली मिलन, काशी बिस्कुट एवं कन्फेक्शनरी व्यापार मंडल के आयोजन में परिवार संग झूमे व्यापारी
  • गूंजे फाग के रंग, ठंडई-गुझिया के साथ बढ़ी आत्मीयता की मिठास, काशी में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है : अजित सिंह बग्गा 

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वाराणसी (सुरेश गांधी)। रंगों का त्योहार होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि रिश्तों में नई ऊर्जा और समाज में आत्मीयता का रंग घोलने का अवसर भी है। इसी भावना को साकार करते हुए काशी बिस्कुट एवं कन्फेक्शनरी व्यापार मंडल के तत्वावधान में शुक्रवार, को वाराणसी के चौरसिया लॉन में पारिवारिक होली मिलन समारोह का भव्य आयोजन किया गया। हर वर्ष की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आयोजित इस समारोह में व्यापारियों ने अपने परिवारों के साथ मिलकर होली के रंगों, फाग गीतों और काशी की सांस्कृतिक परंपराओं का आनंद लिया। सायं प्रारंभ हुए इस आयोजन की अध्यक्षता मंडल अध्यक्ष अजित सिंह बग्गा ने की, जबकि कार्यक्रम का संचालन काशी बिस्कुट एवं कन्फेक्शनरी व्यापार मंडल के महामंत्री रमेश निरंकारी ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में व्यापारी परिवारों की उपस्थिति ने इसे एक स्नेहिल और पारिवारिक उत्सव का रूप दे दिया। समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में बार काउंसिल के उपाध्यक्ष शशांक शेखर उपस्थित रहे। उन्होंने सभी व्यापारियों और उनके परिवारों को होली की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि यह जीवन में उमंग, प्रेम और भाईचारे का संदेश लेकर आती है। यह पर्व हमें अपने परिजनों और मित्रों के साथ संबंधों को और अधिक मजबूत करने का अवसर देता है। उन्होंने कहा कि वसंत ऋतु की मादकता, फाग के गीत और रंगों की छटा मिलकर होली को भारतीय संस्कृति का सबसे जीवंत उत्सव बना देते हैं।


इस अवसर पर अध्यक्ष अजित सिंह बग्गा ने कहा कि त्रैलोक से न्यारी काशी की परंपराएं अद्वितीय और मनोहारी हैं। यहां के पर्व-त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाली सांस्कृतिक कड़ियां हैं। काशी की गंगा-जमुनी तहजीब का उदाहरण यहां के हर त्योहार में दिखाई देता है, जहां सभी वर्ग और समुदाय के लोग मिलकर आनंद और उल्लास के साथ पर्व मनाते हैं। उन्होंने कहा कि काशी में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यहां होलिका दहन से लेकर रंगोत्सव तक हर आयोजन में एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संदेश निहित होता है। विशिष्ट अतिथि ने अपने संबोधन में कहा कि होलिका दहन की परंपरा हमें यह संदेश देती है कि बीते हुए संवत्सर की कमियों, अहंकार और नकारात्मकताओं को अग्नि में समर्पित कर देना चाहिए। यह अग्नि हमें तपाकर कुंदन की तरह शुद्ध बनाती है और नए संवत्सर में नई ऊर्जा के साथ जीवन की जिम्मेदारियों को निभाने की प्रेरणा देती है। कार्यक्रम में वाराणसी युवा व्यापार मंडल के अध्यक्ष ने भी सभी व्यापारियों को बधाई देते हुए कहा कि होली का यह पर्व व्यापारियों और उनके परिवारों के लिए आनंद और एकता का संदेश लेकर आता है। उन्होंने सभी को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि आने वाला प्रत्येक पल सभी के जीवन में सफलता, समृद्धि और अपार खुशियां लेकर आए।


समारोह में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया, जिसमें वाराणसी के कलाकारों ने फाग गीतों और होली की लोकधुनों से वातावरण को उल्लासमय बना दिया। कलाकारों की प्रस्तुति ने उपस्थित लोगों का मन मोह लिया और पूरा परिसर रंग, संगीत और हंसी-खुशी से सराबोर हो गया। कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक खान-पान की भी विशेष व्यवस्था की गई थी। काशी की प्रसिद्ध ठंडई के साथ गुझिया, पापड़, चाट और कचौड़ी जैसे पारंपरिक व्यंजनों की भरमार रही। इन व्यंजनों की सुगंध और स्वाद ने समारोह में शामिल लोगों के उत्साह को और बढ़ा दिया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में व्यापारी और उनके परिवारजन उपस्थित रहे। प्रमुख रूप से संजय गुप्ता, मनीष गुप्ता, विश्वनाथ दुबे, गुंगीत बग्गा, दीप्तिमान देव गुप्ता, अनुभव जायसवाल, नवीन जायसवाल, सत्यप्रकाश जायसवाल, संजय जायसवाल, जितेश जायसवाल, अनूप गुप्ता, शुभम जायसवाल, शरद गुप्ता, ज्ञानेश्वर जायसवाल, संतोष जायसवाल, अमन जायसवाल, प्रिया अग्रवाल, स्वाति गुप्ता, आरती शर्मा, हुमा बानो सहित अनेक लोग उपस्थित रहे। समारोह के अंत में सभी व्यापारियों ने एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं दीं। रंग, संगीत, हंसी और आत्मीयता से भरे इस आयोजन ने काशी की उस जीवंत परंपरा को फिर से जीवित कर दिया, जिसमें त्योहार केवल उत्सव नहीं बल्कि समाज को जोड़ने वाला सांस्कृतिक सेतु बन जाते हैं।   

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