विशेष : मिडिल ईस्ट युद्ध और LNG दांव. दक्षिण एशिया के सामने $107 अरब का सवाल - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 13 मार्च 2026

विशेष : मिडिल ईस्ट युद्ध और LNG दांव. दक्षिण एशिया के सामने $107 अरब का सवाल

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दुनिया के ऊर्जा बाज़ार इस समय अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं। मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव, ईरान पर अमेरिकी और इज़राइली हमलों और होरमुज़ जलडमरूमध्य में शिपिंग बाधाओं ने तेल और गैस की वैश्विक सप्लाई को एक बार फिर अनिश्चित बना दिया है। इसी बीच एक नई रिपोर्ट चेतावनी देती है कि दक्षिण एशिया के देश ऐसे समय में गैस इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा दांव लगा रहे हैं, जब यह निवेश भविष्य में आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा के जोखिम भी पैदा कर सकता है। ऊर्जा शोध संस्था की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान मिलकर करीब 107 अरब डॉलर की लागत वाले एलएनजी टर्मिनल और गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट विकसित कर रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण एशिया इस समय दुनिया में विकसित हो रही एलएनजी आयात क्षमता का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा है। इसी तरह गैस पाइपलाइन नेटवर्क के विस्तार में भी इस क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 17 प्रतिशत है, जिसकी कुल लंबाई करीब 34,000 किलोमीटर है।


गैस इंफ्रास्ट्रक्चर का बड़ा विस्तार

रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश और पाकिस्तान दोनों ही ऐसे एलएनजी टर्मिनल बना रहे हैं, जिनसे उनकी मौजूदा आयात क्षमता लगभग दोगुनी हो सकती है। भारत भी पीछे नहीं है। देश इस समय दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलएनजी टर्मिनल विस्तार और तीसरा सबसे बड़ा गैस पाइपलाइन नेटवर्क विस्तार कर रहा है। लेकिन इसी विस्तार को लेकर विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि गैस बाजार की वास्तविकता अक्सर योजनाओं से अलग होती है।


युद्ध से बढ़ती अनिश्चितता

मिडिल ईस्ट में युद्ध का असर ऊर्जा बाजार पर तुरंत दिखाई देता है। खासकर होरमुज़ जलडमरूमध्य जैसे समुद्री मार्गों में किसी भी तरह की बाधा गैस और तेल की कीमतों को तेजी से ऊपर ले जा सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक भले ही आने वाले वर्षों में वैश्विक एलएनजी बाजार में सप्लाई बढ़ने की उम्मीद हो, लेकिन शिपिंग रूट या उत्पादन में किसी भी बाधा से गैस की कीमतें अचानक बढ़ सकती हैं। ऐसे में आयात पर निर्भर देशों के लिए गैस सस्ती ऊर्जा का भरोसेमंद विकल्प नहीं रह जाती।


पहले भी रद्द हो चुके हैं कई प्रोजेक्ट

रिपोर्ट एक और महत्वपूर्ण रुझान की ओर इशारा करती है। पिछले दस वर्षों में भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान ने जितनी एलएनजी आयात क्षमता चालू की है, उससे दो से तीन गुना ज्यादा परियोजनाएं रद्द या स्थगित भी की हैं। दक्षिण एशिया में प्रस्तावित एलएनजी टर्मिनल परियोजनाओं की विफलता दर यूरोप की तुलना में काफी अधिक पाई गई है।


गैस बनाम रिन्यूएबल एनर्जी

रिपोर्ट का एक अहम निष्कर्ष यह भी है कि बिजली उत्पादन के क्षेत्र में रिन्यूएबल ऊर्जा पहले ही गैस से प्रतिस्पर्धा करने लगी है। भारत और पाकिस्तान में सौर ऊर्जा तेजी से बढ़ रही है। पाकिस्तान में सोलर उत्पादन पिछले तीन वर्षों में तीन गुना से ज्यादा हो चुका है। वहीं भारत 2030 तक अपनी बिजली मांग का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों से पूरा करने की राह पर है। ऊर्जा भंडारण तकनीकों में भी तेजी से सुधार हो रहा है, जिससे बिजली ग्रिड को संतुलित करने में गैस की पारंपरिक भूमिका धीरे धीरे कम हो सकती है।


विशेषज्ञ क्या कहते हैं

ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर में ग्लोबल एलएनजी विश्लेषक कहते हैं कि दक्षिण एशिया के एलएनजी आयातक देशों ने पहले भी गैस बाजार की अस्थिरता का असर देखा है। उनके मुताबिक “दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्थाएं पहले भी एलएनजी की कीमतों के झटके झेल चुकी हैं। यह नई रिपोर्ट याद दिलाती है कि नई गैस इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में जोखिम है। लंबे समय में घरेलू विकल्प, जैसे नवीकरणीय ऊर्जा, अधिक सस्ती और भरोसेमंद साबित हो सकते हैं।”


ऊर्जा की नई कहानी

दक्षिण एशिया की ऊर्जा कहानी इस समय एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ गैस इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश की योजनाएं हैं। दूसरी तरफ सौर, पवन और ऊर्जा भंडारण जैसी तकनीकें तेजी से आगे बढ़ रही हैं। मिडिल ईस्ट के युद्ध ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि क्या आयातित गैस पर आधारित ऊर्जा मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ रहेगा, या भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था कहीं ज्यादा स्थानीय, सस्ती और नवीकरणीय स्रोतों पर आधारित होगी। दक्षिण एशिया के लिए यह सिर्फ ऊर्जा का सवाल नहीं है। यह आर्थिक स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और आने वाले दशकों की विकास दिशा का सवाल भी है।

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