यहीं पर एंट्री होती है इस नए खिलाड़ी की, DME।
कहानी थोड़ी साइंस वाली है, लेकिन आसान है। मेथेनॉल को, जो कोयले, बायोमास या आगे चलकर ग्रीन हाइड्रोजन और CO₂ से बन सकता है, एक खास कैटेलिस्ट के ऊपर 250-300 डिग्री तापमान पर गुज़ारा जाता है। दो मेथेनॉल मिलते हैं, एक पानी का मॉलिक्यूल निकलता है… और बनता है DME। बस। लेकिन असली बात ये नहीं है कि ये कैसे बनता है। असली बात ये है कि ये काम कैसे करता है। DME, LPG की तरह ही सिलेंडर में भर सकता है। कोई नया चूल्हा नहीं चाहिए। कोई नया रेगुलेटर नहीं चाहिए। यानी, आपके घर में कुछ भी बदलने की ज़रूरत नहीं। और जलता कैसे है? नीली, साफ़ लौ के साथ। ना कालिख, ना सल्फर, और नाइट्रोजन ऑक्साइड भी कम। अब असली गेम चेंजर सुनिए। अगर भारत सिर्फ 8% DME को LPG में मिलाना शुरू कर दे, तो हर साल करीब 9,500 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बच सकती है। और अगर ये 20% तक गया, जो कि स्टैंडर्ड्स में अलाउड है, तो बचत पहुँच सकती है 23-24 हजार करोड़ रुपये तक। ये कोई हवा-हवाई आंकड़े नहीं हैं। सीधी गणित है, हमारे इम्पोर्ट बिल की। पर ये कहानी सिर्फ पैसे की नहीं है। LPG जब पूरी तरह नहीं जलती, तो वो काला धुआँ, ब्लैक कार्बन बनाती है। यही ब्लैक कार्बन हिमालय की बर्फ को तेज़ी से पिघलाने में बड़ा रोल निभाता है।
DME?
ये बिना कालिख के जलता है। मतलब, किचन से निकलने वाला धुआँ सीधे-सीधे क्लाइमेट पर असर कम कर सकता है। और सोचिए, अगर कल को यही DME पराली से बनने लगे… या ग्रीन हाइड्रोजन और CO₂ से…तो वही सिलेंडर, जो आज प्रदूषण का हिस्सा है, कल लगभग कार्बन-न्यूट्रल बन सकता है। लेकिन कहानी में ट्विस्ट भी है। अभी DME सस्ता नहीं है। पायलट लेवल पर इसकी लागत LPG से ज़्यादा पड़ती है। इकोनॉमिक्स तभी सेट होंगे, जब बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू होगा। और फिलहाल जो सबसे आसान रास्ता है, कोयले से DME बनाना… वो क्लाइमेट के लिए बहुत बड़ा गेम-चेंजर नहीं है। तो क्या ये पूरा समाधान है? नहीं। लेकिन क्या ये एक ठोस शुरुआत है? बिलकुल। अभी जो सबसे बड़ी बात समझने वाली है, वो ये है : इस टेक्नोलॉजी के लिए नया इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं चाहिए, नया सिस्टम नहीं चाहिए, और न ही विदेशी लाइसेंस। ये पूरी तरह भारतीय है। CSIR-NCL की लैब से निकली है। और इंडियन ऑयल, ONGC जैसे खिलाड़ी इसके साथ जुड़ सकते हैं। कभी-कभी बड़े बदलाव, शोर मचाकर नहीं आते। चुपचाप आते हैं…जैसे दो मॉलिक्यूल जुड़ते हैं, और बीच से पानी हट जाता है। DME वही पल हो सकता है। LPG संकट के बीच, ये कोई जादुई हल नहीं है। लेकिन ये एक रास्ता है, जहाँ भारत… थोड़ा कम निर्भर, थोड़ा ज़्यादा मजबूत बन सकता है।

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