आलेख : जब-जब बजेगी सरगम, याद आयेंगी आशा भोसले - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

आलेख : जब-जब बजेगी सरगम, याद आयेंगी आशा भोसले

भारतीय संगीत के विशाल आकाश में कुछ स्वर ऐसे होते हैं, जो समय की सीमाओं को लांघकर अनंत में गूंजते रहते हैं। आशा भोसले का स्वर भी ऐसा ही था, नित नवीन, चंचल, करुण, मदमस्त और शास्त्रीयता की गहराइयों में डूबा हुआ। आज जब हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, तो यह सिर्फ एक महान गायिका को स्मरण करना नहीं, बल्कि उस युग को प्रणाम करना है जिसने संगीत को जीवन का उत्सव बना दिया


Asha-bhonsle
आशा जी का गायन किसी एक शैली में सीमित नहीं था। वे ठुमरी की कोमलता भी थीं, गजल की नज़ाकत भी, और फिल्मी गीतों की चपलता भी। “पिया तू अब तो आजा” की चुलबुली अदा से लेकर “इन आंखों की मस्ती” की गहराई तक, उन्होंने हर भाव को अपने स्वर में ढाला। उनकी आवाज़ में एक ऐसा जादू था, जो श्रोता के मन के सबसे भीतरी कोनों को छू लेता था। 8 सितंबर 1933 को सांगली में जन्मी आशा भोसले ने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे। महान गायक दीनानाथ मंगेशकर की पुत्री होने के बावजूद उन्हें अपनी पहचान बनाने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ा। उनकी बहन लता मंगेशकर पहले से ही संगीत जगत की स्थापित हस्ती थीं, लेकिन आशा जी ने अपने अलग अंदाज और प्रयोगशीलता से खुद की एक विशिष्ट पहचान बनाई। जब आरडी बरमन के साथ उनकी जुगलबंदी बनी, तो हिंदी सिनेमा को एक नया संगीत मिला, आधुनिक, प्रयोगशील और दिलकश। “दम मारो दम”, “चुरा लिया है तुमने” जैसे गीतों ने युवाओं की धड़कनों को नया सुर दिया। वहीं ओपी नायर के साथ उनके गीतों ने शास्त्रीयता और पाश्चात्य संगीत का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया। आशा भोसले ने हिंदी के साथ-साथ मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, तमिल, मलयालम, और यहां तक कि अंग्रेज़ी में भी गीत गाए। उनका स्वर भारत की विविधता का प्रतीक बन गया, हर भाषा में उतना ही सहज, उतना ही आत्मीय। राष्ट्रीय पुरस्कारों से लेकर पद्म विभूषण तक, उन्हें असंख्य सम्मानों से नवाज़ा गया। लेकिन उनकी असली पूंजी थी, श्रोताओं का प्रेम। उनकी आवाज़ में जो अपनापन था, वह हर पीढ़ी को जोड़ता रहा। आज जब हम आशा भोसले को श्रद्धांजलि देते हैं, तो यह मानना कठिन लगता है कि वह स्वर अब हमारे बीच नहीं है। लेकिन सच यह है कि ऐसे स्वर कभी समाप्त नहीं होते, वे समय की सरहदों से परे जाकर अमर हो जाते हैं। उनकी गायकी हमें यह सिखाती है कि जीवन चाहे जैसा भी हो, उसमें सुर और लय बनाए रखना ही सबसे बड़ी कला है। आशा भोसले सिर्फ एक नाम नहीं थीं, वह भारतीय संगीत की धड़कन थीं। उनका हर गीत, हर आलाप, हर ठहराव हमें यह याद दिलाता रहेगा कि संगीत कभी मरता नहीं, वह बस रूप बदलकर हमारे भीतर जीवित रहता है। स्वर की वह चिरंजीवी नदी आज भी बह रही है... बस अब वह सुनाई नहीं देती, महसूस होती है।


Asha-bhonsle
23 अप्रैल 2017 का वह दिन काशी की स्मृतियों में आज भी सजीव है, जब आशा भोसले का प्रथम आगमन केवल एक सांगीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भावनाओं का महाकुंभ बन गया। काशी के भैंसासुर घाट पर आयोजित “सुर गंगा” मंच पर जैसे ही वह पहुँचीं, पूरा वातावरण “हर-हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठा। गंगा घाट के किनारे उमड़ी जनसैलाब की वह तस्वीर आज भी रोंगटे खड़े कर देती है। हजारों प्रशंसकों के अपार प्रेम से अभिभूत आशा ताई ने फोल्डेड हैंड के साथ सबका अभिवादन किया और भावुक होकर कहा कि बनारसी साड़ी की तरह यहां के लोग भी बेहद खूबसूरत हैं। उन्होंने पहले मंच पर गाने से इनकार किया था, लेकिन काशी के प्रेम ने उन्हें मजबूर कर दिया, और फिर सुरों की वह गंगा बही, जिसमें पूरा शहर डूब गया। संगीत को अपनी “सांस” मानने वाली इस साधिका ने जब अपने जीवन के संघर्ष, भक्ति और साधना की बातें साझा कीं, तो वह पल सिर्फ सुनने का नहीं, महसूस करने का बन गया, एक ऐसा संगम, जहाँ स्वर, श्रद्धा और काशी एकाकार हो गए। घाटों पर बहती गंगा की लहरें भी जैसे सुरों में झूम रही थीं, और सीढ़ियों पर उमड़ी भीड़ किसी महोत्सव नहीं, बल्कि एक युग के स्वागत की साक्षी बन रही थी। और काशी ने उन्हें केवल सुना नहीं... उन्हें जी लिया। घाटों की सीढ़ियों से लेकर दूर तक फैली भीड़... हर आँख में दीवानगी, हर दिल में एक ही धड़कन, आशा। वह क्षण किसी संगीत कार्यक्रम का नहीं, एक भावनात्मक मिलन का था। दस साल की उम्र में पहला गीत, संघर्षों से भरा सफर, ट्रेन से स्टूडियो तक की यात्रा, और एक माँ का त्याग... यह सिर्फ एक गायिका की कहानी नहीं थी, यह एक साधिका की तपस्या थी। उनकी स्मृतियों में लता मंगेशकर के साथ बचपन की मासूमियत भी झलक उठी, वह साथ स्कूल जाना, साथ रोना, और फिर जीवन भर साथ सुरों में जीना।


Asha-bhonsle
आशा भोसले ने खुद को भगवान शिव का भक्त बताया। दस ज्योतिर्लिंगों के दर्शन कर चुकी इस साधिका की इच्छा थी कि वह अपनी आध्यात्मिक यात्रा को पूर्ण करें। अगले दिन उन्होंने बाबा विश्वनाथ धाम में रुद्राभिषेक कर आशीर्वाद लिया। वैदिक मंत्रों के बीच वह सिर्फ एक कलाकार नहीं थीं, वह एक भक्त थीं। दो दिन के प्रवास के बाद उन्होंने कहा, “यह शहर बदल रहा है... स्वच्छता दिखती है, विकास दिखता है... और सबसे बढ़कर, यहाँ का प्रेम दिल में बस जाता है।” एक आवाज... जो कभी बूढ़ी नहीं होती. ‘नया दौर’ से ‘रंगीला’ तक, समय बदलता गया, पीढ़ियाँ बदलती गईं, लेकिन आशा भोसले की आवाज़ हमेशा जवान रही। तीसरी मंजिल की की चंचलता, उमराव जान की नजाकत, और रंगीला की आधु नकता, हर दौर में उन्होंने खुद को नए सिरे से रचा। भारतीय संगीत जगत में आशा भोसले का नाम केवल उनके गीतों से नहीं, बल्कि उनकी जीवन शैली, सोच, अनुशासन और जिंदादिली से भी पहचाना जाता है। वे सिर्फ सुरों की साधिका नहीं रहीं, बल्कि जीवन को एक कला की तरह जीने वाली ऐसी शख्सियत रहीं, जिन्होंने हर मोड़ पर खुद को नए रूप में ढाला। आशा भोसले की जीवन शैली हमेशा संतुलित और अनुशासित रही। बड़े से बड़े मंच पर चमकने वाली यह गायिका निजी जीवन में बेहद सरल थीं। उन्हें अच्छे भोजन, खासकर पारंपरिक व्यंजनों का शौक रहा, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने अपने स्वास्थ्य और दिनचर्या का विशेष ध्यान रखा। सुबह का रियाज, समय की पाबंदी, और काम के प्रति पूर्ण समर्पणकृये उनके जीवन के मूल तत्व रहे। उम्र के अंतिम पड़ाव तक भी उनका यह अनुशासन कायम रहा, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा ळें उन्हें नए-नए प्रयोग करना पसंद था, चाहे वह संगीत में हो या जीवन में। उन्होंने कभी खुद को किसी एक दायरे में सीमित नहीं कियज्ञं जहाँ एक ओर वे पारंपरिक गीतों में डूबी नजर आती थीं, वहीं दूसरी ओर आधुनिक संगीत और पॉप संस्कृति के साथ भी सहजता से जुड़ जाती थीं। उनकी यही खुली सोच उन्हें हर पीढ़ी के करीब ले आई।


गीतों की विविधता : हर मूड की आवाज़

अगर उनके गीतों को देखें, तो वह एक पूरी दुनिया की तरह हैं। “पिया तू अब तो आजा” जैसी चंचलता, “दिल चीज क्या है” जैसी नज़ाकत, “मेरा कुछ सामान” जैसी गहराई, हर गीत में एक नया रंग, एक नया एहसास। उन्होंने सिर्फ गाया नहीं, बल्कि हर गीत को जियज्ञं उनकी आवाज़ में भावनाओं की ऐसी परतें थीं, जो सीधे दिल तक पहुँचती थीं।


उपलब्धियों से भरा, लेकिन विनम्रता से सजा जीवन

आशा भोसले को अपने लंबे करियर में अनगिनत पुरस्कार और सम्मान मिले। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान बनी। लेकिन इन सबके बावजूद, उन्होंने कभी अपने भीतर अहंकार को जगह नहीं दी। उनके लिए असली सम्मान हमेशा श्रोताओं का प्रेम रहा। वे अक्सर कहती थीं कि कलाकार का सबसे बड़ा पुरस्कार उसके श्रोताओं की तालियाँ होती हैं।


जीवन को देखने का अनूठा नजरिया

आशा भोसले का जीवन दर्शन बेहद सरल लेकिन गहरा था। वे मानती थीं, “जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है, इसलिए हर पल को पूरी तरह जीना चाहिए।” उनका यह भी मानना था कि सफलता और असफलता दोनों जीवन का हिस्सा हैं। उन्होंने कभी कठिनाइयों से घबराकर पीछे हटना नहीं सीखा। उनके विचारों में सकारात्मकता और आत्मविश्वास साफ झलकता था।


सीखने की ललक : जो कभी खत्म नहीं हुई

इतनी सफलता के बाद भी उन्होंने सीखना नहीं छोड़ज्ञं वे हमेशा नए कलाकारों के साथ काम करने के लिए तैयार रहती थीं। नई तकनीक, नए संगीत और नए प्रयोग, हर चीज को अपनाने की उनकी क्षमता अद्भुत थी। उनका मानना था कि अगर कलाकार सीखना बंद कर दे, तो उसका विकास भी रुक जाता है।


रिश्तों की अहमियत

आशा भोसले ने अपने जीवन में रिश्तों को हमेशा महत्व दियज्ञं परिवार, दोस्त और सहयोगी, सभी के साथ उनका जुड़ाव गहरा रहा। उन्होंने अपने संघर्षों के दिनों को कभी नहीं भुलाया और हमेशा उन लोगों का आभार व्यक्त किया, जिन्होंने उनका साथ दिया।


खुद को बार-बार गढ़ने की कला

उनकी सबसे बड़ी खासियत थी, खुद को बदलने की क्षमता। समय के साथ उन्होंने अपने संगीत, अपनी शैली और अपने सोच को बदला। यही कारण है कि वे हर दौर में प्रासंगिक बनी रहीं। वे कभी एक ही छवि में कैद नहीं हुईंकृहर बार एक नई आशा भोसले सामने आईं।


एक प्रेरणा, जो सिर्फ संगीत तक सीमित नहीं

आशा भोसले का जीवन हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो अपने सपनों को पूरा करना चाहता है। उन्होंने यह साबित किया, कठिनाइयाँ चाहे जितनी भी हों, अगर हौसला मजबूत हो, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती।


अंतिम स्वर : विरासत, जो हमेशा जिंदा रहेगी

आशा भोसले की विरासत केवल उनके गीतों में नहीं, बल्कि उनकी सोच, उनकी जीवन शैली और उनके जज्बे में भी है। वे एक ऐसी कलाकार हैं, जिन्होंने न केवल संगीत को समृद्ध किया, बल्कि जीवन जीने का एक नया तरीका भी सिखायज्ञं उनकी आवाज़ आज भी गूंजती है...लेकिन उससे भी ज्यादा, उनका जीवन एक प्रेरणा बनकर हमारे भीतर जीवित है। आशा भोसले ने कभी किसी राजनीतिक दल की सदस्यता नहीं ली और न ही प्रत्यक्ष राजनीति में भागीदारी की। उनका मानना था कि कलाकार का कार्य समाज को जोड़ना है, न कि उसे विभाजित करना। फिर भी, एक जागरूक नागरिक के रूप में उन्होंने देश के नेतृत्व, विकास और नीतियों पर अपने विचार खुलकर रखे। अपने काशी प्रवास के दौरान उन्होंने पीएम मोदी के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा था कि देश को पहली बार एक “मजबूत नेता” मिला है।“अगर ऐसा नेतृत्व देश को 50 वर्ष पहले मिला होता, तो भारत विकास के रास्ते पर बहुत आगे निकल गया होता।” यह बयान उस समय काफी चर्चा में रहा, क्योंकि एक सांस्कृतिक क्षेत्र की प्रतिष्ठित हस्ती का यह दृष्टिकोण राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया. उनकी आवाज़ ने पीढ़ियों को जोड़ा, भाषाओं और सीमाओं को पार किया और एक सांस्कृतिक एकता का भाव उत्पन्न किया। वे उन कलाकारों में से थीं, जिनकी उपस्थिति किसी भी राष्ट्रीय या सांस्कृतिक मंच को गरिमा प्रदान करती थी। उनका मानना था कि कलाकार समाज का दर्पण होता है। संगीत के माध्यम से वह लोगों के दिलों तक पहुंचता है और यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने कभी राजनीति को अपने व्यक्तित्व पर हावी नहीं होने दिया, लेकिन जब भी देश और समाज की बात आई, उन्होंने अपने विचार स्पष्ट रूप से रखे।






Suresh-gandhi


सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार 

वाराणसी

कोई टिप्पणी नहीं: