- धर्म, संस्कृति और करुणा का संगम | 12 देशों से आएंगे लाखों अनुयायी | धम्म, ध्यान और विश्व शांति का संकल्प
महोत्सव का एक विशेष आकर्षण युवाओं के लिए आयोजित निबंध और चित्रकला प्रतियोगिता भी है, जिसका विषय ‘विश्व शांति के प्रतीक—भगवान बुद्ध’ रखा गया है। आयोजकों का उद्देश्य स्पष्ट है—नई पीढ़ी को बुद्ध के विचारों से जोड़ना और समाज में सकारात्मक चेतना का संचार करना। शाम होते-होते यह आध्यात्मिक उत्सव एक बौद्धिक विमर्श का रूप ले लेगा। केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के शान्तरक्षित लॉन में संगोष्ठी का आयोजन होगा, जिसमें देश-विदेश के विद्वान बुद्ध के जीवन, उनके दर्शन और वैश्विक प्रासंगिकता पर अपने विचार रखेंगे। यह संवाद केवल अतीत की चर्चा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शन का प्रयास होगा। दरअसल, आज जब पूरी दुनिया अशांति, संघर्ष और असहिष्णुता के दौर से गुजर रही है, तब बुद्ध का ‘मध्यम मार्ग’ और करुणा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है। यही कारण है कि इस बार बुद्ध पूर्णिमा पर सारनाथ में श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद है। अनुमान है कि 12 से अधिक देशों के करीब ढाई लाख अनुयायी यहां पहुंचकर अपनी आस्था अर्पित करेंगे। ये श्रद्धालु धमेख स्तूप की परिक्रमा करेंगे, धम्म सूत्र का पाठ करेंगे और धम्म यात्रा में भाग लेंगे।
विदेशों से आने वाले अनुयायियों में कंबोडिया, थाईलैंड, वियतनाम, लाओस, श्रीलंका, म्यांमार, बांग्लादेश, मलेशिया, कोरिया, चीन, तिब्बत और भूटान जैसे देशों के श्रद्धालु शामिल होंगे। वहीं भारत के विभिन्न राज्यों—महाराष्ट्र, बिहार, मध्यप्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश से भी बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचेंगे। सारनाथ में स्थित करीब 15 देशों के मठ और बौद्ध मंदिर इस अवसर पर विशेष रूप से सजाए जाएंगे और हर जगह उल्लास का वातावरण रहेगा। मूलगंध कुटी विहार में सुबह 6 से 11 बजे तक तथागत बुद्ध के पवित्र अस्थि धातु के दर्शन कराए जाएंगे। दोपहर में धम्म सभा और सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे, जबकि शाम को डॉ. आंबेडकर स्मारक स्थल से सारनाथ तक भव्य धम्म यात्रा निकाली जाएगी। इस दौरान भिक्षुओं द्वारा धम्मदेशना दी जाएगी, जो श्रद्धालुओं को आत्मिक शांति की ओर प्रेरित करेगी। इसके साथ ही चिकित्सा शिविर और सामूहिक भोजन दान कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे, जो बुद्ध के ‘करुणा और सेवा’ के संदेश को साकार रूप देंगे। महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया परिसर में सुबह से रात तक चलने वाला यह अन्नदान कार्यक्रम ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ की भावना को जीवंत करेगा। बुद्ध पूर्णिमा का यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानवता के लिए आत्ममंथन का अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि शांति बाहर नहीं, भीतर से जन्म लेती है। सारनाथ की यह धरती, जहां से बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था, आज भी उसी संदेश को दोहराती है— दुख का अंत करुणा से होता है, और करुणा का आरंभ आत्मबोध से। ऐसे में यह ‘बौद्ध महोत्सव’ केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि उस शाश्वत संदेश का उत्सव है, जो सदियों से मानवता को दिशा देता आया है और आगे भी देता रहेगा।

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