- देव-पूजन, हवन और ंमंत्रोच्चार के साथ किया गया प्राण-प्रतिष्ठा
- प्राण-प्रतिष्ठा के बिना मूर्ति पूजा अधूरी मानी जाती है। यह प्रक्रिया ही मूर्ति को देवता बनाती है : पंडित दुर्गा प्रसाद कटारे

सीहोर। शहर के बस स्टैंड स्थित श्री हनुमान मंदिर समिति के तत्वाधान में भव्य श्री 21 कुण्डीय श्रीराम महायज्ञ प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव एवं श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है। शुक्रवार को सुबह मंत्रोच्चार के साथ दिव्य अनुष्ठान किया गया। इसके बाद वैदिक मंत्रों के साथ मंगलाचरण हुआ। वहीं पूर्ण विधि-विधान के साथ प्राण-प्रतिष्ठा की गई, अब शनिवार को यज्ञ संचालक श्री-श्री 108 पंडित दुर्गा प्रसाद कटारे बाबा के मार्गदर्शन में देव पूजन, हवन एवं पूर्णाहुति, भंडारा, विदाई और मानस एवं संत सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा। इस संबंध में मंदिर समिति के अध्यक्ष रुद्रप्रकाश राठौर ने बताया कि विगत छह दिनों में समिति के द्वारा रात्रि को नगर भोज का आयोजन किया जा रहा है। इसमें 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण की है, वहीं शनिवार को महा आरती के पश्चात दोपहर में भंडारे का आयोजन किया जाएगा। यज्ञ संचालक पंडित श्री कटारे बाबा ने बताया कि प्राण-प्रतिष्ठा के बिना मूर्ति पूजा अधूरी मानी जाती है। यह प्रक्रिया ही मूर्ति को देवता बनाती है, प्राण-प्रतिष्ठा हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैदिक अनुष्ठान है, जिसका अर्थ मंत्रोच्चार के माध्यम से निर्जीव मूर्ति में दिव्य जीवन शक्ति का संचार करना है। यह प्रक्रिया साधारण पाषाण प्रतिमा को जागृत देवता के रूप में परिवर्तित करती है, जिससे वह पूजा के योग्य बनती है। इसके बाद मूर्ति साक्षात ईश्वर का साकार रूप मानी जाती है, न कि केवल एक पत्थर। शहर के बस स्टैंड स्थित का जीर्णोंद्धार किया गया है। पांच करोड़ से अधिक की लागत का मंदिर शहर के मध्य है और क्षेत्रवासियों के सहयोग से निर्मित हुआ है। यहां पर नियमित रूप से धार्मिक कार्यक्रमों का भव्य आयोजन निरंतर किया जाएगा। यहां पर महोत्सव में सप्त दिवसीय श्रीराम कथा का आयोजन के अलावा मानस सम्मेलन, महाकाल मंडल रामलीला उज्जैन के द्वारा मंचन किया जा रहा है।
भगवान के जन्म और वनवास का वर्णन
शुक्रवार को सात दिवसीय श्रीराम कथा में भगवान श्रीराम का जन्म, वनवास आदि का विस्तार से वर्णनण करते हुए कथा व्यास डॉ. प्रज्ञा भारती ने कहाकि भगवान राम कहते हैं कि इस जगत में उसी का जन्म धन्य है, जिसको माता-पिता के वचन और आज्ञ प्राणों के समान प्रिय हैं, उसके साथ में चारों पदार्थ अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष रहते हैं। राम कहते हैं हे मां पुत्र वही है जो माता-पिता के वचनों का अनुरागी है। दूसरी ओर जीवन और जगत से अपने पुत्रों के प्रति माता का जुड़ाव ही उनके ह्रदय का विराट तत्व है। राम वन गमन के समय मां कौशल्या की पीड़ा अत्यंत द्रवीभूत होती है, हृदय में कंपन सा है, जीवन की यह यात्रा बोझिल हो गई है, शरीर की नाड़ियां निष्प्राण होने लगी हैं। मां का पुत्र के प्रति यह कैसा प्रेम, जहां राम का वनगमन मां कौशल्या के जीवन की सारी आशाएं क्षीण हो रही थीं, वहां सिर्फ पुत्र के प्रेम की ही अभिलाषा है कि वह अपनी मनोव्यथा से उबरने के लिए स्वयं को स्वयं ही समझाने का अनुरोध करती है।
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