- अपने पिता के वचन की रक्षा के लिए सारा राजपाठ त्यागकर वन में चले गए : महंत उद्ववदास महाराज
महंत उद्ववदास महाराज ने अपनी नौ दिवसीय श्रीराम कथा में अनेक प्रसंग बताते जिसमें भगवान श्री राम अपने भाई लक्ष्मण से कहते है कि हे भाई इस जगत में माता-पिता की सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। तुम यहीं रहकर उनकी सेवा करो, लेकिन अंतत वे राम के ही साथ हो लिए। माता कैकेयी का भी अपने पुत्रों से प्रेम अथाह है, तभी तो राम जब अयोध्या लौटते हैं तो सबसे पहले माता कैकेयी के भवन मे जाते हैं। कैकेयी को भी सही दिशा नजर नहीं आती, उसकी वेदना के जल की थाह नहीं है। कैकेयी ऐसी स्थिति में है जहां राम वनगमन के समय खुशहाली की ओर जाने का रास्ता नजर नहीं आता, वह इससे न मुक्त हो रही है न झेल पा रही है। मां-बाप की अकारण अवहेलना ठीक नहीं, क्योंकि उनका स्नेह एवं दर्शन से जीवन हरा-भरा हो उठता है एवं बच्चों को वे उनके सरस जीवन स्नेह से सिंचित करते रहते हैं।
कथा के आठवे दिवस के प्रसंग
1 भरत का श्री राम को मनाने के लिए चित्रकूट जाना प्रभु श्री राम राजा जनक एवं गुरु वशिष्ट का भरत जी को समझाना।
2 शबरी जी का प्रसंग एवं नवधा भक्ति की चर्चा
3 पंपा सरोवर पहुंचने पर नारद जी द्वारा प्रभु श्री राम से यह वरदान प्राप्त करना कि राम नाम के प्रभाव से सभी पापों का छय होगा।
अष्टम दिन की कथा के दौरान श्री हंसदास मठ से महंत हरिराम दास महाराज ने कथा स्थल पर व्यास पूजन करने के उपरांत उपस्थित भक्त जनों का मार्गदर्शन किया। कथा के दौरान महंत उद्धव दास महाराज द्वारा उपस्थित भक्तों से गौ सम्मान अभियान में जुड़ने हेतु आग्रह किया तथा गौ माता के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु अपनी युक्तिसंगत मांगें ज्ञापन के माध्यम से सरकार तक पहुंचाने के लिए 27 अप्रैल को सुबह 10 बजे गीता भवन में उपस्थित होने का भी आग्रह किया। इस दौरान गौ सम्मान हेतु हस्ताक्षर अभियान भी चलाया गया।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें