सीजेआई ने कहा कि उनके पास ‘स्वाभाविक रूप से डिजिटल’ पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण है, एक ऐसा भविष्य जहां न्याय केवल एक ऐसी जगह पर नहीं मिले जहां कोई जाता है, बल्कि एक ऐसी सेवा हो जो निर्बाध, पारदर्शी और प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपलब्ध हो। उन्होंने कहा, ‘‘मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि अब यह केवल दूर के भविष्य की आकांक्षा नहीं है बल्कि इस पर काम पहले से ही हो रहा है। ई-समिति सक्रिय रूप से ‘डिजिटल नींव’ का निर्माण कर रही है जो प्रौद्योगिकी को किसी भी मामले के संपूर्ण स्तर में सहायक बनाएगी और न्याय वितरण प्रणाली के सभी हितधारकों को एकीकृत करेगी।’’ न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने रेखांकित किया कि भारत जैसे सामाजिक और भौगोलिक रूप से विविध देश में वास्तविक सुलभता के बिना डिजिटलीकरण सफल नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि 2,331 ई-सेवा केंद्रों की स्थापना ने इस संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सीजेआई ने कहा, ‘‘ये केंद्र मामलों का आकलन करने में मदद करते हैं, वीडियो कॉन्फ्रेंस की सुविधा देते हैं और उन लोगों को सहयोग प्रदान करते हैं जिन्हें डिजिटल प्रणाली का उपयोग करने में कठिनाई होती है। मुझे विश्वास है कि इन पहलों से यह सुनिश्चित होगा कि डिजिटल न्याय तक पहुंच किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति या भाषाई दक्षता पर निर्भर न हो। प्रौद्योगिकी को भौतिक और आर्थिक बाधाओं को पार करना होगा, और यही हमारा मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए।’’ न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि ‘ई-कोर्ट’ परियोजना का तीसरा चरण पूरी व्यवस्था को निर्णायक रूप से पुनर्गठित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है और इस चरण को प्रेरित करने वाला दृष्टिकोण देश के सबसे दूरस्थ कोने तक डिजिटलीकरण के वादे को पूरा करना है, जिसके लिए केंद्र ने 7,210 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है।
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि प्रौद्योगिकी अपने आप में प्रगति का मापदंड नहीं है। अधिक से अधिक, यह किसी प्रक्रिया को गति दे सकती है। लेकिन यदि अंतर्निहित प्रक्रियाएं बोझिल और पुरानी प्रक्रियात्मक संरचनाओं में निहित रहती हैं, तो प्रौद्योगिकी केवल सीमित मदद ही कर सकती है। यह सुविधा में सुधार कर सकती है, लेकिन यह अपने आप में वह संरचनात्मक सुधार नहीं ला सकती जिसकी हमारी न्याय प्रणाली को आवश्यकता है।’’ सीजेआई ने कहा कि न्यायपालिका द्वारा पिछले कुछ वर्षों में किए गए बदलावों से एक नयी तरह की प्रणाली का उदय हुआ है। प्रधान न्यायाधीश ने राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के रूप में किए गए संरचनात्मक सुधारों पर प्रकाश डाला और कहा कि यह शायद किसी भी लोकतंत्र द्वारा अपनी न्याय प्रणाली के लिए बनाए गए सबसे महत्वपूर्ण पारदर्शिता और निगरानी उपकरणों में से एक है, जो वास्तविक समय में 4.5 करोड़ से अधिक लंबित मामलों की निगरानी करने में सक्षम बनाता है। उन्होंने कहा, ‘‘इसने हमें ई-फाइलिंग की सुविधा दी, जिससे वादियों और अधिवक्ताओं को अदालतों में व्यक्तिगत रूप से आए बिना याचिका दाखिल करने की सहूलियत हुई। इसने सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर (एसयूवीएस) की नींव रखी, जो एक एआई-सक्षम अनुवाद उपकरण है, जिसने उच्चतम न्यायालय के फैसलों के विशाल संग्रह को क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।’’ उच्चतम न्यायालय की ई-कमेटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने घोषणा की कि अदालती कार्यवाही में एकरूपता और मर्यादा सुनिश्चित करने के लिए, डिजिटल कोर्ट 2.1 का प्रायोगिक परीक्षण किया जा रहा है और इसे जल्द ही पूरे देश में लागू किया जाएगा। ‘ई-कमेटी’ देश की सभी अदालतों को डिजिटल रूप से जोड़ने और आईटी-सक्षम न्यायिक प्रणाली बनाने के लिए जिम्मेदार है।

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