उन्होंने कहा कि तटस्थ मंच, प्रक्रियात्मक लचीलापन, गोपनीयता और पक्षकारों की स्वायत्तता जैसे फायदों के कारण सीमा पार वाणिज्यिक विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता सबसे पसंदीदा विधि के रूप में उभरी है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘इसके फायदे, जैसे कि तटस्थ मंच, प्रक्रियात्मक लचीलापन, गोपनीयता, पक्षकारों की स्वायत्तता और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के तहत निर्णयों की प्रवर्तनीयता ने इसे वैश्विक वाणिज्य में पक्षकारों के लिए अपरिहार्य बना दिया है।’’ उन्होंने कहा कि न्यूयॉर्क संधि द्वारा अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रभावशीलता को मजबूती मिली है, जिसने मध्यस्थता निर्णयों को 170 से अधिक न्यायक्षेत्रों में मान्यता देने और लागू करने की अनुमति दी है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने अपने संबोधन में द्विपक्षीय निवेश संधियों के तहत निवेश मध्यस्थता का भी उल्लेख किया और कहा कि इस तरह के तंत्र विदेशी निवेशकों को गैरकानूनी जब्ती से बचाते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘ये संधियां विदेशी निवेशकों को निष्पक्ष और न्यायसंगत व्यवहार, गैरकानूनी जब्ती के खिलाफ सुरक्षा और मेजबान राष्ट्रों के खिलाफ तटस्थ विवाद समाधान तंत्र तक पहुंच जैसी सुरक्षा प्रदान करती हैं।’’ न्यायमूर्ति नागरत्ना ने बताया कि अवसंरचना, निर्माण, प्रौद्योगिकी और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में विवादों के लिए अक्सर कानूनी ज्ञान के अलावा विशेष उद्योग विशेषज्ञता वाले मध्यस्थों की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा, ‘‘यदि हम भारत को एक विश्वसनीय मध्यस्थता क्षेत्राधिकार के रूप में मजबूत स्थिति प्रदान करना चाहते हैं, तो भारत में क्षेत्र-विशिष्ट मध्यस्थता विशेषज्ञता विकसित करना आवश्यक होगा।’’
मध्यस्थता के संबंध में न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यह विवाद समाधान के एक अलग दर्शन को दर्शाता है, जो पक्षों के बीच संवाद को सुगम बनाता है और उन्हें पारस्परिक रूप से स्वीकार्य परिणामों तक पहुंचने में मदद करता है। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता विशेष रूप से दीर्घकालिक वाणिज्यिक संबंधों, पारिवारिक मामलों और सामुदायिक संघर्षों से जुड़े विवादों में उपयोगी है क्योंकि यह संबंधों को बनाए रखने तथा स्थायी समाधानों को बढ़ावा देने में मदद करती है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने मध्यस्थता अधिनियम, 2023 का जिक्र करते हुए कहा कि यह कानून भारत में मध्यस्थता को संस्थागत रूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इसका कार्यान्वयन अब भी सीमित है। उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि हमारे पास कानून के रूप में ढांचा मौजूद है, लेकिन इसका कोई वास्तविक सक्रिय कार्यान्वयन नहीं है क्योंकि कई प्रावधानों को अभी अधिसूचित किया जाना बाकी है और भारत में मध्यस्थता परिषद का गठन नहीं हुआ है।’’ न्यायाधीश ने वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 की धारा 12ए के तहत मुकदमेबाजी से पहले मध्यस्थता के महत्व पर भी प्रकाश डाला और यह सुनिश्चित करने के लिए मध्यस्थता केंद्रों, कानूनी सेवा प्राधिकरणों और प्रशिक्षण संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय का आह्वान किया कि इस प्रावधान को इसकी सही भावना में लागू किया जाए।

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