काशी के बीएलडब्ल्यू के सूर्य सरोवर मैदान में मंचित “सम्राट विक्रमादित्य” महानाट्य केवल दृश्य वैभव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का सजीव रूप है। इसी भव्यता के बीच प्रियल सुनानिया का राजकुमारी रूप दर्शकों को ठहरने, सोचने और इतिहास को महसूस करने पर मजबूर करता है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के साथ रंगमंच की साधना, यह संतुलन उनके समर्पण की गवाही देता है। प्रियल का अभिनय संवादों तक सीमित नहीं, बल्कि भावों की वह धारा है जो सीधे दर्शकों के भीतर उतरती है। यह प्रस्तुति बताती है कि नई पीढ़ी केवल तकनीक की नहीं, बल्कि अपनी जड़ों की भी संवाहक है। “सम्राट विक्रमादित्य” का यह मंचन, और उसमें प्रियल की भूमिका, इस बात का प्रमाण है कि जब कला और इतिहास का संगम होता है, तो केवल नाटक नहीं, एक युग पुनर्जीवित होता है
सुरेश गांधी : प्रियल, सबसे पहले यह बताइए कि “सम्राट विक्रमादित्य” महानाट्य में आप कौन-सी भूमिका निभा रही हैं?
प्रियल सुनानिया : मैं इस महानाट्य में राजकुमारी की भूमिका निभा रही हूँ। यह किरदार मेरे लिए सिर्फ एक रोल नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदारी है। राजकुमारी का चरित्र बहुत ही संवेदनशील, गरिमामय और आत्मविश्वासी है। उसे मंच पर जीवंत करना मेरे लिए चुनौती भी है और गर्व की बात भी।
सवाल : इस भूमिका तक पहुंचने की आपकी यात्रा कैसी रही?
जवाब : मेरी यात्रा बिल्कुल संयोग से शुरू हुई थी। मैं शुरुआत में डांस के लिए आई थी। मुझे लगा था कि बस नृत्य ही करूंगी, लेकिन निर्देशक की नजर मुझ पर पड़ी और उन्होंने मुझे इस भूमिका के लिए चुन लिया। शुरू में मैं थोड़ी हिचकिचाई, लेकिन धीरे-धीरे अभिनय से जुड़ती चली गई। आज यह मेरी पहचान बन चुका है।
सवाल : आपने कहा कि आप कई वर्षों से रंगमंच से जुड़ी हैं, इस दौरान क्या बदलाव महसूस किए?
जवाब : जब मैंने शुरुआत की थी, तब मैं बहुत नर्वस रहती थी। संवाद बोलने में भी झिझक होती थी। लेकिन धीरे-धीरे आत्मविश्वास बढ़ा। हर नाटक ने मुझे कुछ नया सिखाया। अब मंच पर जाने से डर नहीं लगता, बल्कि एक अलग ही ऊर्जा मिलती है।
सवाल : इस महानाट्य में काम करना आपके लिए कितना खास है?
जवाब : यह मेरे लिए बेहद खास अनुभव है। इतने बड़े मंच पर, इतने बड़े स्तर पर काम करना हर कलाकार का सपना होता है। यहां केवल अभिनय नहीं हो रहा, बल्कि हम इतिहास को जी रहे हैं। जब मैं राजकुमारी का परिधान पहनती हूँ और मंच पर उतरती हूँ, तो सच में ऐसा लगता है जैसे मैं उसी युग में पहुंच गई हूँ।
सवाल : इंजीनियरिंग की पढ़ाई और रंगमंच, दोनों को कैसे संतुलित करती हैं?
जवाब : यह थोड़ा मुश्किल जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। समय प्रबंधन बहुत जरूरी है। मैं अपनी पढ़ाई को भी उतना ही महत्व देती हूँ जितना अभिनय को। दिन में पढ़ाई और शाम को रिहर्सल, इसी तरह संतुलन बना पाती हूँ।
सवाल : आपके परिवार का इस यात्रा में कितना सहयोग रहा?
जवाब : मेरे परिवार का बहुत बड़ा योगदान है। शुरुआत में उन्हें थोड़ा संदेह था, लेकिन जब उन्होंने मेरा जुनून देखा, तो उन्होंने मेरा पूरा साथ दिया। आज वे मेरे सबसे बड़े सपोर्ट सिस्टम हैं।
सवाल : इस नाटक के जरिए दर्शकों को क्या संदेश देना चाहती हैं?
जवाब : यह नाटक हमें हमारी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ता है। सम्राट विक्रमादित्य का युग न्याय, पराक्रम और समृद्धि का प्रतीक रहा है। हम चाहते हैं कि लोग इस इतिहास को समझें और उससे प्रेरणा लें।
सवाल : मंच पर सबसे चुनौतीपूर्ण क्षण कौन-सा होता है?
जवाब : लाइव प्रदर्शन में हर पल चुनौतीपूर्ण होता है। एक छोटी-सी गलती भी सबके सामने आ जाती है। लेकिन यही तो रंगमंच की खूबसूरती है, यह हमें हर पल सजग और जीवंत बनाए रखता है।
सवाल : आपकी आगे की क्या योजनाएं हैं?
जवाब : मैं अभिनय को आगे भी जारी रखना चाहती हूँ। साथ ही अपनी पढ़ाई पूरी करके एक अच्छा करियर बनाना चाहती हूँ। अगर मौका मिला, तो फिल्मों और बड़े मंचों पर भी काम करना चाहूंगी।
सवाल : युवा कलाकारों के लिए आपका क्या संदेश है?
जवाब : अगर आप किसी चीज को लेकर जुनूनी हैं, तो उसे जरूर करें। शुरुआत में कठिनाइयाँ आएंगी, लेकिन धैर्य और मेहनत से सब संभव है।
सवाल : क्या नई पीढ़ी की पहचान बना रहा है यह रंगमंच?
जवाब : आज के डिजिटल दौर में जहां लोग मोबाइल और स्क्रीन में व्यस्त हैं, वहीं प्रियल जैसी युवा कलाकार रंगमंच को जीवित रखे हुए हैं। उनका यह प्रयास न केवल सराहनीय है, बल्कि प्रेरणादायक भी है। ऐस ए रिपोर्टर मेरा मानना है “सम्राट विक्रमादित्य” महानाट्य केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन है। और इस आंदोलन की धड़कन हैं, प्रियल सुनानिया जैसी युवा कलाकार, जो अपने अभिनय से इतिहास को जीवंत कर रही हैं। उनकी यात्रा यह बताती है कि अगर जुनून सच्चा हो, तो रास्ते खुद बनते चले जाते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें