इन समस्याओं को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2000 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की शुरुआत की थी। इसका मुख्य उद्देश्य उन गांवों को हर मौसम में सड़क से जोड़ना था, जहां पहले कोई संपर्क नहीं था। इस योजना के तहत देशभर में अब तक लगभग 7.8 लाख किलोमीटर से अधिक ग्रामीण सड़कों का निर्माण किया जा चुका है, और लगभग 95 प्रतिशत पात्र बस्तियों को सड़क से जोड़ा गया है। बिहार में भी इस योजना के तहत लगभग 60,000 किलोमीटर ग्रामीण सड़कों का निर्माण हुआ है और हजारों गांवों को मुख्य सड़कों से जोड़ा गया है। हालांकि, जमीनी सच्चाई यह भी है कि केवल सड़क बना देना ही पर्याप्त नहीं है। कई जगहों पर सड़क बनने के बाद उसका रखरखाव नहीं किया जाता, जिससे कुछ ही वर्षों में वह खराब हो जाती है। मुजफ्फरपुर के कई गांवों में सड़क तो बनी, लेकिन उसकी मरम्मत के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं रही। परिणामस्वरूप, आज वे सड़कें उपयोग के लायक नहीं बची हैं। बजट के स्तर पर देखें तो वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार ने ग्रामीण सड़कों के लिए लगभग 19,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।
पीएमजीएसवाई-III के तहत अब तक 1.02 लाख किलोमीटर से अधिक सड़कें और 1,734 पुल पूरे किए जा चुके हैं। वहीं बिहार सरकार ने 2026-27 के बजट में ग्रामीण और सामान्य सड़क व पुलों के निर्माण (पूंजीगत परिव्यय) के लिए कुल ₹5,034 करोड़ आवंटित किए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना और सिंगल-लेन सड़कों को डबल-लेन में बदलना है। इस सराहनीय प्रयासों के बावजूद, कई बार बजट का सही उपयोग नहीं हो पाता या कार्यों में पारदर्शिता की कमी रह जाती है, जिससे योजनाओं का पूरा लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पाता है। इस स्थिति को सुधारने के लिए जरूरी है कि सड़क निर्माण के साथ-साथ उसकी नियमित देखभाल और गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान दिया जाए। जिन गांवों में अभी तक सड़क नहीं पहुंची है, वहां प्राथमिकता के आधार पर काम होना चाहिए। साथ ही, स्थानीय पंचायतों और ग्रामीण समुदाय को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वे सड़कों की निगरानी कर सकें और समय पर मरम्मत की मांग उठा सकें। वास्तव में, अगर गांवों में मजबूत और सुरक्षित सड़कें होंगी, तो इसका सीधा असर लड़कियों की शिक्षा, महिलाओं की सुरक्षा और पूरे गांव के विकास पर पड़ेगा, क्योंकि सड़कें केवल रास्ते नहीं होतीं, वे अवसरों के द्वार खोलती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि सरकार, समाज और स्थानीय प्रशासन मिलकर यह सुनिश्चित करें कि कोई भी गांव विकास की इस बुनियादी जरूरत से वंचित न रह जाए।
नेहा कुमारी
मुजफ्फरपुर, बिहार
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका की निजी राय है)



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