विचार : अंतरराज्यीय विवाह की महिलाओं का अनदेखा संकट - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 22 अप्रैल 2026

विचार : अंतरराज्यीय विवाह की महिलाओं का अनदेखा संकट

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हरियाणा में अंतरराज्यीय विवाह एक स्थापित सामाजिक वास्तविकता है। पिछले दो दशकों में यह प्रवृत्ति बढ़ी है, लेकिन इसके साथ जुड़े अनुभव और चुनौतियाँ अब भी सीमित रूप से समझी जाती हैं। अक्सर इस विषय को केवल जनसंख्या असंतुलन या सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में देखा जाता है। लेकिन जमीनी स्तर पर काम करने और स्वयं इस अनुभव से गुजरने के बाद यह स्पष्ट होता है कि असली समस्या कहीं अधिक गहरी है। अंतरराज्यीय विवाह में आने वाली महिलाओं की स्थिति सामान्य घरेलू संदर्भ से अलग होती है। वे भौगोलिक रूप से अपने मायके से दूर होती हैं, स्थानीय भाषा और सामाजिक तंत्र से अपरिचित होती हैं, और कई मामलों में आर्थिक तथा सामाजिक रूप से पूरी तरह निर्भर होती हैं। इस कारण उनकी जोखिम की स्थिति पहले से ही अधिक होती है।लेकिन सबसे गंभीर चुनौती तब सामने आती है जब वे सहायता मांगती हैं। व्यवस्था का पहला संपर्क बिंदु—पुलिस या स्थानीय प्रशासन—अक्सर उस तरह काम नहीं करता जैसा अपेक्षित है। कई मामलों में शिकायत दर्ज करने से पहले परिवार या ससुराल पक्ष से बातचीत की जाती है। लिखित आवेदन, क्षेत्राधिकार और अन्य प्रक्रियात्मक आवश्यकताएँ प्राथमिकता ले लेती हैं, जबकि महिला की तत्काल सुरक्षा पीछे छूट जाती है। यह केवल प्रक्रियात्मक कमी नहीं है। यह प्रतिक्रिया की संरचना का प्रश्न है। किसी भी संकट की स्थिति में पहली प्रतिक्रिया सबसे निर्णायक होती है। यदि उसी स्तर पर महिला को स्पष्ट, सुरक्षित और संवेदनशील समर्थन नहीं मिलता, तो आगे की पूरी न्याय प्रक्रिया कमजोर हो जाती है। कई महिलाएं पहली ही कोशिश में निराश होकर दोबारा सिस्टम तक पहुँचने की कोशिश नहीं करतीं।


इसी संदर्भ में “प्रथम उत्तरदाता प्रोटोकॉल (SOP)” की आवश्यकता सामने आती है। यह किसी नए कानून की मांग नहीं है, बल्कि एक स्पष्ट प्रशासनिक ढांचा है, जो यह तय करता है कि जब कोई महिला सहायता के लिए आए, तो संबंधित अधिकारी किस क्रम में और कैसे कार्रवाई करेंगे। इस तरह के प्रोटोकॉल का महत्व इसी में है कि यह विवेकाधीन निर्णयों को सीमित करता है और एक न्यूनतम मानक तय करता है। उदाहरण के लिए, यदि यह सुनिश्चित किया जाए कि 1: प्राथमिक बातचीत सीधे महिला से और निजी वातावरण में हो, 2: मौखिक शिकायत को भी प्रारंभिक कार्रवाई के लिए पर्याप्त माना जाए, 3: महिला अधिकारी की उपस्थिति अनिवार्य हो, 4: और जोखिम की स्थिति में तत्काल सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराया जाए। तो इससे न केवल प्रतिक्रिया की गुणवत्ता सुधरेगी, बल्कि महिला का सिस्टम पर विश्वास भी बढ़ेगा।


यह समझना महत्वपूर्ण है कि अंतरराज्यीय विवाह की महिलाओं के पास अक्सर वैकल्पिक सहारा नहीं होता। उनके लिए राज्य ही प्राथमिक सुरक्षा तंत्र है। ऐसे में यदि यही तंत्र प्रारंभिक स्तर पर विफल होता है, तो इसका प्रभाव सीधा उनके जीवन और सुरक्षा पर पड़ता है इसलिए SOP को केवल एक प्रशासनिक सुधार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस अंतर को भरने का प्रयास है, जो नीति और वास्तविकता के बीच मौजूद है।सरकार द्वारा इस दिशा में विचार किया जाना एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन किसी भी प्रोटोकॉल की प्रभावशीलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। प्रशिक्षण, निगरानी और जवाबदेही इसके आवश्यक घटक होंगे। अंततः प्रश्न बहुत सीधा है,क्या हमारी व्यवस्था संकट की स्थिति में महिला को प्राथमिकता देने के लिए तैयार है? यदि इसका उत्तर सकारात्मक होना है, तो शुरुआत पहली प्रतिक्रिया से ही करनी होगी।





चंदा लाठर

संयुक्त सचिव, सखी मंडल

संपर्क : 01169310275

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