- पंचम निशा, हनुमत दरबार में बिखरा संगीत का जादू, दरबारी की गहराई, भूपाली की मिठास, कथक से सरोद व छाप तिलक से पायो जी तक : सुरों की त्रिवेणी संगम में सजी संगीत की अलौकिक संध्या
मंच पर श्रीकृष्ण-राधा की नोकझोंक, ठाठ के विविध रूप, तिहाइयों की सटीकता और द्रुत लय में तटकऱ की गूंज ने वातावरण को जीवंत बना दिया। ‘दमरू चलत देखो श्याम करत’ जैसी बंदिश में अभिनय का पक्ष विशेष रूप से उभरकर सामने आया। अंत में घूंघट के पांच अंदाजों ने प्रस्तुति को पूर्णता प्रदान की और दर्शक देर तक तालियों से सराहना करते रहे। इसके बाद सरोद वादन की बारी आई, जहां पंडित तेजेंद्र नारायण मजूमदार ने अपने वादन से राग की गहराई को साकार किया। दो वर्षों के अंतराल के बाद संकट मोचन के मंच पर लौटे इस कलाकार ने आलाप और जोड़ के माध्यम से राग का विस्तार करते हुए स्वरों की शुद्धता और गूंज को सजीव किया। विलंबित तीनताल, मध्यलय झपताल और द्रुत तीनताल में उनकी प्रस्तुति ने संगीत प्रेमियों को बांधे रखा। तबले पर पंडित कुमार बोस की संगत ने लयकारी का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।
मंदिर प्रांगण में दीपों की मृदुल रोशनी, आरती की सुगंध और श्रद्धालुओं की तन्मय उपस्थिति के बीच जब बांसुरी की पहली तान गूंजी, तो वातावरण में एक गहरी शांति उतर आई। कार्यक्रम का आरंभ राग दरबारी कन्नाड़ा से हुआ, एक ऐसा राग जो अपनी गंभीरता और गहराई में मन को भीतर तक स्पर्श करता है। मंद्र से तार सप्तक तक की उनकी सहज यात्रा और स्वर साधना की परिपक्वता ने इस राग को केवल प्रस्तुति नहीं, बल्कि अनुभव बना दिया। रूपक ताल और तीनताल में निबद्ध पुरानी बंदिश “अभी कैसे बने मोरी बात सजनी” की प्रस्तुति में रानू मजूमदार ने बांसुरी पर गायकी अंग का अद्भुत प्रदर्शन किया। हर आलाप में भावों की गहराई और हर तान में सूक्ष्मता का ऐसा संतुलन था, जिसने श्रोताओं को देर तक बांधे रखा।
इसके बाद राग भूपाली के सुरों ने वातावरण में मधुरता घोल दी। उत्तर और दक्षिण भारतीय शैलियों की झलक उनके वादन में स्पष्ट दिखाई दी, जिसने प्रस्तुति को और भी समृद्ध बना दिया। किन्तु इस प्रस्तुति का वास्तविक उत्कर्ष तब आया, जब उन्होंने भक्ति और सूफियाना रंगों को एक सूत्र में पिरोते हुए संत मीरा बाई के भजन “पायो जी मैंने प्रेम रतन धन पायो” और सूफी संत अमीर खुसरो की अमर रचना “छाप तिलक सब छीनी रे, मोसे नैना मिलाय के” को बांसुरी पर साकार किया। यह संगम केवल दो रचनाओं का नहीं था, बल्कि दो परंपराओं के एकत्व का जीवंत प्रमाण था, जहां भक्ति और सूफी एक ही भाव में विलीन हो जाते हैं। “छाप तिलक...” की धुन ने जैसे ही वातावरण में विस्तार लिया, पूरा प्रांगण एक अलौकिक शांति में डूब गया। श्रोताओं की आंखें बंद थीं, मन भीतर की यात्रा पर था और बांसुरी के स्वर आत्मा से संवाद कर रहे थे। ऐसा प्रतीत हुआ मानो समय अपनी गति भूल गया हो और केवल संगीत ही शेष रह गया हो। इस प्रस्तुति में उनके पुत्र ऋषिकेश मजूमदार और शिष्य रोहन बॉस की संगत ने भी नई ऊर्जा का संचार किया। युवा उत्साह और अनुभवी साधना का यह संगम मंच पर स्पष्ट दिखाई दिया। यह केवल एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि संगीत परंपरा के निरंतर प्रवाह का प्रतीक बन गया।
रात्रि के चढ़ते ही कर्नाटक शैली के गायक कनकड़ा बनर्जी ने अपनी गायकी से समां बांध दिया। उनके रागों की मधुरता और स्वर-साधना की गहराई ने हनुमत दरबार को एक आध्यात्मिक आभा से भर दिया। उनकी प्रस्तुति में शास्त्रीयता और भावनात्मकता का ऐसा संतुलन था, जिसने श्रोताओं को देर रात तक बांधे रखा। पंचम निशा की यह संध्या केवल प्रस्तुतियों का क्रम नहीं थी, बल्कि एक भाव-यात्रा थी, जहां कथक की लय, सरोद की गहराई, बांसुरी की मधुरता और गायन की आत्मीयता एक साथ मिलकर संगीत का एक विराट रूप रच रही थी। अंततः, संकट मोचन की इस सुरमयी रात ने एक बार फिर यह अनुभूति कराई कि जब साधना सच्ची हो, तो संगीत केवल सुना नहीं जाताकृवह आत्मा में उतर जाता है। और उसी आत्मिक स्पर्श के साथ यह निशा देर तक काशी की हवाओं में गूंजती रही।

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