- जब तक ये विकार मन में हैं, तब तक श्री राम के दर्शन संभव नहीं : महंत उद्ववदास महाराज

सीहोर। शास्त्रों में काम, क्रोध और लोभ को नरक के तीन द्वार माना गया है, जो आत्मा का पतन करते हैं। जब तक ये विकार मन में हैं, तब तक राम के दर्शन आत्मसाक्षात्कार संभव नहीं हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार का त्याग कर, सत्संग और नाम जप के द्वारा जब मन से काम-विकार हट जाते हैं, तब अंतरआत्मा में श्री राम के दिव्य दर्शन होते हैं। उक्त विचार शहर के श्री संकट मोचन हनुमान मंदिर कंचन विहार विश्वनाथपुरी में जारी नौ दिवसीय श्रीराम कथा में महंत उद्ववदास महाराज ने कहे। महंत उद्ववदास महाराज ने भगवान श्रीराम की बाललीलाओं का वर्णन करते हुए कहाकि अहंकार छोड़ने से ही शक्ति मिलती है। शक्ति से भक्ति मिलती है। समृद्धि और विकास के रास्ते भी तय होते हैं। आप भी अपने जीवन से घमंड या अहंकार छोड़कर देखें जीवन की परेशानियों हो जाएंगी दूर। मानव जीवन हमें हमारे पुण्य से मिला है, मनुष्य को इसका सदुपयोग करना चाहिए और राम नाम का जप करते हुए अपने लोक व परलोक को सुधारना चाहिए। कलियुग में मनुष्य का सबसे बड़ा सहारा राम नाम ही है। प्रवचन के दौरान महाराज ने कहा कि हमें अपने दाम्पत्य जीवन में गंभीर होना चाहिए। पति-पत्नी, भाई-बहन, भाई-भाई का प्रेम, पिता-पुत्र, सास-बहु सभी को अपनी मर्यादा में रहना चाहिए। रामायण हमें मर्यादा सिखाती है। नौ ग्रहों का भाग्य पर बड़ा असर पड़ता है पर नौ ग्रहों से ऊपर भी है भगवान का अनुग्रह जिस पर भगवान का अनुग्रह हो जाए उसके सारे ग्रह अनुकूल हो जाते हैं, दुनिया में किसी भी देश को माता होने का गौरव प्राप्त नहीं है यह भारत माता ही है जिसने परमात्मा को भी पुत्र के रूप में अवतरित कर लिया, भरतजी प्रेम का रूप है और आत्मा का पोषण प्रेम से ही होता है इसलिए रामायण में भरत के नाम की व्याख्या करते हुए गुरु वशिष्ठ ने भरत को भरण पोषण करने वाला बताया है, परमात्मा किसी के साथ भेदभाव नहीं करता आज का कर्म ही कल का भाग्य बनता है इसलिए संसार मे कर्म की प्रधानता है। लोभ, मोह, क्रोध और अहंकार को हटा सकें तब ही हृदय में राम का जन्म होता है। पूर्ण रूपेण सुखी और संतुष्ट होने के लिए हृदय में राम का प्राकट्य होना जरूरी है।
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