वाराणसी : नगाड़ा बजा ‘मिशन 2027’ का : नारी शक्ति, विकास और सियासत के संग्राम में तपेगा यूपी - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

वाराणसी : नगाड़ा बजा ‘मिशन 2027’ का : नारी शक्ति, विकास और सियासत के संग्राम में तपेगा यूपी

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वाराणसी (सुरेश गांधी)।  पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के चुनावी शोर के थमते ही देश की सियासत का धुरी बिंदु एक बार फिर उत्तर प्रदेश बनता दिख रहा है। 2027 का विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने-अपने शंखनाद कर दिए हैं। भाजपा ने ‘विकसित यूपी’ का नगाड़ा बजाते हुए संगठन और सरकार, दोनों स्तर पर कमर कस ली है, तो सपा, बसपा और अन्य दल भी अपने-अपने मुद्दों के साथ मैदान में उतरते दिख रहे हैं। संकेत साफ हैं, अब असली समर की आहट शुरू हो चुकी है। इस बार की लड़ाई केवल सत्ता परिवर्तन या पुनरावृत्ति की नहीं होगी, बल्कि यह नैरेटिव की जंग होगी, विकास बनाम सामाजिक समीकरण, नारी सशक्तिकरण बनाम राजनीतिक प्रतीकवाद, और सुशासन बनाम असंतोष के मुद्दों की टकराहट। गुरुवार को विधानसभा में महिला आरक्षण को लेकर बुलाए गए विशेष सत्र ने इस चुनावी दिशा को और स्पष्ट कर दिया। सदन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के तेवर और विपक्ष की आक्रामकता ने यह संकेत दे दिया कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति ‘नारी शक्ति’ के इर्द-गिर्द ही घूमने वाली है।


सदन में सियासी प्रहारः ‘गेस्ट हाउस’ से ‘गिरगिट’ तक

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘आधी आबादी’ को समर्पित इस सत्र को राजनीतिक और वैचारिक दोनों स्तर पर साधने की कोशिश की। उन्होंने 1995 के गेस्ट हाउस कांड का जिक्र कर सपा पर सीधा हमला बोला और इसे महिलाओं के प्रति उसके “वास्तविक आचरण” का प्रतीक बताया। उनका यह कथन, “दिल्ली में एक रुख, लखनऊ में दूसरा, इनके बदलते रंग देखकर गिरगिट भी शर्मा जाए”, यह सिर्फ तंज नहीं, बल्कि विपक्ष के कथित दोहरे चरित्र को चुनावी मुद्दा बनाने की रणनीति का हिस्सा है। दूसरी ओर अखिलेश यादव और उनकी पार्टी ने इस हमले को राजनीतिक आरोप बताते हुए बेरोजगारी, महंगाई और कानून-व्यवस्था के सवालों को आगे बढ़ाने की कोशिश की। यानी, सत्ता और विपक्ष दोनों ने अपने-अपने मोर्चे तय कर लिए हैं।


काशी से संदेश: आस्था, विकास और महिला सशक्तिकरण का संगम

वाराणसी में पीएम नरेन्द्र मोदी का दौरा, नारी शक्ति सम्मेलन, और काशी विश्वनाथ धाम में दर्शन, सिर्फ धार्मिक या प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं थे, बल्कि गहरे राजनीतिक संकेत भी समेटे हुए थे। त्रिशूल और डमरू के प्रतीकात्मक प्रदर्शन से लेकर महिला सम्मेलन में बड़ी भागीदारी तक, हर दृश्य एक संदेश देता दिखा, भाजपा ‘संस्कृति ़ विकास ़ महिला सशक्तिकरण’ के त्रिकोण पर चुनावी रणनीति गढ़ रही है। एक ओर एक्सप्रेस-वे, इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और ग्लोबल समिट की बातें हैं, तो दूसरी ओर सांस्कृतिक पुनर्जागरण और आस्था का उभार, यह मिश्रण भाजपा के चुनावी मॉडल का केंद्र बनता जा रहा है।


नारी शक्ति : मुद्दा नहीं, चुनावी धुरी

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ‘नारी शक्ति’ अब केवल एक सामाजिक या नीतिगत विषय नहीं रह गया, बल्कि चुनावी धुरी बन चुका है। मुख्यमंत्री ने केंद्र की योजनाओं:- जनधन, उज्ज्वला, शौचालय, का हवाला देते हुए दावा किया कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा मिली है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पिछली सरकारों में महिलाओं को बुनियादी सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था। यहां भाजपा का स्पष्ट संदेश है, विकास और महिला सशक्तिकरण को एक साथ जोड़कर प्रस्तुत करना।


विपक्ष की रणनीति, सामाजिक समीकरण और असंतोष का समीकरण

विपक्ष के लिए चुनौती यह है कि वह भाजपा के इस बहुस्तरीय नैरेटिव का मुकाबला कैसे करे। सपा जहां पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समीकरणों को साधने में जुटी है, वहीं बसपा भी अपने पारंपरिक वोट बैंक को पुनर्जीवित करने की कोशिश में है। मायावती की रणनीति अपेक्षाकृत शांत लेकिन गणितीय मानी जाती है, वह सीधे टकराव से बचते हुए सामाजिक समीकरणों को साधने पर फोकस करती हैं। अखिलेश यादव की चुनौती दोहरी है, एक तरफ भाजपा के मजबूत संगठन और संसाधन, दूसरी ओर बसपा के साथ वोट कटाव की आशंका। ऐसे में सपा ‘स्थानीय मुद्दों’ और ‘सरकारी विफलताओं’ को उभारने की रणनीति पर काम कर रही है।


भाजपा का ब्लूप्रिंट: ‘डबल इंजन’ से ‘डबल नैरेटिव’ तक

भाजपा 2027 के लिए जिस रणनीति पर काम कर रही है, उसमें दो स्पष्ट स्तंभ दिखते हैं, विकास का विजन: एक्सप्रेस-वे, डिफेंस कॉरिडोर, डेटा सेंटर, निवेश, रोजगार. सामाजिक-सांस्कृतिक विमश: नारी शक्ति, धार्मिक आस्था, कानून-व्यवस्थ. ‘डबल इंजन सरकार’ का नारा अब ‘डबल नैरेटिव’ में बदलता दिख रहा है, जहां विकास और पहचान की राजनीति साथ-साथ चल रही है। यही कारण है कि काशी जैसे शहर को प्रतीकात्मक केंद्र बनाया जा रहा है, जहां से पूरे प्रदेश को संदेश दिया जा सके। मतलब साफ है भाजपा जहां ‘डबल इंजन सरकार’ के जरिए विकास, कानून-व्यवस्था और पारदर्शिता का दावा कर रही है, वहीं विपक्ष ‘डबल सवाल’ खड़े कर रहा है, रोजगार, महंगाई, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक जवाबदेही पर। मुख्यमंत्री ने इंसेफेलाइटिस नियंत्रण, आवास योजना और स्टार्टअप वृद्धि जैसे आंकड़ों के जरिए सरकार की उपलब्धियां गिनाईं, जबकि विपक्ष इन दावों की जमीनी सच्चाई पर सवाल उठा रहा है।


सियासी हकीकत

यूपी की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां चुनाव केवल मुद्दों से नहीं, बल्कि माहौल से भी तय होते हैं। कई बार ‘साइलेंट वोटर’ ने चैंकाने वाले परिणाम दिए हैं। बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के हालिया चुनावों की तरह यूपी में भी चुप्पी बड़ा संकेत बन सकती है।


2027: किन मुद्दों पर होगी निर्णायक जंग?

आगामी चुनाव में कुछ प्रमुख मुद्दे निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, नारी सुरक्षा और सशक्तिकरण. रोजगार और युवाओं की अपेक्षाएं. कानून-व्यवस्था और सुशासन. सामाजिक समीकरण (जाति आधारित राजनीति): धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान. इन सभी के बीच ‘विकसित यूपी’ बनाम ‘समान अवसर और न्याय’ का नैरेटिव टकराएगा। मतलब साफ है इस बार चुनाव केवल जातीय समीकरणों का नहीं, बल्कि भरोसे और धारणा का होगा, कौन जनता को अपने नैरेटिव पर विश्वास दिला पाता है।


जंग का आगाज, परिणाम अनिश्चित

विधानसभा का यह विशेष सत्र केवल एक दिन की कार्यवाही नहीं, बल्कि 2027 के महासंग्राम का उद्घोष है। यानी यूपी की सियासत में नगाड़ा बज चुका है। भाजपा अपने मजबूत संगठन, नेतृत्व और बहुस्तरीय नैरेटिव के साथ मैदान में है, तो विपक्ष भी अपनी जमीन तलाशने में जुटा है। 2027 का चुनाव केवल सत्ता का नहीं, बल्कि राजनीतिक दिशा का चुनाव होगा, जहां यह तय होगा कि प्रदेश विकास और पहचान की राजनीति के किस संतुलन को स्वीकार करता है। कहा जा सकता है ‘आधी आबादी’ के सम्मान से शुरू हुई यह बहस अब ‘विकसित यूपी’ बनाम ‘सामाजिक न्याय’ की व्यापक लड़ाई में बदल चुकी है। भाजपा ने नगाड़ा बजा दिया है, विपक्ष ने मोर्चा संभाल लिया है, अब नजर उस जनता पर है, जो चुप रहकर भी इतिहास लिखती है। या यूं कहे यूपी तैयार है, एक और निर्णायक जंग के लिए। फिलहाल, इतना तय है कि यह जंग लंबी चलेगी, तीखी होगी और हर दिन नए मोड़ लेगी। यूपी एक बार फिर देश की राजनीति का केंद्र बनने जा रहा है, और ‘जंग-ए-उत्तर प्रदेश’ का यह नगाड़ा अब थमने वाला नहीं।


विपक्ष की चुनौती

विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस बहुस्तरीय नैरेटिव का जवाब कैसे दे। मायावती ने महिला आरक्षण का समर्थन करते हुए इसे लागू न कर पाने पर चिंता जताई, जबकि सपा ने मौजूदा सीटों पर 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग कर भाजपा पर राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाया। अखिलेश यादव के लिए चुनौती दोहरी है, एक ओर भाजपा का मजबूत संगठन और आक्रामक नैरेटिव, दूसरी ओर बसपा के साथ संभावित वोट कटाव। ऐसे में सपा ‘जमीनी मुद्दों’ को उभारकर मुकाबला करना चाहती है।

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