नरौली गांव के लोगों का कहना है कि यहां संचालित आंगनबाड़ी केंद्र पर सभी बच्चों और महिलाओं को समान रूप से सुविधाएं नहीं मिल पातीं हैं। कई बार पोषण आहार की आपूर्ति नियमित नहीं होती, तो कभी स्वास्थ्य जांच समय पर नहीं हो पाती। गर्भवती महिलाओं को जो विशेष देखभाल और पोषण मिलना चाहिए, वह अक्सर अधूरा रह जाता है। किशोरियों के लिए आयरन और फोलिक एसिड जैसी आवश्यक सुविधाएं भी निरंतर नहीं मिलतीं। यह स्थिति केवल एक केंद्र की नहीं, बल्कि कई ग्रामीण क्षेत्रों की एक साझा समस्या बन चुकी है। मुजफ्फरपुर जिले में लगभग 5617 आंगनबाड़ी केंद्र चल रहे हैं, जिनमें से बड़ी संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित है। पिछले वर्ष ही राज्य सरकार ने 900 की जगह 400 की आबादी पर एक आंगनबाड़ी केंद्र खोलने की घोषणा की थी। जिसके बाद जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों की संख्या दस हजार से अधिक होने का अनुमान लगाया गया है। जिससे ज्यादा से ज्यादा गरीब परिवारों के बच्चों, गर्भवती और दूध पिलाने वाली महिलाओं तथा किशोरियों को लाभ मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। जिला के मुसहरी प्रखण्ड में भी सैकड़ों आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं, लेकिन इनकी गुणवत्ता और नियमितता पर सवाल खड़े होते रहे हैं। जिसका सीधा असर इसके लाभार्थियों के जीवन पर पड़ता है।
2026-27 के केंद्रीय बजट में सरकार ने आंगनबाड़ी सेवाओं के लिए लगभग 20,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि आवंटित करने की घोषणा की है, जो ‘सक्षम आंगनबाड़ी और पोषण 2.0’ योजना के तहत आती है। इसका उद्देश्य आंगनबाड़ी केंद्रों को और अधिक आधुनिक बनाना, पोषण स्तर में सुधार लाना और सेवाओं की गुणवत्ता को बढ़ाना है। वहीं बिहार सरकार ने भी अपने बजट में लगभग 10,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि महिला एवं बाल विकास योजनाओं, जिसमें आंगनबाड़ी भी शामिल हैं, के लिए निर्धारित की है। यह आंकड़े उम्मीद जगाते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह राशि सही तरीके से जमीन तक पहुँच रही है? हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछले पांच वर्षों में बिहार में आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति में बहुत हद तक सुधार हुआ है। कई केंद्रों में भवन निर्माण हुआ है, डिजिटल मॉनिटरिंग की शुरुआत हुई है और पोषण ट्रैकिंग सिस्टम को बेहतर बनाया गया है। जिससे बच्चों में कुपोषण के स्तर में थोड़ी कमी आई है और गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य जांच की संख्या में भी वृद्धि हुई है। लेकिन इन सुधारों के बावजूद, संसाधनों का सही वितरण का नहीं हो पाना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
सवाल यह उठता है कि क्या केवल योजनाएं बनाना और बजट आवंटित करना ही पर्याप्त है? जब एक गर्भवती महिला को समय पर पोषण नहीं मिलता है, जब एक बच्चा भूखे पेट सोने को मजबूर होता है, या जब एक किशोरी को अपने स्वास्थ्य के बारे में सही जानकारी नहीं मिलती, तब यह केवल एक व्यक्तिगत समस्या नहीं रह जाती, बल्कि यह पूरे समाज की जिम्मेदारी बन जाती है। यह भी समझना जरूरी है कि महिलाओं और बच्चों की देखभाल केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं हो सकती, खासकर तब जब परिवार खुद आर्थिक रूप से कमजोर हो। ऐसे में आंगनबाड़ी केंद्र एक सहारा बन सकते हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि वे पूरी क्षमता से काम करें। हर महिला, हर बच्चा और हर किशोरी को समान अधिकार और सुविधाएं मिलनी चाहिए, न कि किसी प्रकार का भेदभाव। इस स्थिति को सुधारने के लिए केवल सरकार ही नहीं, बल्कि समाज की भी भूमिका महत्वपूर्ण है। स्थानीय स्तर पर निगरानी समितियों को मजबूत करना, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बेहतर प्रशिक्षण और संसाधन देना, और समुदाय की भागीदारी बढ़ाना जरूरी है। अगर गांव के लोग खुद अपने केंद्र की जिम्मेदारी लें और उसकी निगरानी करें, तो बदलाव सबसे अधिक संभव है क्योंकि जब तक हर घर में पोषण और देखभाल की रोशनी नहीं पहुंचेगी, तब तक विकास की कहानी अधूरी ही रहेगी।
खुशी कुमारी
मुजफ्फरपुर, बिहार
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)



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