सीहोर : विश्वनाथपुरी में 18 अप्रैल का भव्य भंडारे का आयोजन - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

सीहोर : विश्वनाथपुरी में 18 अप्रैल का भव्य भंडारे का आयोजन

  • भक्त परमपद को पा लेता है तो वह संसार के माया बंधनों से मुक्त हो जाता : उद्ववदास महाराज

Bhandara-sehore
सीहोर। शहर के कंचन विहार विश्वनाथपुरी परिसर में श्री संकट मोचन हनुमान मंदिर समिति के तत्वाधान में जारी नौ दिवसीय श्रीराम कथा के दौरान महंत उद्ववदास महाराज ने भगवान श्रीराम और केवट का सुंदर प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया। केवट के यह कहने पर कि प्रभु तुम्हारी और हमारी जाति एक ही है बस अंतर इतना है कि मैं लोगों को गंगा पार करवाता हूं और आप जीवात्माओं को भावसागर पार कराते हो। मैं गंगा सागर का केवट हूं और आप संसार सागर के केवट हो। नि:संदेह वनवासी केवट ने प्रभु राम की स्वर्ण मुद्रांक लौटकर यह संदेश दिया कि जब भक्त परमपद को पा लेता है तो वह संसार के माया बंधनों से मुक्त हो जाता है।


उन्होंने कहाकि भगवान के काम के लिए हमें यदि संसार की निंदा और तिरस्कार भी सहन करना पडे तो हमें खुद को सौभाग्यशाली समझना चाहिए, बहुत कम लोग परहित के लिए अपने माथे पर दोष लेते हैं। रामायण में जिस कैकेयी को सबकी बुराई और अपमान सहन करना पडा, उस कैकेयी ने प्रभु की इच्छा से ही वनवास भेजने का कलंक अपने माथे पर लिया। भगवान केवल रावण को मारने के लिए वन नहीं गए बल्कि केवट, निषाद, शबरी, जटायु, सुतीक्ष्ण जैसे भक्तों के लिए वन गए जो सहस्त्र वर्षो से मन में प्रगाढ विश्वास लिए भगवान के दर्शन की राह देख रहे थे। भगवान के इस काम में कैकेयी ने उनकी सहायता की, यदि कैकेयी नहीं होती तो संसार और भक्तों का कल्याण नहीं हो पाता इसलिए कैकेयी निंदनीय नहीं बल्कि वंदनीय है। आजकल बुराई का जमाना है, लोगों को परनिंदा करने में बहुत सुख मिलता है। निन्दा करने से सामने वाले के पाप तो नष्ट हो  जाते हैं किन्तु निन्दा करने वाले के खाते में जुड़ जाते है। इसलिए सबसे अच्छाई ही देखे, बुराई का दर्शन न करें।

1. श्री राम और भाइयो मे सम्पति का नहीं विपत्ति का बटवारा हुआ लक्ष्मण जी वन मे और भरत जी भी नंदी ग्राम मे तपस्वी बनकर रहे

2. केवट प्रसंग का विस्तार से वर्णन करते हुए समरसता का संदेश दिया।

3. भगवान से हमें अपनापन बनाकर कोई भी मित्र गुरु पिता भाई का रिश्ता बनाकर संवाद करना चाहिए उनसे बात करना चाहिए

4. हमें इन्द्रियों का निग्रह करना चाहिए यानि आँख कान क्या देखे क्या सुने ये हमें मर्यादा रखना होगी

5. भगवान प्रेम के वशिभूत होते है भगवान जगन्नाथ जी का रूप प्रेम में पिघलने से बना है क्योंकि वे गोपियों के प्रेम की कथा सुनकर द्रवित हो गए थे। 

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