पुस्तक समीक्षा : वैज्ञानिक जनवरी मार्च 26 अंक सांख्यिकीय - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 31 मई 2026

पुस्तक समीक्षा : वैज्ञानिक जनवरी मार्च 26 अंक सांख्यिकीय

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यह अंक गणित और सांख्यिकी में पढ़ रहे छात्रों के लिए उपयोगी है जिसमें सांख्यिकीय विश्लेषण (Statistical Analysis) बड़ी मात्रा में डेटा (आंकड़ों) को एकत्र करने, व्यवस्थित करने, विश्लेषण करने और प्रस्तुत करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य पैटर्न, रुझान और संबंधों को उजागर करना है। यह शोध, व्यवसाय, और नीति-निर्माण में सटीक निर्णय लेने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें आमतौर पर वर्णनात्मक  और अनुमानित विधियों का उपयोग किया जाता है।अतः इन्ही विषय पर एक्सपीरियंस पर्सन के लेख हैसांख्यिकी गणित की एक उपयोगी शाखा है। इसका उपयोग विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के अध्ययन में और किसी राज्य या संस्था की विविध सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों और समस्याओं के विश्लेषण में किया जाता है। प्राचीन काल में, सांख्यिकी राजनीति का एक हिस्सा थी और इसका उपयोग राज्य के अधिकारियों द्वारा राज्य से संबंधित डेटा इकट्ठा करने के लिए किया जाता था, जैसे जन्म दर, मृत्यु दर, राज्य का राजस्व, उद्योग आदि।डॉ प्रशांता चंद्र महालनोबिस (1893-1972) को "भारत में सांख्यिकी का जनक" माना जाता है, उन्हें इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट (ISI) की स्थापना के लिए जाना जाता है,आज इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट में प्रवेश हेतु छात्रों को कई एग्जाम पास कर सांख्यिकी में डिग्री मिलता है अतः अभी इस अंक को निकालने का उद्देश्य यह था कि अभी इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट के एग्जाम में बैठने हेतु छात्रों में रूचि पैदा की जाए 18वीं सदी के जर्मनी में, सांख्यिकी को "स्टेटस्टिक " नामक एक स्वतंत्र विषय के रूप में पढ़ा जाने लगा, लेकिन, मध्य युग की तरह, इसका दायरा सीमित रहा और मुख्य रूप से राज्य के मामलों से संबंधित था। आधुनिक समय में सांख्यिकी का अर्थ प्राचीन काल के अर्थ से काफी अलग है। हालाँकि, आज भी इसका उपयोग डेटा इकट्ठा करने के अर्थ में किया जाता है। सांख्यिकी वैज्ञानिक पद्धति की वह शाखा है जो डेटा के विश्लेषण से संबंधित है। यह डेटा गिनती और माप के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। सांख्यिकी को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है: "वह विज्ञान जो डेटा के संग्रह, विश्लेषण और व्याख्या से संबंधित नियमों का अध्ययन करता है, उसे सांख्यिकी कहा जाता है।" आधुनिक समय में, सांख्यिकी का उपयोग ज्ञान के लगभग सभी क्षेत्रों में किया जाता है। इस दृष्टिकोण से, फर्ग्यूसन (1971) ने इसकी सबसे आधुनिक परिभाषा देते हुए लिखा: "सांख्यिकी वैज्ञानिक पद्धति की एक शाखा है जो सर्वेक्षणों और प्रयोगों के माध्यम से प्राप्त डेटा के संग्रह, वर्गीकरण और व्याख्या से संबंधित है।" रोस्को ने सांख्यिकी को एक आधुनिक शैक्षणिक अनुशासन के रूप में परिभाषित किया जो व्यवहार विज्ञान में पाई जाने वाली मात्रात्मक जानकारी के संग्रह, संगठन, सरलीकरण और विश्लेषण के लिए एक वैज्ञानिक प्रक्रिया प्रदान करता है। आज सांख्यिकी का उपयोग और महत्व डाटा हेतु बढ़ रहा है  आज, डाटा विज्ञान व सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में किए जा रहे अध्ययनों और शोध में सांख्यिकी का महत्व दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। जैसे-जैसे सामाजिक विज्ञान में मनोविज्ञान, शिक्षा और समाजशास्त्र की प्रकृति अधिक वैज्ञानिक होती जा रही है, इन विषयों में सांख्यिकी का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। सांख्यिकी वैज्ञानिक अनुसंधान में कई कार्य करती है। इसमें भारत में इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट (ISI) भारत में एक अग्रणी , सरकार से वित्त पोषित,  रिसर्च यूनिवर्सिटी है, जिसे 1931 में कोलकाता में पी.सी. महालनोबिस ने शुरू किया था। इसे एक इंस्टिट्यूट ऑफ़ नेशनल इंपॉर्टेंस घोषित किया गया था, जो स्टैटिस्टिक्स, नेचुरल साइंस और सोशल साइंस पर फोकस करता है। इसके मुख्य सेंटर कोलकाता, बैंगलोर, दिल्ली, चेन्नर्र में है उसमे प्रवेश बहुत टफ एग्जाम के बाद मिलता है वो भी सिर्फ गणित  दरअसल : बात 1994 की है जब बीएससी मैथ के साथ करने पर इंडियन स्टेटसटिकल इंस्टिट्यूट कोलकाता में एम्प्लॉयमेंट न्यूज़ में पत्राचार कोर्स को देखा उसमें एक जूनियर डिप्लोमा बीएससी मैथ के बाद और सीनियर डिप्लोमा एमएससी मैथ के कैंडिडेट के लिए था जो बीएससी प्रोफेशनल डिग्री इन स्टेटसटिक्स, व एमएससी इन स्टेटसटिक्स के समकक्ष था सबमें 5 पेपर हीं थे पटना से कोलकाता में एग्जाम होता था जूनियर डिप्लोमा जो बीएससी स्टेटसटिक्स के बराबर था उसमें एप्लीकेशन किया और एग्जाम के लिए पटना से कोलकत्ता गया पहली बार जब पेपर देखा तो मुश्किल से 30 परसेंट हीं बना और 4 -5 कैंडिडेट हीं एग्जाम देते थे वहाँ बड़ा कैम्पस था अतः जब एग्जाम के बाद सर घुमा तो डिपार्टमेंट में घुमा अतः निराशा हीं हाथ लगा 2 साल लगे और सारा पेपर कम्पलीट किया और वहाँ से डिग्री मिली और उसमें रूचि हुई सांख्यिकी, में क्वालिफिकेशन कभी बेकार नहीं जाता है जिस समय नौकरी के लिए मारा मारी थी एक वैज्ञानिक संस्थान में भी मेरा रिटेन के बाद इंटरव्यू अच्छा नहीं गया था लेकिन अन्त में कमिटी के चेयरमैन ने पूछा आपने और कुछ किया है तो मैंने बताया की भारतीय सांख्यिकी संस्थान से जूनियर डिप्लोमा एग्जाम पास की है जो सांख्यिकी में डिग्री के समकक्ष है उन्होंने देखा और लगभग सभी सदस्यो ने देखा और बाद में सलेक्शन हुआ वैज्ञानिक पत्रिका मुंबई के वैज्ञानिकों ने 1968 में हिंदी विज्ञान साहित्य परिषद की नींव रखी और 2साल बाद वैज्ञानिक पत्रिका का सतत प्रकाशन हुआ जो आज भी ऑनलाइन माध्यम से चल रही है का प्रेरणादायक पलों व गणमान्य विज्ञान लेखकों द्वारा सजाया गया है जिसमें मुख्य लेखकों में डॉ दया शंकर त्रिपाठी, डॉ मनीष मोहन गोरे, डॉ सरोज शुक्ला, डॉ संजय कुमार, बीएचयू,श्री डॉ जे सी व्यास ,डॉ सतेंद्र गौतम श्री राजेश कुमार मिश्र, श्री उत्तम सिँह गहरवार, डॉ अंकिता मिश्रा, डॉ दीपक कोहली, डॉ हेमलता पंत, डॉ मनोज सिंह, श्री बी एन मिश्र,. डॉ अमित कु मौर्या डॉ. महेश सिंह,डॉ. परवीन कुमार जैन, डॉ. विन्नी जॉन श्री प्रकाश कश्यप, धर्मेंद्र सिंह,आदि प्रमुख हैं अतः छात्रों को इस विषय में रूचि हो की वो सांख्यिकी, में अपना करियर बना सकें.,इसके मुख्य संपादक श्रीब्रजेश कुमार हैं व मुख्य व्यस्थापक डॉ संजय गोस्वामी हैं संपादकीय बोर्ड के सदस्य सर्वश्री, राजेश कुमार मिश्र,राजेश कुमार, केके वर्मा, डॉ संजय कुमार पाठक, शेर सिंह मीणा,निक के व्यवस्थापक ,सर्वश्री श्री नवीन त्रिपाठी, बी.एन. मिश्र,अनिल अहिरवार, प्रकाश कश्यप, राज़ कुमार डाबरा बधाई के पात्र हैँ.विज्ञान साहित्य का ऐसा मिला-जुला ढंग उस साहित्य के सृजन में सहायक होता है जो पूर्णत: भौतिकवादी होता है तथा शुद्ध कला का निर्माण नहीं करता है.हिंदी विज्ञान की पत्रिका वैज्ञानिक का योगदान विज्ञान संचार हेतु जरुरी है ताकि इससे नवविज्ञान लेखकों क़ो एक वैज्ञानिक मंच मिल सके. आज हिंदी में विज्ञान की पत्रिका बाजार में लगभग विलुप्त हो गई है जो भी निकल रहा हैं वो छात्रों के कम्पटीशन एग्जान का ही निकल रहा है लेकिन जनमानस में बहुत ही कम पत्रिका हिंदी में पढ़ने को मिलती है ऐसे में वैज्ञानिक पत्रिका का प्रकाशन एक सराहनीय कदम है.





संजय गोस्वामी 

समीक्षक

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