माकपा ने कहा कि शीर्ष अदालत ने पर्याप्त नोटिस दिये बिना ‘‘वैध मतदाताओं’’ के नाम हटाए जाने की रिपोर्टों और सत्यापन प्रक्रियाओं को पूरा करने में हाशिए पर रहने वाले नागरिकों की कठिनाइयों को नजरअंदाज कर दिया है। पश्चिम बंगाल में एसआईआर कवायद का जिक्र करते हुए माकपा ने आरोप लगाया कि राज्य में एक करोड़ से अधिक मतदाताओं को संदिग्ध के रूप में वर्गीकृत किया गया था और दावा किया कि न्यायिक उपाय अपनाने के बावजूद अंततः 27 लाख मतदाताओं ने मतदान का अधिकार खो दिया। माकपा ने अदालत के उस निर्देश पर भी आपत्ति जताई जिसमें निर्वाचन आयोग (ईसी) को हटाए गए मतदाताओं के नाम नागरिकता सत्यापन के लिए संबंधित अधिकारियों को सौंपने के लिए कहा गया था। माकपा ने आरोप लगाया कि फैसले में निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और स्वतंत्रता में ‘‘जनता के घटते विश्वास’’ से संबंधित चिंताओं का समाधान नहीं किया गया है। अपनी राजनीतिक प्रतिक्रिया की घोषणा करते हुए, पार्टी ने कहा कि हाल में हुई केंद्रीय समिति की बैठक के दौरान यह निर्णय लिया गया कि मतदान के अधिकार की रक्षा करने और व्यापक चुनावी सुधारों की मांग करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया जायेगा। बयान में कहा गया है, ‘‘पार्टी इस राष्ट्रव्यापी संघर्ष में समान विचारधारा वाली पार्टियों और ताकतों को एकजुट करने का प्रयास करेगी।’’
नई दिल्ली। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को बरकरार रखने संबंधी उच्चतम न्यायालय के फैसले की बृहस्पतिवार को कड़ी आलोचना करते हुए इसे ‘‘न्याय का मजाक’’ और ‘‘लोकतंत्र पर करारा प्रहार’’ बताया। माकपा ने मतदान के अधिकारों की रक्षा करने और चुनावी सुधारों के लिए दबाव बनाने के वास्ते एक राष्ट्रव्यापी अभियान की घोषणा की। पार्टी के पोलित ब्यूरो द्वारा जारी एक बयान में दावा किया गया कि उच्चतम न्यायालय ने एसआईआर प्रक्रिया को बरकरार रखते हुए, सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों को बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने, उन्हें बहिष्कृत करने और उन्हें डराने-धमकाने को ‘‘संवैधानिक वैधता’’ प्रदान कर दी है। इसमें कहा गया है, ‘‘मतदाता सूचियों के एसआईआर को बरकरार रखने संबंधी उच्चतम न्यायालय का फैसला न्याय का घोर मजाक है।’’ पार्टी के अनुसार एसआईआर प्रक्रिया के जरिये निर्धारित दस्तावेजों की कमी के कारण गरीब, प्रवासी, अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी और हाशिए पर रहने वाले अन्य वर्गों के मतदाताओं के नाम को मतदाता सूची से हटा दिया गया था। बयान में आरोप लगाया है, ‘‘पूरी एसआईआर प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव था।’’

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