उन्होंने मृदा जैविक कार्बन तथा दीर्घकालिक मृदा उर्वरता के संरक्षण के महत्व पर बल देते हुए कहा कि संरक्षण कृषि कार्बन तटस्थता प्राप्त करने की दिशा में सबसे टिकाऊ उपायों में से एक है। इसके माध्यम से बेहतर मृदा संरचना, जल धारण क्षमता में वृद्धि, जैव विविधता संरक्षण तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी जैसी अनेक पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्राप्त होती हैं। डॉ. मंडल ने आंशिक कारक उत्पादकता को पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने, उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने तथा गहन कृषि प्रणालियों में निवेश उपयोग की स्थिरता सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण संकेतक बताया। उन्होंने दीर्घकालिक संरक्षण कृषि प्रणालियों में मृदा सघनता एवं पोषक तत्व स्तरीकरण जैसी समस्याओं के समाधान हेतु सामरिक जुताई को एक आवश्यक सुधारात्मक उपाय के रूप में भी रेखांकित किया, जिससे बिना जुताई वाली कृषि प्रणाली के समग्र लाभ भी सुरक्षित रहते हैं।
व्याख्यान के दौरान उन्होंने कार्बन फार्मिंग के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा की तथा संरक्षण जुताई, फसल अवशेष संरक्षण, कृषिवानिकी, कवर क्रॉपिंग, समेकित पोषक तत्व प्रबंधन एवं विविधीकृत फसल प्रणाली जैसी पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन पद्धतियों को कार्बन स्थिरीकरण एवं पारिस्थितिकीय स्थिरता के लिए अत्यंत उपयोगी बताया। उन्होंने कार्बन फार्मिंग की आर्थिक उपयोगिता पर भी प्रकाश डालते हुए इसे उभरती कार्बन क्रेडिट प्रणाली से जोड़ा तथा किसानों को दीर्घकालिक एवं न्यायसंगत लाभ सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी नीतिगत एवं संस्थागत ढाँचे की आवश्यकता पर बल दिया। अपने संबोधन में संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास ने व्याख्यान को ज्ञानवर्धक बताते हुए वैज्ञानिकों को मृदा कार्बन संबंधी अनुसंधानों को और सुदृढ़ करने के लिए ऐसे वैज्ञानिक दृष्टिकोणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम में महत्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एस. के. पूर्वे, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एम. सी. मीणा, संस्थान के विभिन्न प्रभागाध्यक्षों, वैज्ञानिकों, कर्मचारियों तथा आईएआरआई पटना हब के विद्यार्थियों ने भाग लिया कार्यक्रम का समापन डॉ. रोहन कुमार रमण, वरिष्ठ वैज्ञानिक द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

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