माँ की गोद में सिर रखकर रो लेने को तरसने लगे,
पिता की उंगली पकड़कर सड़क पार करना,
अब बस एक अधूरा सपना बनकर रह गया,
जिस स्कूल को कभी अपना दूसरा घर कहते थे,
उस रास्ते से गुज़रे भी अब ज़माना बीत गया,
सपनों के पीछे भागते-भागते हम इतने दूर आ गए,
कि अपने ही घर में मेहमान बनकर जाने लगे,
वक़्त के साथ सिर्फ़ घड़ियाँ ही नहीं बदलीं,
पूरा दौर बदल गया, और शायद हमारी ज़िंदगी भी।।
वंदना
उम्र: 26 वर्ष
शिक्षा: स्नातक
टीम गांव की आवाज

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