जब से मैं दिशा सभा से जुड़ी,
पहले सपने बिखरे-बिखरे थे,
उनका नहीं था कोई ठिकाना,
इधर-उधर भटकती सोच में,
बस सपनों की बातें ही हुआ करती थीं,
लेकिन दिशा सभा से जुड़ने के बाद,
मुझे मेरे सपनों को नई राह मिली,
नई सोच और खुद पर विश्वास मिला,
अब मेरे सपनों के ठिकाने बदल गए हैं,
अब सिर्फ़ सपने देखना ही नहीं है,
मुझे उसे खुलकर जीना भी है,
कुछ करना है, कुछ बनना है,
और अपने सपनों को सच में बदलना है।
भावना बिष्ट
कक्षा: 7वीं
गाँव: सुराग, उत्तराखंड
गांव की आवाज

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