कभी आपने सोचा है कि यदि जीवन की भागती हुई घड़ी अचानक कुछ अतिरिक्त दिन दे दे तो मनुष्य उनका क्या करेगा? शायद कुछ लोग और धन कमाने की योजना बनाएंगे, कुछ अधूरे काम पूरे करेंगे और कुछ नई इच्छाओं की सूची तैयार कर लेंगे। लेकिन भारतीय संस्कृति ने इन अतिरिक्त दिनों को एक बिल्कुल अलग अर्थ दिया है। उसने कहा, यह समय संसार बढ़ाने के लिए नहीं, स्वयं को बेहतर बनाने के लिए है। यही समय है पुरुषोत्तम मास का। भारतीय पंचांग में आने वाला यह मास केवल गणितीय गणना का परिणाम नहीं है। यह केवल चंद्र और सूर्य की गति के अंतर को संतुलित करने का उपाय भी नहीं है। सनातन परंपरा ने इसे भगवान विष्णु के नाम से जोड़कर साधना, आत्मशुद्धि और भक्ति का ऐसा पर्व बना दिया, जिसमें मनुष्य बाहरी उपलब्धियों से अधिक भीतर की यात्रा पर निकलता है। कहा जाता है कि जिस अतिरिक्त महीने को कभी उपेक्षित समझा गया, उसे स्वयं भगवान विष्णु ने अपना नाम देकर पुरुषोत्तम मास बना दिया। शायद इसलिए यह महीना जीवन का भी एक बड़ा संदेश देता है कि ईश्वर की दृष्टि में कोई भी तुच्छ नहीं होता। आज के दौर में, जब मोबाइल की स्क्रीन की चमक चेहरों की मुस्कान से अधिक दिखाई देने लगी है, जब व्यस्तता ने मनुष्य को स्वयं से दूर कर दिया है, तब पुरुषोत्तम मास केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं रह जाता, बल्कि यह आत्मसंवाद का अवसर बन जाता है। यह मानो समय का संदेश है, कुछ देर ठहरो, संसार बाद में भी मिलेगा, पहले स्वयं से मिलो
भारतीय संस्कृति में समय का दर्शन
भारतीय परंपरा समय को केवल घड़ी की सुई या कैलेंडर की तारीख नहीं मानती। यहां समय को भी जीवंत सत्ता माना गया है। हमारे यहां कहा गया, कालो हि दुरतिक्रमः अर्थात समय से बढ़कर कुछ नहीं। इसीलिए भारतीय जीवन में समय को भी पूजा गया है। सुबह ब्रह्ममुहूर्त, संध्या वंदन, एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या सब समय की पवित्रता को दर्शाते हैं। पुरुषोत्तम मास इसी विचार का विस्तार है। यह हमें बताता है कि यदि समय का उपयोग सही दिशा में हो जाए तो जीवन बदल सकता है।
पुरुषोत्तम मास में क्या करना चाहिए?
शास्त्रों के अनुसार इस मास में कुछ विशेष कार्य अत्यंत पुण्यदायक माने गए हैं :-
1. भगवान विष्णु की उपासना : इस मास में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व माना गया है। विष्णुसहस्रनाम का पाठ, गीता पाठ, श्रीमद्भागवत श्रवण, रामायण पाठ, मंत्र जाप. इनका विशेष फल बताया गया है।
2. दान : भारतीय संस्कृति में दान केवल वस्तु देने का कार्य नहीं है, बल्कि अहंकार त्यागने का अभ्यास भी है। इस मास में अन्नदान, वस्त्रदान, गौसेवा, जलदान, गरीबों की सहायता विशेष फलदायी माने जाते हैं।
3. व्रत और संयम : पुरुषोत्तम मास केवल भोजन त्यागने का नाम नहीं है। सच्चा व्रत है क्रोध का त्याग, कटु वचन का त्याग, बुरी आदतों से दूरी, आत्मसंयम. यदि व्यक्ति केवल भोजन छोड़ दे और व्यवहार में कटुता बनाए रखे, तो व्रत अधूरा माना गया है।
4. सत्संग : मनुष्य जैसा सुनता है, वैसा ही बनने लगता है। इसलिए इस मास में सत्संग, धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन और श्रेष्ठ विचारों का चिंतन विशेष महत्व रखता है।
पुरुषोत्तम मास में विवाह और मांगलिक कार्य नहीं होते?
परंपरागत रूप से इस मास में विवाह, गृहप्रवेश और कुछ बड़े मांगलिक कार्यों को स्थगित रखा जाता है। इसके पीछे केवल धार्मिक कारण नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि भी दिखाई देती है। मनुष्य का अधिकांश समय सांसारिक कार्यों में बीतता है। इसलिए वर्ष के इस विशेष समय को केवल आध्यात्मिक चिंतन के लिए सुरक्षित रखा गया। यह ऐसा है जैसे भागते हुए जीवन में कुछ समय आत्मा के लिए बचा लिया जाए।
यह अंधविश्वास है या विज्ञान?
कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि अतिरिक्त मास का धार्मिक महत्व क्यों? वास्तव में इसकी शुरुआत खगोल विज्ञान से हुई। चंद्र और सौर वर्ष के बीच अंतर को संतुलित करने के लिए अधिक मास आवश्यक था। लेकिन भारतीय मनीषियों की विशेषता यह थी कि उन्होंने विज्ञान को केवल गणना तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उसे संस्कृति और अध्यात्म से जोड़ दिया। इस प्रकार यहां विज्ञान और अध्यात्म विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बन गए।
आधुनिक जीवन और पुरुषोत्तम मास
आज मनुष्य के पास साधन अधिक हैं, लेकिन शांति कम है। मोबाइल की स्क्रीन चमक रही है, लेकिन चेहरों की चमक कम होती जा रही है। सूचनाएं बढ़ी हैं, लेकिन आत्मज्ञान घटता दिखाई देता है। सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन संतोष घट रहा है। ऐसे समय में पुरुषोत्तम मास का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें बताता है, कुछ समय स्वयं को दीजिए। अपने भीतर उतरिए। संबंधों को सुधारिए। ईश्वर से संवाद कीजिए। सामाजिक दृष्टि से पुरुषोत्तम मास यह मास केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से समाज में अनेक सकारात्मक कार्यों को बढ़ावा मिला :- गरीबों की सहायता, सामूहिक भजन, धार्मिक आयोजन, अन्नक्षेत्र, पर्यावरण संरक्षण, पुराने समय में लोग इस अवधि में वृक्षारोपण भी करते थे। क्योंकि भारतीय परंपरा केवल मनुष्य नहीं, संपूर्ण प्रकृति को परिवार मानती है।
साहित्य और पुरुषोत्तम मास
भारतीय साहित्य में भक्ति का स्वर अत्यंत व्यापक है। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा, परहित सरिस धर्म नहि भाई। भक्ति साहित्य हमें केवल पूजा करना नहीं सिखाता, बल्कि दूसरों के लिए जीना भी सिखाता है। पुरुषोत्तम मास इसी भावना को और अधिक गहरा करता है।
पुरुषोत्तम मास का वास्तविक संदेश
यदि कोई व्यक्ति पूरे महीने पूजा करे, व्रत रखे, दान करे, लेकिन उसके भीतर अहंकार बना रहे तो पुरुषोत्तम मास अधूरा रह जाता है। इस मास का वास्तविक उद्देश्य है मन की सफाई, विचारों की शुद्धि, व्यवहार की मधुरता, ईश्वर के प्रति समर्पण, क्योंकि मनुष्य की सबसे बड़ी यात्रा बाहर नहीं, भीतर की यात्रा है।
जब अतिरिक्त समय, अतिरिक्त जीवन बन जाए
जीवन में अक्सर हम कहते हैं समय नहीं है. लेकिन पुरुषोत्तम मास मानो ईश्वर का उत्तर है लो, मैंने तुम्हें अतिरिक्त समय दिया है। अब इसे केवल खर्च मत करो, इसे सार्थक भी बनाओ। पुरुषोत्तम मास केवल पंचांग का अतिरिक्त अध्याय नहीं है, बल्कि जीवन का अतिरिक्त अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य केवल शरीर नहीं, केवल इच्छाओं का समूह नहीं, केवल सफलता का नाम नहीं है। उसके भीतर एक चेतना भी है, जिसे समय-समय पर जागृत करना आवश्यक है। जब संसार की दौड़ थका दे, जब मन अशांत हो जाए, जब उपलब्धियां भी खाली लगने लगें— तब पुरुषोत्तम मास का संदेश सुनाई देता है कुछ देर रुकिए, स्वयं से मिलिए, क्योंकि ईश्वर तक जाने का मार्ग बाहर नहीं, भीतर से होकर गुजरता है।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी




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