- बढ़ती कार्रवाई और संवेदनशील चुनौती
सुप्रीम कोर्ट का रुख
वर्ष 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि सार्वजनिक स्थानों पर नए धार्मिक ढाँचों के निर्माण की अनुमति न दी जाए। अदालत ने यह भी कहा था कि सड़कों, पार्कों और सरकारी भूमि पर बने अवैध धार्मिक स्थलों की पहचान कर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। इसके बाद कई राज्यों ने जिला स्तरीय समितियाँ गठित कीं और सर्वेक्षण शुरू किए। हालाँकि, धार्मिक संवेदनशीलता के कारण अधिकांश राज्यों में कार्रवाई बेहद सावधानी के साथ की जाती रही है।
किन राज्यों में सबसे अधिक कार्रवाई हुई
उत्तर प्रदेश-देश में सरकारी भूमि से धार्मिक अतिक्रमण हटाने की सबसे व्यापक कार्रवाई उत्तर प्रदेश में देखने को मिली। सड़क, तालाब, ग्राम समाज और नगर निकाय की भूमि पर बने हजारों अवैध ढाँचों को चिन्हित किया गया। प्रशासन ने कई जिलों में नोटिस जारी किए और “स्वैच्छिक हटाओ” अभियान चलाया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई बार कहा कि सरकारी भूमि पर किसी भी प्रकार का अवैध कब्जा स्वीकार नहीं किया जाएगा। हाल के अभियानों में नोएडा और ग्रेटर नोएडा में प्रशासन ने लगभग 5900 करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी भूमि मुक्त कराने का दावा किया।
उत्तराखंड-उत्तराखंड में वनभूमि और सड़क किनारे बने अवैध धार्मिक ढाँचों पर विशेष अभियान चलाया गया। हरिद्वार, हल्द्वानी, नैनीताल और देहरादून में अवैध मजारों और मंदिरों को हटाने की कार्रवाई चर्चा में रही। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी और किसी को कानून से ऊपर नहीं माना जाएगा। असम-असम में मुख्यमंत्री हिमन्त बिस्वा शर्मा के नेतृत्व में वनभूमि और सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने के अभियान तेज हुए। राज्य सरकार का कहना रहा कि विकास योजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकारी भूमि को मुक्त कराना आवश्यक है। कई जगह धार्मिक ढाँचों को लेकर विवाद भी सामने आए। गुजरात और मध्य प्रदेश-गुजरात में सड़क चैड़ीकरण और नगर विकास परियोजनाओं के दौरान अनेक धार्मिक अतिक्रमण हटाए गए। अहमदाबाद और वडोदरा जैसे शहरों में प्रशासन ने सार्वजनिक भूमि खाली कराई। मध्य प्रदेश के भोपाल, इंदौर और ग्वालियर में भी इसी प्रकार की कार्रवाई हुई। राज्य सरकार ने कहा कि धर्म के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
दिल्ली-दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद नगर निगमों ने सड़कों, फुटपाथों और पार्कों पर बने अवैध धार्मिक ढाँचों की पहचान शुरू की। राजधानी में कई छोटे मंदिर, मजार और अन्य ढाँचे सार्वजनिक मार्गों में बाधा के रूप में चिन्हित किए गए। मुंबई के बांद्रा में रेलवे की बड़ी कार्रवाई-हाल के दिनों में मुंबई के बांद्रा पूर्व स्थित गरीब नगर क्षेत्र में पश्चिम रेलवे द्वारा चलाया गया अतिक्रमण हटाओ अभियान राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना। रेलवे प्रशासन ने दावा किया कि यह भूमि रेलवे विस्तार और बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए आवश्यक है। रिपोर्टों के अनुसार, अभियान के दौरान लगभग 480 घरों और अन्य अवैध ढाँचों को हटाया गया तथा वर्षों पुराने अतिक्रमणों को तोड़ा गया। रेलवे अधिकारियों ने कहा कि कार्रवाई अदालत की अनुमति और पूर्व नोटिसों के बाद की गई। इस कार्रवाई के दौरान कुछ धार्मिक संरचनाओं को नुकसान पहुँचने की खबरों के बाद क्षेत्र में तनाव भी पैदा हुआ। विरोध प्रदर्शन और झड़पों की घटनाएँ सामने आईं, जिसके बाद भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने पुनर्वास की अपर्याप्त व्यवस्था का मुद्दा भी उठाया। यह मामला इस बात का उदाहरण बन गया कि सरकारी भूमि खाली कराने की कार्रवाई केवल प्रशासनिक विषय नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक और धार्मिक संवेदनशीलता से भी जुड़ जाती है।
सबसे अधिक संख्या किस धार्मिक स्थल की
विभिन्न राज्यों की प्रशासनिक रिपोर्टों और मीडिया विश्लेषणों के अनुसार सरकारी भूमि पर बने अवैध धार्मिक स्थलों में सबसे अधिक संख्या मंदिरों की बताई जाती है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि भारत में मंदिरों की कुल संख्या अन्य धार्मिक स्थलों की तुलना में बहुत अधिक है। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में कई बार किसी पेड़, चबूतरे या छोटे पूजा स्थल से शुरुआत होती है और धीरे-धीरे वह स्थायी मंदिर का रूप ले लेता है। हालाँकि, कई राज्यों में मस्जिदों, मजारों, गुरुद्वारों और चर्चों से जुड़े भूमि विवाद भी सामने आए हैं। उत्तराखंड में अवैध मजारों को लेकर विशेष अभियान चर्चा में रहे, जबकि कुछ महानगरों में सड़क किनारे बने छोटे मंदिरों और मस्जिदों पर कार्रवाई हुई।
कितनी भूमि मुक्त कराई गई
देशभर में मुक्त कराई गई सरकारी भूमि का कोई एकीकृत राष्ट्रीय आँकड़ा उपलब्ध नहीं है। फिर भी विभिन्न राज्यों ने हजारों हेक्टेयर भूमि से अतिक्रमण हटाने का दावा किया है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्टों के अनुसार देश के अनेक राज्यों में लाखों हेक्टेयर वनभूमि पर अतिक्रमण दर्ज है। इनमें आवासीय निर्माण, खेती, व्यावसायिक उपयोग और धार्मिक ढाँचे सभी शामिल हैं। राज्य सरकारों का कहना है कि अतिक्रमण हटाने से सड़क चैड़ीकरण, रेलवे विस्तार, जल निकासी, पार्क निर्माण और विकास योजनाओं को गति मिलती है।
राजनीतिक और सामाजिक चुनौती
धार्मिक अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई प्रशासन के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहती है। किसी भी धार्मिक स्थल पर कार्रवाई से स्थानीय लोगों की भावनाएँ प्रभावित हो सकती हैं। इसी कारण कई बार प्रशासन पहले समझौते, स्थानांतरण या स्वैच्छिक हटाने का विकल्प देता है। विपक्षी दल अक्सर आरोप लगाते हैं कि कार्रवाई चयनात्मक होती है, जबकि सरकारें दावा करती हैं कि अभियान सभी धर्मों के अवैध निर्माणों के खिलाफ समान रूप से चलाए जा रहे हैं। अदालतें भी समय-समय पर यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे को केवल धार्मिक आधार पर वैध नहीं माना जा सकता। भारत में सरकारी जमीनों पर बने धार्मिक स्थलों का मुद्दा केवल अतिक्रमण का प्रश्न नहीं, बल्कि कानून, आस्था, राजनीति और प्रशासन के बीच संतुलन की बड़ी चुनौती बन चुका है। लगभग हर राज्य में ऐसे मामले मौजूद हैं और समय-समय पर अभियान चलाए जाते रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि अवैध धार्मिक ढाँचों में मंदिरों की संख्या सबसे अधिक है, लेकिन मस्जिद, मजार, गुरुद्वारे और चर्च भी विवादों में शामिल रहे हैं। मुंबई के बांद्रा में रेलवे की हालिया कार्रवाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में सरकारी भूमि को मुक्त कराने की मुहिम और तेज हो सकती है। लेकिन सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही रहेगी कि कानून का पालन भी हो और धार्मिक-सामाजिक संवेदनशीलता भी बनी रहे।
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

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