मंदिर परिसर में आयोजित रामलीला में कलाकारों ने अशोक वाटिका और लंका दहन लीला का मंचन किया। इस दौरान हनुमान जी के पराक्रम और माता सीता की खोज के प्रसंगों को जीवंत किया गया। मंचन की शुरुआत में, वानर राज सुग्रीव ने राजपाट मिलने के बाद जामवंत और हनुमान को माता सीता की खोज के लिए दक्षिण दिशा में भेजा। विशाल समुद्र तट पर उनकी मुलाकात गिद्धराज के भाई संपाति से हुई, जिन्होंने बताया कि सौ योजन समुद्र लांघने वाला ही माता सीता का पता लगा पाएगा। यह सुनकर सभी वानर एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। तब जामवंत जी ने हनुमान जी को उनकी शक्तियों का स्मरण कराया। अपनी शक्ति का भान होते ही हनुमान जी ने विशाल समुद्र को लांघने का संकल्प लिया और लंका की ओर प्रस्थान किया। लंका में प्रवेश करने के बाद, हनुमान जी विभीषण के महल में पहुंचे, जहां विभीषण ने उनका आदर-सत्कार किया और बताया कि माता सीता अशोक वाटिका में हैं। हनुमान जी अशोक वाटिका पहुंचे और एक पेड़ पर बैठकर दु:खी अवस्था में माता सीता को देखा। उन्होंने निशानी के तौर पर लाई गई भगवान राम की अंगूठी माता सीता के सामने डाल दी।
अंगूठी देखकर माता सीता को हनुमान जी पर विश्वास हो गया
हनुमान जी ने स्वयं को रामदूत बताते हुए माता सीता को विश्वास दिलाया कि वे उनकी सुध लेने आए हैं। अंगूठी देखकर माता सीता को हनुमान जी पर विश्वास हो गया। इसके बाद, भूख लगने पर हनुमान जी ने माता सीता की आज्ञा लेकर फल खाए और अशोक वाटिका के वृक्षों को तोड़ना शुरू कर दिया। वृक्षों के तोड़े जाने की सूचना जब दशानन रावण तक पहुंची, तो उन्होंने अपने पुत्र मेघनाद को हनुमान जी को बंदी बनाने के लिए भेजा। हनुमान जी को बंदी बनाकर दरबार में लाया गया, जहां मंत्रियों की सलाह पर उनकी पूंछ में आग लगवा दी गई। पूंछ में आग लगने के बाद हनुमान जी ने दशानन रावण की सोने की लंका को जलाकर राख कर दिया।

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