विशेष : गंदगी के साये में गुजरती ज़िंदगी - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 21 मई 2026

विशेष : गंदगी के साये में गुजरती ज़िंदगी

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देश के शहरों को चमकाने और स्वच्छ बनाने के लिए सरकार लगातार अभियान चला रही हैं। वर्ष 2014 में शुरू किए गए स्वच्छ भारत मिशन को देश के सबसे बड़े जन आंदोलनों में गिना जाता है। सरकार के अनुसार करोड़ों शौचालय बनाए गए, कचरा प्रबंधन की योजनाएं शुरू हुईं और कई शहरों को “स्वच्छ शहर” की सूची में स्थान मिला। लेकिन चमकती सड़कों और बड़े बाजारों के पीछे आज भी देश की लाखों बस्तियां ऐसी हैं, जहां लोगों की ज़िंदगी गंदगी, बदबू और बीमारी के बीच गुजर रही है। इन बस्तियों में रहने वाले लोग हर दिन ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं, जिसकी कल्पना भी मुश्किल है। सबसे अधिक असर बच्चों, किशोरियों और महिलाओं पर पड़ता है, जिन्हें अस्वच्छ वातावरण में जीवन बिताने को मजबूर होना पड़ता है। राजस्थान की राजधानी जयपुर के झालाना इलाके की स्थिति इसका एक गंभीर उदाहरण है। यहां की कई बस्तियों में नालियों की उचित व्यवस्था नहीं है। गंदा पानी अक्सर सड़कों पर बहता रहता है और बरसात के दिनों में पूरा इलाका कीचड़ और दुर्गंध से भर जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार नाली का गंदा पानी पीने के पानी की पाइपलाइन तक पहुंच जाता है, जिससे पानी दूषित हो जाता है। ऐसे पानी के इस्तेमाल से डायरिया, टाइफाइड, त्वचा रोग और पेट से जुड़ी कई बीमारियां फैलती हैं। इस क्षेत्र में अनुसूचित जाति समुदाय की बड़ी आबादी रहती है, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग भी बड़ी संख्या में यहां निवास करते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण इन समुदायों के पास बेहतर आवास और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सीमित है।


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देश के कई शहरी स्लम क्षेत्रों में यही तस्वीर दिखाई देती है। संकरी गलियां, खुले में पड़ा कचरा, टूटी नालियां और सार्वजनिक शौचालयों की कमी यहां की आम समस्याएं हैं। बच्चों को अक्सर गंदे पानी और कचरे के बीच खेलना पड़ता है। इसका असर उनके स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक विकास पर भी पड़ता है। किशोरियों की स्थिति और भी चिंताजनक होती है। साफ शौचालय और सुरक्षित पानी की कमी के कारण उन्हें मासिक धर्म के दौरान कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई बार संक्रमण और एनीमिया जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। अस्वच्छ माहौल में रहने के कारण लड़कियों की स्कूल उपस्थिति भी प्रभावित होती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत की शहरी आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी स्लम बस्तियों में रहता है। विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक देश में करोड़ों लोग ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां स्वच्छ पानी, सीवेज और ठोस कचरा प्रबंधन जैसी बुनियादी सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टों में भी यह बताया गया है कि खराब स्वच्छता बच्चों में कुपोषण और संक्रमण का एक बड़ा कारण है। हालांकि स्वच्छ भारत मिशन शुरू होने के बाद खुले में शौच के मामलों में कमी आई है और कई शहरों में सफाई व्यवस्था बेहतर हुई है, लेकिन स्लम बस्तियों तक इसका पूरा लाभ अभी भी नहीं पहुंच पाया है। कई जगह शौचालय तो बने, लेकिन पानी और रखरखाव की कमी के कारण उनका उपयोग सीमित रह गया।


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समस्या केवल संसाधनों की कमी तक सीमित नहीं है। सामाजिक जागरूकता की कमी भी बड़ी वजह है। कई लोग कचरा खुले में फेंकना सामान्य मानते हैं। सामुदायिक स्तर पर सफाई को लेकर जिम्मेदारी की भावना कमजोर दिखाई देती है। बच्चों और युवाओं को स्वच्छता के महत्व के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिल पाती। कई बार स्थानीय प्रशासन और समुदाय के बीच संवाद की कमी भी समस्याओं को बढ़ा देती है। जब तक लोग खुद अपने आसपास की सफाई को अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक केवल सरकारी योजनाओं से स्थायी बदलाव संभव नहीं होगा। इस स्थिति को बदलने के लिए बहुआयामी प्रयासों की आवश्यकता है। सबसे पहले स्लम बस्तियों में नियमित सफाई व्यवस्था, बेहतर नाली निर्माण और सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। स्थानीय निकायों को ऐसे क्षेत्रों में विशेष निगरानी तंत्र बनाना चाहिए ताकि सीवेज और पीने के पानी की पाइपलाइन अलग और सुरक्षित रहें। सामुदायिक शौचालयों की संख्या बढ़ाने के साथ उनके रखरखाव पर भी ध्यान देना जरूरी है। स्कूलों और सामुदायिक केंद्रों में स्वच्छता जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए, जहां बच्चों और किशोरियों को स्वास्थ्य और साफ-सफाई के महत्व के बारे में जानकारी दी जाए। स्वयं सहायता समूहों, युवाओं और स्थानीय महिलाओं को इसमें शामिल कर सामुदायिक भागीदारी बढ़ाई जा सकती है।


तकनीक और स्थानीय नवाचार भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कचरा पृथक्करण, रीसाइक्लिंग और सामुदायिक सफाई मॉडल को बढ़ावा देने की जरूरत है। यदि हर बस्ती में स्थानीय स्वच्छता समिति बनाई जाए और लोगों को जिम्मेदारी दी जाए, तो बदलाव अधिक प्रभावी हो सकता है। इसके साथ ही स्वास्थ्य शिविरों और नियमित जांच के माध्यम से बीमारियों की रोकथाम पर भी ध्यान देना होगा। देश की प्रगति केवल चमकती सड़कों और ऊंची इमारतों से नहीं मापी जा सकती। असली विकास तब होगा जब शहरों की स्लम बस्तियों में रहने वाला बच्चा भी साफ पानी पी सके, जब किशोरियां बिना बीमारी और असुरक्षा के अपने सपनों को पूरा कर सकें, और जब हर नागरिक को सम्मानजनक और स्वच्छ जीवन मिले। स्वच्छता केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और मानव गरिमा का प्रश्न है। यदि सरकार, समाज और स्थानीय समुदाय मिलकर प्रयास करें, तो वह दिन दूर नहीं जब देश की स्लम बस्तियां भी गंदगी की पहचान नहीं, बल्कि स्वच्छ और स्वस्थ जीवन की मिसाल बनेंगी।





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प्रियंका

जयपुर, राजस्थान

टीम, गाँव की आवाज़

(यह लेखिका के निजी विचार हैं)

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