- जैविक कचरे (गीले कचरे) के बेहतर प्रबंधन से लगभग 24 अरब डॉलर का निवेश आ सकता है और 26 लाख प्रत्यक्ष रोजगार पैदा हो सकते हैं।
- अनुकूल और सहायक नीतियों के जरिए गीले कचरे की प्रोसेसिंग करके नेट उत्सर्जन में लगभग 68 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर की कमी लाई जा सकती है।
- लगभग 16 मंत्रालय और सरकारी निकाय पहले से ही जैविक कचरा प्रबंधन में शामिल हैं; इसे विस्तार देने के लिए सशक्त समन्वय बहुत जरूरी है।
श्री मनजिंदर सिंह सिरसा, पर्यावरण, वन और वन्यजीव मंत्री, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार, इस रिपोर्ट को जारी करने के अवसर पर भेजे गए अपने संदेश में कहा, “माननीय प्रधानमंत्री का आत्मनिर्भर भारत और ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का दृष्टिकोण, कचरे से संसाधन (वेस्ट-टू-रिसोर्स) बनाने वाली प्रणालियों में मजबूती से व्यक्त होता है। दिल्ली के जैविक कचरे से उत्पादित होने वाला बायो-सीएनजी (bio-CNG) का हर एक किलोग्राम, आयातित जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) के एक किलोग्राम के बराबर है, जिसकी हमें ज़रूरत नहीं है। किसी बाजार या आवासीय कॉलोनी में स्थापित प्रत्येक कम्पोस्ट (खाद) यूनिट, शहरी पोषक चक्र (अर्बन न्यूट्रिएंट लूप) को पूरा करने की दिशा में एक कदम है। मैं इस रिपोर्ट के लिए सीईईडब्ल्यू (CEEW) और सभी सहयोगी भागीदारों को बधाई देता हूं। इस स्तर के साक्ष्यों की - जो कचरे, ऊर्जा, रोज़गार और उत्सर्जन को एक सुसंगत ढांचे में जोड़ते हैं - वास्तव में हमारी नीतिगत चर्चाओं के लिए सबसे बड़ी जरूरत हैं। स्वच्छ हवा के लिए दिल्ली का प्रयास इस बात से अलग नहीं किया जा सकता है कि हम अपने कचरे का प्रबंधन कैसे करते हैं।” सीईईडब्ल्यू ने भारतीय शहरों से निकलने वाले जैविक कचरे के लिए तीन संभावित रास्तों (पाथवेज) का आकलन किया है: पहला - सामान्य परिदृश्य (बिजनेस-एज-यूजुअल सिनेरियो), दूसरा - त्वरित नीति परिदृश्य (एक्सीलरेटेड पॉलिसी सिनेरियो), और तीसरा - 'महत्वाकांक्षी हरित संक्रमण परिदृश्य' (एंबिशियस ग्रीन ट्रांजिशन सिनेरियो)। त्वरित नीति परिदृश्य में, देश 2047 तक नेट उत्सर्जन में लगभग 68 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर की कमी ला सकता है। इसमें भारत कचरे का शत-प्रतिशत संग्रह हासिल कर लेता है और कंपोस्टिंग (खाद बनाने) व बायोमेथेनेशन के संतुलित मिश्रण के माध्यम से शहरों के 95 प्रतिशत जैविक नगरपालिका कचरे का प्रसंस्करण करने में सक्षम होता है। यह सफलता जैविक कचरे को डंपिंग ग्राउंड (कचरे के ढेरों) तक जाने से रोककर और उससे तैयार उत्पादों जैसे कंपोस्ट, जैविक खाद और बायो-सीएनजी का उपयोग करते हुए हासिल की जा सकती है। इसके विपरीत, अगर हम सामान्य रास्ते (बिजनेस-एज-यूजुअल) चलें तो 2047 तक कचरा क्षेत्र से होने वाला उत्सर्जन बढ़कर लगभग 120 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर पहुंच सकता है।
श्री पी. सी. मीना, इंजीनियर-इन-चीफ, एमसीडी (MCD), दिल्ली, ने कहा, "दिल्ली नगर निगम अब योजनाबद्ध और संरचनात्मक रूप से विकल्पों को तैयार कर रहा है। दिल्ली के प्रमुख डेयरी क्लस्टरों — नांगली, गोयला, घोगा और भलस्वा में बायोमेथेनेशन प्लांट (जैव-मीथनीकरण संयंत्र) चालू किए जा रहे हैं, जहां हम राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के साथ मिलकर भी काम कर रहे हैं। इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (IGL) के साथ साझेदारी में, हम बायो-सीएनजी (Bio-CNG) बुनियादी ढांचे का विकास कर रहे हैं जो कचरा प्रसंस्करण (वेस्ट प्रोसेसिंग) को शहर के गैस वितरण नेटवर्क के साथ जोड़ता है।" प्रार्थना बोराह, फेलो, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “कचरा प्रबंधन स्वच्छ हवा से संबंधित बुनियादी ढांचा है। खुले में कचरा जलाना भारतीय शहरों में हानिकारक पीएम2.5 उत्सर्जन में लगभग 10 प्रतिशत का योगदान देता है, जबकि उचित प्रबंधन न होने पर जैविक कचरा मीथेन, दुर्गंध, आग का जोखिम और प्रदूषण बढ़ाता है, जिससे पुनर्चक्रण योग्य (रीसायकल होने लायक) सामग्रियों की रिकवरी वैल्यू घट जाती है। जैसे-जैसे भारतीय शहरों का विस्तार हो रहा है, कचरा प्रबंधन प्रणालियां न केवल मौसमी प्रदूषण के समय, बल्कि पूरे साल हवा की गुणवत्ता और जीवन जीने की सुगमता तय करेंगी। शहरों को कचरे की छंटाई, संग्रह (इकट्ठा करने), प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग), निगरानी और नियमों का कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए साल भर चलने वाली, अति-स्थानीय (हाइपरलोकल) तंत्र की जरूरत है, विशेष रूप से थोक कचरा उत्पादकों, बाजारों, होटलों, रेस्तरां और बड़े आवासीय परिसरों के लिए।”
जैविक कचरा स्वच्छ हवा और संसाधन-रिकवरी का एक बड़ा अवसर देता है
सीईईडब्ल्यू के ये निष्कर्ष ऐसे समय में आए हैं, जब अप्रैल 2026 से लागू हुए भारत के ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 (Solid Waste Management Rules, 2026) के तहत कचरे की उसके स्रोत (पैदा होने वाली जगह) पर छंटाई करना और गीले कचरे को नजदीकी केंद्र में कंपोस्टिंग (खाद बनाने) या बायोमेथेनेशन के लिए भेजना अनिवार्य कर दिया गया है। वर्तमान में, भारतीय शहरों में प्रतिदिन लगभग 1,71,000 टन शहरी ठोस कचरा (Municipal Solid Waste) पैदा होता है, जिसमें से करीब आधा हिस्सा जैविक कचरे होता है। मौजूदा समय में कुल शहरी ठोस कचरे का लगभग 61 प्रतिशत हिस्सा ही उपचारित (ट्रीटमेंट) किया जाता है। वर्ष 2047 तक, केवल शहरी क्षेत्रों से निकलने वाला जैविक कचरा सालाना लगभग 208 मिलियन टन तक पहुंच सकता है। यदि इस कचरे का प्रभावी ढंग से प्रसंस्करण (प्रोसेस) किया जाए, तो इसे खाद, बायोगैस और बायोमीथेन में बदला जा सकता है। इससे पोषक तत्वों को दोबारा निकालने, मीथेन उत्सर्जन को घटाने, रासायनिक उर्वरकों (केमिकल फर्टिलाइजर्स) का विकल्प तैयार करने और भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन (Clean Energy Transition) को रफ्तार देने में मदद मिलेगी।
निवेश, रोजगार और अंतिम उत्पाद (एंड-प्रोडक्ट) के बाजार शहर के स्तर पर क्रियान्वयन पर निर्भर हैं
सीईईडब्ल्यू के आकलन बताते हैं कि त्वरित नीतिगत परिदृश्य (एक्सेलरेटेड पॉलिसी सिनेरियो) के तहत, भारत को शहरी जैविक कचरा प्रसंस्करण बुनियादी ढांचे को विस्तार देने के लिए 2047 तक लगभग 24 बिलियन अमेरिकी डॉलर के कुल निवेश की जरूरत होगी। यह निवेश कंपोस्ट (खाद), कंप्रेस्ड बायोगैस या बायो-सीएनजी, फरमेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (किण्वित जैविक खाद), और लिक्विड फरमेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (तरल किण्वित जैविक खाद) के बाजारों को मजबूत कर सकता है। इसके अलावा, यह फीडस्टॉक (कचरा/कच्चा माल) प्रबंधन, प्लांट संचालन, तकनीकी रखरखाव और संबंधित सेवाओं में प्रत्यक्ष रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकता है। वर्तमान में, भारत की जैविक कचरा उपचार क्षमता में कंपोस्टिंग (खाद बनाने) की हिस्सेदारी लगभग 96 प्रतिशत है, जबकि बायोमेथेनेशन की हिस्सेदारी 4 प्रतिशत के करीब है। बायोमेथेनेशन की दिशा में शहर-दर-शहर की जरूरतों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल सशक्त कदम बढ़ाने से संसाधनों की रिकवरी में सुधार हो सकता है, स्वच्छ ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है और भारत के जलवायु लक्ष्यों को रफ्तार मिल सकती है। प्रियंका सिंह, प्रोग्राम लीड, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “भारत ने जैविक कचरा प्रबंधन के लिए पहले से ही एक मजबूत नीतिगत आधार तैयार कर लिया है। हमारे अध्ययन से पता चलता है कि इसमें नौ कार्यक्रमों, तीन नीतिगत दिशानिर्देशों और सात योजनाओं के माध्यम से लगभग 16 मंत्रालय और सरकारी निकाय जुड़े हुए हैं। स्वच्छ भारत मिशन-शहरी, राष्ट्रीय जैव ऊर्जा कार्यक्रम और गोवर्धन (GOBARdhan) योजना ने कचरे के निपटान (निस्तारण) के बजाय उससे संसाधन बनाने (रिसोर्स रिकवरी) की सोच को प्रोत्साहित किया है। अब अगली चुनौती समन्वय और क्रियान्वयन की है। शहरों को कचरे के विश्वसनीय आंकड़ों, ऐसे अनुबंधों (कॉन्ट्रैक्ट्स) की आवश्यकता है, जो केवल कचरे की मात्रा के बजाय उसकी गुणवत्ता को प्राथमिकता दें, स्रोत पर छांटे गए कच्चे माल (कचरे) की आपूर्ति सुनिश्चित करें, और कंपोस्ट, फरमेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (किण्वित जैविक खाद) और बायो-सीएनजी के लिए विश्वसनीय खरीद बाजार (ऑफटेक मार्केट्स) उपलब्ध हों।”
महत्वाकांक्षी स्तर पर विस्तार के लिए मजबूत तकनीकी विकल्पों और बाजारों की जरूरत होगी
सीईईडब्ल्यू के अध्ययन के अनुसार, 1994 से 2020 के बीच भारत के कचरा-क्षेत्र (वेस्ट-सेक्टर) से होने वाले उत्सर्जन में 226 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके साथ, यह राष्ट्रीय उत्सर्जन में सबसे तेजी से योगदान देने वाले क्षेत्रों में से एक बन गया है। सीईईडब्ल्यू की ओर से तैयार किया गया सबसे महत्वाकांक्षी ग्रीन ट्रांजिशन (हरित परिवर्तन) मॉडल वर्ष 2047 तक लगभग 62 अरब अमेरिकी डॉलर की बाजार संभावनाएं सामने आ सकती है। इसमें भारत शहरी जैविक कचरे का 100 प्रतिशत संग्रह और 100 प्रतिशत प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) होगा और बायोमेथेनेशन (Biomethanation) की बड़ी भूमिका होगी। साथ ही, इससे उत्सर्जन में लगभग 101 मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर की कमी लाने की क्षमता पैदा हो सकती है। इसके लिए यंत्रीकृत (मैकेनाइज्ड) और बड़ी पूंजी वाले प्रसंस्करण प्रणालियों की दिशा में बड़े स्तर पर बदलाव करना होगा। इसलिए, इस सफलता के लिए तकनीकी विकल्प, फीडस्टॉक (कच्चे माल) की गुणवत्ता, तकनीकी क्षमता और अंतिम रूप से तैयार उत्पादों (एंड-प्रोडक्ट्स) के लिए सुनिश्चित बाजारों की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण होगी।
सुझाव
सीईईडब्ल्यू ने जैविक कचरे की क्षमता का पूरा लाभ उठाने के लिए भारत को पांच प्राथमिक कदम उठाने का सुझाव दिया है. पहला, शहरों को स्रोत पर ही अलग किए गए (सोर्स-सेग्रिगेटेड) उच्च गुणवत्ता वाले फीडस्टॉक (कच्चे माल) को सुनिश्चित करना। दूसरा, उन्हें कचरा उत्पादन और उसके घटकों (कंपोजिशन) से जुड़े आंकड़ों को नियमित रूप से अपडेट करना चाहिए। तीसरा, सरकारी खरीद (प्रोक्योरमेंट) की प्रक्रिया को 'सबसे कम लागत' (L1) के आधार पर चुनने के बजाय गुणवत्ता और प्रदर्शन-आधारित अनुबंधों (कॉन्ट्रैक्ट्स) की दिशा में ले जाना चाहिए। चौथा, शहर के स्तर पर क्षमता निर्माण और कार्यबल (वर्कफोर्स) के प्रशिक्षण को मजबूत करने की जरूरत है। पांचवां, कम्पोस्ट (खाद), फरमेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर, लिक्विड फरमेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर और बायो-सीएनजी के लिए ऑफटेक (बिक्री) बाजारों को विकसित और अधिक विश्वसनीय बनाना होगा। यह अध्ययन कुछ नए वित्तीय व्यवस्थाओं (फाइनेंसिंग मैकेनिज्म) की भी मांग करता है, जैसे कि हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल (HAM), ग्रीन बॉन्ड, मजबूत सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP), और नगर पालिका के राजस्व प्रणालियों में कचरा उपभोक्ता शुल्कों (यूजर चार्जेस) का बेहतर समावेश।

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