रेड एफएम की निदेशक और सीओओ निशा नारायणन ने 'पीटीआई भाषा' से कहा, "ऑन-डिमांड ऑडियो की ओर वैश्विक बदलाव स्पष्ट और अच्छी तरह दर्ज है।" उन्होंने कहा कि लेकिन असली सवाल यह है कि क्या एफएम उद्योग को न्यायसंगत नियामक वातावरण मिल रहा है, जिससे वह प्रतिस्पर्धा कर सके, नवाचार कर सके और बेहतर कमाई कर सके। फिलहाल, उद्योग की चार मुख्य मांगें हैं: निजी एफएम स्टेशनों को समाचार और समसामयिक मामलों के प्रसारण की अनुमति देना, जो सुविधा अभी केवल ऑल इंडिया रेडियो को मिली हुई है; रेडियो सेवाओं पर जीएसटी को 18 प्रतिशत से घटाकर पांच प्रतिशत करना; स्मार्टफोन निर्माताओं को डिवाइस में एफएम रिसीवर अनलॉक करने की अनुमति देना; और एक ऐसा मॉडल लागू करना जिसके तहत रेडियो कंपनियां पुरानी नीलामी कीमतों से जुड़े शुल्क के बजाय अपनी वास्तविक कमाई का एक निश्चित प्रतिशत लाइसेंस शुल्क के रूप में सरकार को दें। लाखों भारतीयों के लिए एफएम रेडियो रोज का साथी रहा है। चाहे कार्यालय आने-जाने का समय हो, घर हो, कार हो या छोटे शहर। हर जगह यह मनोरंजन और जानकारी पाने के सबसे आसान तरीकों में से एक बना हुआ है। इंटरनेट-आधारित ऑडियो मंचों के विपरीत रेडियो बिना डेटा कनेक्शन के काम करता है और बिजली जाने या नेटवर्क में बाधा होने पर भी श्रोताओं तक पहुंच सकता है। हालांकि, सरकार का मानना है कि एफएम रेडियो की चुनौतियों को सिर्फ विनियमन के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 'पीटीआई भाषा' को बताया कि यह क्षेत्र बड़े पैमाने पर तकनीकी बदलाव से गुजर रहा है, ठीक वैसे ही जैसे बदलाव दूसरे उद्योगों में देखे गए हैं। उन्होंने कहा, "यह एक बड़ा तकनीकी बदलाव है जो हो रहा है और हम सभी जानते हैं कि चाहे वह समाचार उद्योग हो या मनोरंजन उद्योग पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल की ओर लगातार बदलाव हुआ है और यह एफएम उद्योग के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है।"
वैष्णव के अनुसार, इस तरह के तकनीकी बदलाव उद्योगों का स्वरूप बदल देते हैं; इसकी तुलना मोबाइल फोन के प्रसार के बाद लैंडलाइन के चलन में कमी और पारंपरिक वाहनों से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बदलाव से की जा सकती है। उन्होंने कहा, "इस तरह का हर तकनीकी बदलाव उद्योग के ढांचे में बदलाव लाता है।" निजी एफएम स्टेशनों को समाचार प्रसारित करने की अनुमति देने की उद्योग की मांग पर मंत्री ने कहा कि सरकार इस मामले पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा, "एफएम स्टेशनों और एफएम सेवा प्रदाताओं की तरफ से हमारे पास यह मांग आई है। हम इस पर विचार कर रहे हैं। इसके कई नतीजे हो सकते हैं क्योंकि हमारा एक इतिहास रहा है जिसे आज ध्यान में रखना जरूरी है और आज हम जो भी फैसला लेंगे, उसे इस उद्योग के विकास के नजरिए से देखना होगा। बहुत जल्द हम इस पर कुछ फैसले लेंगे"। उद्योग का कहना है कि समस्या केवल नई तकनीकों के कारण नहीं है। 'एसोसिएशन ऑफ रेडियो ऑपरेटर्स फॉर इंडिया' (एआरओआई) के अनुसार, रेडियो अब भारत के मीडिया और मनोरंजन उद्योग का एकमात्र ऐसा हिस्सा है जो सिकुड़ रहा है। एआरओआई के अनुमान के मुताबिक, जहां 2025 में कुल मीडिया और मनोरंजन उद्योग नौ प्रतिशत बढ़कर 2.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, वहीं रेडियो का राजस्व सात प्रतिशत घटकर लगभग 2,300 करोड़ रुपये रह गया। पिछले दशक में विज्ञापन पर होने वाले खर्च में भी इस उद्योग की हिस्सेदारी तेजी से गिरी है। उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, विज्ञापन बाजार में रेडियो की हिस्सेदारी 2015 में 3.4 प्रतिशत से अधिक थी, जो 2025 में घटकर लगभग 1.1 प्रतिशत रह गई है। 2025 में निजी एफएम उद्योग का राजस्व लगभग 1,819 करोड़ रुपये रहा; चालू स्टेशनों की संख्या में काफी बढ़ोतरी के बावजूद यह आंकड़ा अभी भी 2020 के स्तर से नीचे है।
नारायणन ने कहा कि रेडियो की मुश्किलों को महामारी से पैदा हुई आर्थिक उथल-पुथल और उसके बाद हुई असमान रिकवरी से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा, "उद्योग ने इस बात का पूरी तरह से अंदाजा नहीं लगाया था कि एक साथ कई गंभीर चुनौतियों के आने से कैसा संयुक्त प्रभाव होगा।" उन्होंने कहा कि उद्योग की कमाई कोरोना महामारी से पहले के स्तर के मुकाबले लगभग 50 प्रतिशत गिर गई है और अभी तक पूरी तरह से रिकवर नहीं हो पाई है। रेड एफएम में सरकारी विज्ञापनों की संख्या में 30 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है और महामारी से पहले के स्तर के मुकाबले इस भाग से होने वाली कमाई में 27 प्रतिशत की कमी आई है। रेडियो सिटी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) आबे थॉमस ने कहा कि मौजूदा हालात के लिए उद्योग के फैसले और नीति की कमियां, दोनों ही जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा, "इस उद्योग ने तेजी से विस्तार किया और स्थानीय विज्ञापन में उछाल का दांव लगाया, लेकिन यह उम्मीद से धीमी गति से बढ़ा और कोरोना महामारी के बाद रिकवरी की धीमी रफ्तार ने असल में इसे बुरी तरह प्रभावित किया।" थॉमस ने कहा, "समाचार पर लगी रोक एफएम के लिए सबसे नुकसानदायक रही है। इससे लोग नियमित रूप से समाचार सुनते हैं, समुदाय के साथ जुड़ाव गहरा होता है और कमाई के नए जरिये खुलते हैं।"

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