सूत्रों के अनुसार, सरकार के शीर्ष अधिकारियों के बीच यह राय प्रबल हो रही है कि अहम मंत्रालयों में नए चेहरों को शामिल किए जाने की आवश्यकता है। इसके अलावा क्षेत्रीय, राज्यवार, जातीय और राजनीतिक निष्ठा से जुड़े समीकरणों को ध्यान में रखकर मंत्रिपरिषद में संतुलन बनाने की राजनीतिक मजबूरियां भी हैं। दो केंद्रीय मंत्रियों पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा को क्रमशः भाजपा की उत्तर प्रदेश और दिल्ली इकाई की जिम्मेदारी पहले ही दी जा चुकी है। इस बात की प्रबल संभावना है कि भाजपा ‘एक व्यक्ति, एक पद’ के अपने नियम का पालन करेगी जिसके कारण दोनों को सरकार से हटना पड़ सकता है। दो अन्य केंद्रीय मंत्रियों जॉर्ज कुरियन और रवनीत सिंह बिट्टू को हाल में संपन्न राज्यसभा चुनावों के लिए भाजपा ने दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया। उच्च सदन में उनका कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो गया। कुरियन अपने पद से पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं जबकि बिट्टू अब भी मंत्री हैं। ऐसा बताया जा रहा है कि शीर्ष नेतृत्व ने बिट्टू को आगामी पंजाब विधानसभा चुनावों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा है। कांग्रेस के पूर्व नेता और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पौत्र बिट्टू प्रभावशाली जाट सिख समुदाय का प्रमुख चेहरा हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं इसलिए इन तीन राज्यों के और प्रतिनिधियों को मोदी मंत्रिपरिषद में जगह मिलने की संभावना है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की भारी जीत के बाद राज्य से भी पार्टी के कुछ सांसदों को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल किया जा सकता है। तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के बागी गुटों के कुछ प्रतिनिधियों को भी मंत्री पद मिलने की संभावना है। ऐसी भी संभावना है कि शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के किसी वरिष्ठ पदाधिकारी को कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है।
सूत्रों ने बताया कि आम आदमी पार्टी (आप) छोड़कर भाजपा में शामिल हुए सात राज्यसभा सदस्यों में से एक या दो को मंत्रिपरिषद में जगह मिल सकती है। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उबाठा) के बागी गुटों के सदस्यों को मंत्रिपरिषद में शामिल करने का कोई भी फैसला लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय पर निर्भर करेगा। दोनों के मूल दलों ने दल-बदल विरोधी कानून के तहत उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग की है। प्रधानमंत्री मोदी की 23 जून को राष्ट्रपति भवन में पद्म पुरस्कार समारोह के इतर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात के बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलें तेज हो गईं। इसके दो दिन बाद 25 जून को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की राष्ट्रपति से मुलाकात से इन अटकलों को और बल मिला। अधिकारियों ने इन मुलाकातों को शिष्टाचार भेंट बताया और कहा कि दोनों नेता नियमित अंतराल पर राष्ट्रपति से मिलते रहते हैं। हालांकि, इस बात की प्रबल संभावना है कि प्रधानमंत्री की राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान मंत्रिमंडल में फेरबदल के मुद्दे पर भी चर्चा हुई होगी। दो केंद्रीय मंत्रियों हरदीप पुरी और बी एल वर्मा का राज्यसभा में कार्यकाल नवंबर में समाप्त होगा। अब यह देखना होगा कि उच्च सदन के लिए उन्हें फिर से उम्मीदवार बनाए जाने के संबंध में शीर्ष नेतृत्व क्या फैसला करता है। तीन राज्यपालों-कर्नाटक के थावर चंद गहलोत, मध्य प्रदेश के मंगुभाई पटेल और उत्तराखंड के लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह-का कार्यकाल आने वाले महीनों में पूरा होने वाला है। गहलोत और पटेल का कार्यकाल जुलाई में तथा सिंह का कार्यकाल सितंबर में पूरा होगा। सरकार से हटाए जाने वाले कुछ मंत्रियों को राज्यपाल पद की जिम्मेदारी दिए जाने की भी संभावना है। हालांकि, जानकार हलकों का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी बड़े फैसलों को अंतिम समय तक गोपनीय रखते हैं और औपचारिक घोषणा होने पर ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।

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