- डॉ. इन्द्रेश कुमार ने डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से प्रेरणा लेने का आह्वान किया; विद्वानों, सामाजिक नेताओं और शिक्षाविदों ने राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी समाज का भविष्य उसके आदर्श व्यक्तित्वों से निर्धारित होता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे ज्ञान, राष्ट्रभक्ति, सेवा, नवाचार और मानवता के प्रतीक व्यक्तित्वों से प्रेरणा लें, न कि संघर्ष और विभाजन के प्रतीकों से। सम्मेलन में “एक कौम, एक वतन – हिन्दुस्तान” का विचार प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया। वक्ताओं ने कहा कि भारत की विविधता उसकी शक्ति है, लेकिन उससे भी बड़ी शक्ति उसकी साझा राष्ट्रीय पहचान है। समाज में स्थायी सद्भाव और प्रगति तभी संभव है जब नागरिक स्वयं को सबसे पहले भारतीय मानें। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक एवं राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (NCMEI) के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रो. शाहिद अख्तर ने कहा कि भारत की सभ्यतागत विरासत और संवैधानिक मूल्य राष्ट्रीय एकता की मजबूत आधारशिला हैं। उन्होंने बुद्धिजीवियों और सामुदायिक नेतृत्व से संवाद को बढ़ावा देने, सामाजिक दूरियों को कम करने और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने का आह्वान किया। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक (बौद्धिक एवं जनसंपर्क प्रकोष्ठ) कर्नल ताहिर मुस्तफा ने कहा कि ऐसे सम्मेलन केवल चर्चा के लिए नहीं, बल्कि समाधान खोजने के लिए आयोजित किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय चुनौतियों का सामना करने के लिए संवाद को समस्या-चर्चा से आगे बढ़ाकर व्यावहारिक समाधानों की दिशा में ले जाना होगा।
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की राष्ट्रीय संयोजक एवं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. शालिनी अली ने शिक्षा, कौशल विकास और सामाजिक निवेश को समुदाय की प्रगति का आधार बताते हुए कहा कि स्थायी विकास के लिए धैर्य, निरंतरता और दीर्घकालिक दृष्टि आवश्यक है। उन्होंने ज़कात को शिक्षा, उद्यमिता और युवाओं के सशक्तिकरण के लिए एक प्रभावी सामाजिक निवेश के रूप में उपयोग करने पर बल दिया। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक मोहम्मद अफज़ाल ने कहा कि राष्ट्र निर्माण में प्रत्येक नागरिक की समान भागीदारी और जिम्मेदारी है। उन्होंने डॉ. इन्द्रेश कुमार के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज तभी आगे बढ़ता है जब वह ज्ञान, सेवा, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक उत्तरदायित्व को अपने जीवन का आधार बनाता है। सम्मेलन में नालंदा की ऐतिहासिक विरासत पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि नालंदा केवल शिक्षा का केंद्र नहीं था, बल्कि भारतीय जीवन मूल्यों, चरित्र निर्माण और सभ्यतागत आत्मविश्वास का प्रतीक था। भारत की महानता केवल ज्ञान में नहीं, बल्कि उन नैतिक मूल्यों में निहित है जो समाज को एक सूत्र में बांधते हैं। सम्मेलन में शिक्षकों, प्रोफेसरों, अधिवक्ताओं, न्यायिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों, शोधकर्ताओं, छात्रों, महिला प्रतिनिधियों तथा विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने सक्रिय भागीदारी की। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विषयों पर हुई चर्चाओं में सामाजिक सद्भाव, शैक्षिक सशक्तिकरण, संवैधानिक मूल्यों और समावेशी विकास पर विशेष जोर दिया गया। कार्यक्रम का समापन “हिन्दुस्तान फर्स्ट, हिन्दुस्तानी बेस्ट” के संकल्प के साथ हुआ। प्रतिभागियों ने विकसित भारत और श्रेष्ठ भारत के निर्माण के लिए राष्ट्रीय एकता, पारस्परिक सम्मान और साझा जिम्मेदारी को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। सम्मेलन का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि भारत का भविष्य विभाजन नहीं, संवाद; टकराव नहीं, सहयोग; और संकीर्ण पहचान नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सामूहिक भावना से निर्धारित होगा।

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