- भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों से जुड़े अनुमानित रोजगारों में सिर्फ रूफटॉप सोलर का हिस्सा 43 प्रतिशत हो सकता है।
- चुनिंदा स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्रों में वित्तीय वर्ष 2022-23 और 2025-26 के बीच 6.5 लाख से अधिक कामगार जुड़े हैं।
- सर्वेक्षण में शामिल सौर और पवन ऊर्जा के कामगारों में महिलाओं की संख्या सिर्फ 11प्रतिशत है।
इस क्षेत्र में रोजगार सृजन की संभावनाओं पर बात करते हुए, श्री संतोष कुमार सारंगी, सचिव, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE), ने कहा, "एक सफल हरित परिवर्तन (ग्रीन ट्रांज़िशन) के लिए लोगों की भागीदारी बेहद ही बुनियादी तत्व है। लोगों को इस हरित परिवर्तन के केंद्र में रखने से होने वाले सकारात्मक और अप्रत्यक्ष लाभ इसमें शामिल होते हैं, और भारत ने यह दिखा दिया है कि हमारे आर्थिक विकास का रास्ता और सततशीलता (सस्टेनेबिलिटी) के लक्ष्य बहुत अच्छी तरह से एक साथ चल सकते हैं। पिछले साल, हमने लगभग 51 गीगावाट सौर और पवन ऊर्जा क्षमता हासिल की है, और उम्मीद है कि यह रफ्तार आने वाले वर्षों में भी जारी रहेगी, इसका और अधिक विस्तार होगा।" डॉ. अरुणाभा घोष, सीईओ, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “भारत का एनर्जी ट्रांजिशन, वर्कफोर्स ट्रांजिशन भी होना चाहिए। यह अवसर रोजगार सृजन, कौशल निर्माण, घरेलू सप्लाई चेन्स को मजबूत बनाने और यह सुनिश्चित करने के लिए है कि स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार के साथ-साथ इसके लाभ परिवारों, किसानों, श्रमिकों और उद्यमियों तक भी पहुंचें। रूफटॉप सोलर दिखाता है कि क्यों विकेंद्रीकृत अक्षय ऊर्जा महत्वपूर्ण है: ये स्वच्छ बिजली उत्पादित करते हैं और साथ ही बड़ी परियोजनाओं की तुलना में प्रति मेगावाट (MW) क्षमता पर अधिक रोजगार भी देते हैं। भारत की स्वच्छ ऊर्जा महत्वाकांक्षा को एक टिकाऊ रोजगार इंजन में बदलने के लिए, भारत को उच्च गुणवत्ता वाले कौशल विकास (स्किलिंग), कर्मचारियों के पारदर्शी आंकड़े और समावेशी भागीदारी में अपना निवेश जारी रखना चाहिए।”
रोजगार बढ़ाने में रूफटॉप सोलर सबसे आगे
ये निष्कर्ष इसलिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि रूफटॉप सोलर तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। सीईईडब्ल्यू-एनआरडीसीके अध्ययन के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2022-23 और 2025-26 के बीच स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में जुड़े 6.5 लाख कर्मचारियों का सबसे बड़ा हिस्सा रूफटॉप सोलर से आया, जो कर्मचारियों की कुल वृद्धि का 62 प्रतिशत था। इसके बाद पीएम-कुसुम (PM-KUSUM) की हिस्सेदारी 16.3 प्रतिशत, जैव ऊर्जा की हिस्सेदारी 12.6 प्रतिशत और ग्राउंड-माउंटेड सौर परियोजनाओं की हिस्सेदारी 6 प्रतिशत रही। रूफटॉप सोलर इसलिए अधिक रोजगार सृजित करता है, क्योंकि यह बड़े सौर या पवन ऊर्जा परियोजनाओं की तरह किसी एक जगह पर नहीं, बल्कि हर एक घर, दुकान और इमारत पर अलग-अलग लगता है। इसका अर्थ है कि ग्राहकों तक पहुंचने, जगह की जांच, डिजाइनिंग, स्थापना, ग्रिड से जोड़ने और रखरखाव जैसे कार्यों के ज्यादा कर्मचारियों की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए, प्रति मेगावाट (MW) बड़ी सौर ऊर्जा परियोजनाओं की तुलना में रूफटॉप सोलर 44 गुना अधिक एफटीई रोजगार वर्ष सृजित करता है। अध्ययन का अनुमान है कि रूफटॉप सोलर प्रति मेगावाट लगभग 45 एफटीई रोजगार-वर्ष, जबकि जमीन पर लगने वाले सोलर प्रोजेक्ट्स एक एफटीई रोजगार-वर्ष और पवन ऊर्जा लगभग 0.6 एफटीई रोजगार-वर्ष सृजित करता है। इससे पता चलता है कि विकेंद्रीकृत स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों में बड़ी परियोजनाओं की तुलना में काफी अधिक रोजगार सृजित करने की क्षमता मौजूद होती है। दीपा सिंह बगई, कंट्री डायरेक्टर, एनआरडीसी इंडिया, ने कहा, “भारत की आर्थिक वृद्धि, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों के लिए स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े रोजगार बहुत जरूरी हैं। यह अध्ययन दिखाता है कि विकेंद्रीकृत अक्षय ऊर्जा, विशेष रूप से रूफटॉप सोलर, शहरों, छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजित कर सकती है। लेकिन इसके लिए सुविचारित योजना, कर्मचारियों के संख्या की विश्वसनीय रिपोर्टिंग और मजबूत औद्योगिक प्रशिक्षण देने के लिए साझेदारियों की जरूरत होगी, ताकि कार्यबल भारत के एनर्जी ट्रांजिशन के अगले चरण के लिए पूरी तरह से तैयार रहे।”
सौर और पवन ऊर्जा से जुड़े रोजगारों में महिलाओं का हिस्सा कम
सीईईडब्ल्यू-एनआरडीसी के इस अध्ययन से पता चलता है कि सौर और पवन ऊर्जा को स्थापित करने और उपकरण निर्माण क्षेत्रों के कुल कार्यबल में महिलाओं का हिस्सा सिर्फ 11 प्रतिशत है। रूफटॉप सोलर में महिलाओं की सर्वाधिक 15 प्रतिशत भागीदारी है। इसके बाद सोलर मॉड्यूल निर्माण में 13 प्रतिशत, फ्लोटिंग सोलर में 12 प्रतिशत और जमीन पर लगने वाले सोलर प्रोजेक्ट्स में 11 प्रतिशत है। अध्ययन के अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा कार्यबल में शामिल 61 प्रतिशत महिलाएं गैर-तकनीकी भूमिकाओं, जैसे कि मानव संसाधन (एचआर), अकाउंटिंग और प्रशासन (एडमिनिस्ट्रेशन) में काम करती हैं।
स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े रोजगारों के लिए उच्च कौशल की जरूरत होगी
इस अध्ययन में यह भी सामने आया है कि संचालन एवं रखरखाव (ऑपरेशंस एंड मेंटेनेंस) और उपकरण निर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) की भूमिकाओं में लगभग 13 लाख एफटीई (FTE) रोजगार सृजित हो सकते हैं, जो परियोजनाओं या विनिर्माण संयंत्रों के संपूर्ण जीवनकाल (लाइफटाइम) तक बने रहेंगे। हालांकि, रोजगार के इस अवसर को भुनाने के लिए एक मजबूत कौशल तंत्र की जरूरत होगी। स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं को स्थापित करने से जुड़े लगभग 60 प्रतिशत रोजगारों के लिए अत्यधिक कुशल या अर्ध-कुशल कर्मचारियों की जरूरत होती है। उपकरण निर्माण क्षेत्रों में यह मांग बढ़कर 80-90 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। यह तकनीकी प्रशिक्षण, व्यावहारिक अनुभव और पेशेवर जीवन में उन्नति रने के विकल्पों की जरूरत को रेखांकित करता है।
प्रमुख सुझाव
इस अध्ययन में नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) और संबंधित संस्थानों को सब्सिडी वितरण, निविदाओं और नियामक ढांचे जैसी मौजूदा प्रक्रियाओं के जरिए कार्यबल की अनिवार्य रिपोर्टिंग को संस्थागत रूप देना चाहिए। इसके साथ, स्वच्छ ऊर्जा कंपनियों से लैंगिक समावेश और करियर को उन्नत बनाने वाले कार्यक्रम में निवेश करने की अपील करनी चाहिए। प्रशिक्षण संस्थानों को व्यावहारिक शिक्षा को मजबूत करना चाहिए और अपने पाठ्यक्रम को उद्योग की बदलती जरूरतों के अनुरूप बनाना चाहिए। जिस तरह से भारत 2030 के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों और दीर्घकालिक शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य की दिशा में बढ़ रहा है, सीईईडब्ल्यू-एनआरडीसी की रिपोर्ट कार्यबल नियोजन, कौशल विकास, लैंगिक समावेश और रोजगार के विश्वसनीय रोजगार आंकड़ों पर विशेष रूप से जोर देती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन न केवल क्षमता बढ़ाए, बल्कि गुणवत्तापूर्ण आजीविका भी सृजित करे।

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