उच्चतम न्यायालय के 2011 के ए.एस. मोहम्मद रफी मामले के फैसले का हवाला देते हुए कुमार ने कहा कि शीर्ष अदालत ने माना है कि बार एसोसिएशनों द्वारा किसी खास आरोपी का बचाव करने से इनकार करने वाले प्रस्ताव ‘‘पूरी तरह से गैर-कानूनी’’, बार की परंपराओं के विपरीत और पेशेवर नैतिकता के खिलाफ हैं। कुमार ने कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय ने कहा कि 'हमारी राय में, ऐसे प्रस्ताव पूरी तरह से गैर-कानूनी हैं, बार की सभी परंपराओं के खिलाफ हैं और पेशेवर नैतिकता के खिलाफ हैं। चाहे कोई व्यक्ति समाज की नजर में कितना भी बुरा, भ्रष्ट, नीच, पतित, विकृत, घिनौना, निंदनीय, दुष्ट या घृणित क्यों न माना जाता हो, उसे अदालत में अपना बचाव करने का अधिकार है और इसी के अनुसार वकील का यह फ़र्ज़ है कि वह उसका बचाव करे।’’ कुमार ने यह भी कहा कि संविधान हर गिरफ़्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने और अपना बचाव करवाने का अधिकार देता है। उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत ने बार एसोसिएशनों के ऐसे प्रस्तावों को ‘अमान्य’ घोषित किया है और निर्देश दिया है कि उसके फैसले की प्रतियां सभी उच्च न्यायालय बार संघों और सभी राज्य बार काउंसिल को भेजी जाएं ताकि उन्हें देश भर के ज़िला बार एसोसिएशनों तक पहुंचाया जा सके। उच्चतम न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए कुमार ने कहा, ‘‘शीर्ष अदालत ने घोषित किया कि भारत में बार एसोसिएशनों के ऐसे सभी प्रस्ताव अमान्य हैं और अगर समान उचित विचार वाले वकील चाहते हैं कि देश में लोकतंत्र और कानून का शासन बना रहे, तो उन्हें ऐसे प्रस्तावों को नज़रअंदाज़ करना चाहिए और उनका विरोध करना चाहिए। नतीजे चाहे जो भी हों, बचाव करना वकील का फर्ज है और जो वकील ऐसा करने से इनकार करता है, वह गीता के संदेश का पालन नहीं कर रहा है।’’

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें