विचार : योग तनाव और अवसाद से मुक़्त रखती है ! - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 20 जून 2026

विचार : योग तनाव और अवसाद से मुक़्त रखती है !

Sanjay-goshwami
योग वर्तमान समय की विद्रूपताओं से बचने का सर्वोत्कृष्ट उपाय है । क्योंकि संप्रत्ति प्रत्येक युवा अवसाद,चिंता, व तनाव का शिकार हैं तथा यह विकट समस्या मात्र युवाओं तक ही सीमित नहीं है अपितु किशोर भी इसकी चपेट में आ रहे हैं । इन सब के पीछे सबसे बड़ा प्रमुख कारण है तुलना व प्रतिस्पर्धा । इन दोनों के चक्कर में आज हमारा हंसता खेलता समाज अंधकारमय गुफा में दिन - प्रतिदिन प्रविष्ट हो रहा है । इन सबके पीछे अन्य कारण भी हैं । जैसे - अस्त व्यस्त दिनचर्या , अनुचित खानपान , मादक द्रव्यों का सेवन, अनैतिक व्यवहार इत्यादि । किन्तु इन सभी समस्याओं का समाधान हमारे शास्त्रों में पूर्ववर्णित है । क्योंकि कोई समस्या तभी उत्पन्न होती है जब उसका समाधान पूर्व से ही विद्यमान होता है। महर्षि पतञ्जलि विरचित योगसूत्र में मानसिक , शारीरिक व आत्मिक शान्ति के उपाय वर्णित हैं । योगसूत्र में आधि - व्याधि के समूल नाश का उपाय निर्दिष्ट है । आधि से तात्पर्य है मानसिक व्यथा तथा व्याधि का तात्पर्य शारीरिक व्यथा । किन्तु सर्वाधिक कष्टदायक मानसिक व्यथा है। क्योंकि सभी बिमारियाँ मन से ही उत्पन्न होती हैं । क्योंकि हमारा पंचभूतों से निर्मित यह नश्वर शरीर पांच कोशों से निर्मित है । जिसमें एक कोश मनोमयकोश भी है । जितने भी विचार, भावनाएँ, कल्पना आते हैं ये सभी हमारे मन में आते हैं । किन्तु विचारणीय विषय यह है कि क्या ये जो भी भाव या विचार रूपी लहरें उठ रही हैं वो हमारे स्वस्थ मन में उठ रही हैं या फिर विकृत मन में । क्योंकि वर्तमान की परिस्थितियों के अनुसार अनेक लोग मानसिक व्यथा रूपी विकट समस्या का सामना कर रहे हैं । इसके पीछे यह भी एक प्रमुख कारण है इच्छानुसार पद - प्रतिष्ठा का न प्राप्त होना । इस बात में तनिक भी संदेह नहीं कि वर्तमान का युवा सर्वाधिक अवसाद व तनाव का शिकार इसी कारण से है। कुछ समय पूर्व 60% प्राप्त कर लेना अपने अपने आप में एक महारथ हासिल करने के समान था किन्तु यह प्रतिस्पर्धी युग जिसमें 500 में से 499 अंक प्राप्त होने पर युवा हताशा का शिकार हो रहा कि 1 अंक क्यों नहीं प्राप्त कर सका ? 


इन सभी समस्याओं का निराकरण है योगसूत्र में । वहाँ अष्टांग योग के अन्तर्गत् नियम के 5 भेद वर्णित हैं जोकि क्रमशः - शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय , ईश्वरप्रणिधान । rइसमें दूसरे क्रम पर सन्तोष है और यह योग के माध्यम से ही सम्भव है । जब सन्तोष पर हमारा अधिकार होगा तो मानसिक सन्तुष्टि मिलेगी तथा मन व्यथा मुक्त रहेगा । आगे इन सभी पक्षों का सविस्तार वर्णन किया जायेगा । कूट शब्द - मनोविकार, अवसाद, व्यथा, आत्मिक, उत्थान । भूमिका - योग शब्द का तात्पर्य है - जोड़ , सम्मिलन या एकाकार हो जाना । जोकि मूलतः जीवात्मा का परमात्मा से एकीकरण को द्योतित करता है । किन्तु वर्तमान को ध्यान में रखते हुए हम यह भी कह सकते हैं कि - शरीर व मन का मेल हो जाये वही योग है । अन्तर्मन व बहिर्मन के संकल्प - विकल्प में अभेद स्थापित हो जाये वही “ योग” है। योग शब्द की व्युत्पत्ति ‘ युज्’ धातु में ‘ घञ्’ प्रत्यय लगाने से निष्पन्न हुयी है । पाणिनीय व्याकरण के अनुसार “ युज्” धातु तीन गणों में पायी जाती है - (१) युज् = समाधौ धातु दिवादिगणीय ( आत्मनेपदी ) । (२) युजिर् = योगे धातु रुधादि गणीय ( उभयपदी ) । (३) युज् = संयमने धातु चुरादिगणीय ( परस्मैपदी ) । किन्तु युज् ( समाधौ ) दिवादिगणीय आत्मनेपदी धातु ही योग शब्द के अर्थ की सम्यकतया पुष्टि करता है । योगसूत्र के अनुसार योग क्या है ? वह बताया गया है कि - योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः अर्थात् योग चित्त ( मन ) की वृत्तियों का निरोध ( निराकरण ) करता है । हम जिस विषय पर चर्चा कर रहे हैं । उसका सम्बन्ध भी चित्त से ही है। एक और मुख्य बात कही गयी है कि योगः समाधिः , स च सार्वभौमश्चित्तस्य धर्मः । अर्थात् योग समाधि है और वह चित्त की सभी वृत्तियों में सार्वभौम धर्म से रहता है । चित्त की पाँच भूमियाँ बतायी गयी हैं - क्षिप्त , मूढ़, विक्षिप्त , एकाग्र और निरुद्ध । यदि दर्शन की भाषा में समझें तो इसके अर्थ गूढ हो जाते हैं तथा सामान्य जनमानस के पटल से ओझल हो जाते हैं। किन्तु सामान्य रूप से देखें तो हमें प्रतीत होता है कि ये हमारी मानसिक अवस्थायें ही हैं। जो क्षण - प्रतिक्षण परिवर्तित होती रहती हैं । 


इन पाँच भूमियों में से जो विक्षिप्त है। इसका बहुधा प्रयोग नकारात्मक रूप में देखा जाता है । जैसे - कोई मानसिक रूप से सामान्य अवस्था में नहीं है तो कह दिया जाता है कि वह मानसिक विक्षिप्तता का शिकार है और यह सत्य भी है । क्योंकि मन की अवस्थाएं ही हमें सामान्य व असामान्य बनाती हैं । जब हमारा मन शान्त नहीं होता है तो विभिन्न प्रकार के विचार आते हैं । किन्तु यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे मनोभाव कैसे हैं ? क्या हमें कोई ऐसी बात तो विचलित नहीं कर रही जो हमारे अनुरूप न हुयी हो या हमनें उसे प्राप्त नहीं किया। यदि इस प्रकार के भाव है तब जो भी विचार आयेंगे वो सकारात्मक नहीं होंगे और उस समय पर मानसिक स्थिरता व शान्ति की आवश्यकता होती है । आज विज्ञान भी इस बात को नकार नहीं सकता कि शान्ति प्राप्त करने का सबसे महत्वपूर्ण व सरल उपाय है ओंकार का उच्चारण या ध्वनि श्रवण । जो लोग आस्तिक प्रवृत्ति के हैं वो बात - बात में यह कहते हैं कि भगवान् को नाम लो सब ठीक हो जाएगा तथा जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते हैं तो इस ओंकार ध्वनि के तरंगों से भलीभाँति परिचित हैं तथा चिकित्सा के क्षेत्र में चौंकाने वाले साकारात्मक परिणाम आये हैं । योग दर्शन ओंकार को ईश्वर का वाचक मानता है ।यथा - तस्य वाचकः प्रणवः ॥ कुछ लोगों के मन में यह संदेह हो सकता है कि प्रणव का अर्थ ओम् है? इसकी भी प्रामाणिकता के साथ पुष्टि की गयी है । यथा - वाच्य : ईश्वरः प्रणवस्य - ईश्वरः , प्रणवस्य ओम् इति । मानसिक समस्याओं के कारण चूंकि हमारे शोध पत्र का विषय मानसिक समस्याओं को लेकर है तथा योग उनके समाधान में किस प्रकार से उपकारक है । 


योगसूत्र में मानसिक अव्यवस्थाओं की उत्पत्ति के हेतु ( कारण ) बताये गये हैं। जोकि इस प्रकार हैं - व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादाSSलस्याSविरतिभ्रान्तिदर्शनाSलब्धभूमिकत्वाSनवस्थितत्वानि चित्त विक्षेपास्तेSन्तरायाः ॥ ये नव अन्तराय ( विघ्न ) हैं । जो चित्त में उत्पन्न होते हैं । व्याधि ( शारीरिक पीड़ा ) , स्त्यान ( अकर्मण्यता ) , संशय ( सन्देह ) , प्रमाद ( असावधानी ), आलस्य , अविरति ( लोलुपता ) , भ्रान्तिदर्शन ( मिथ्याज्ञान ), अलब्धभूमिकत्व ( चित्त भूमि में अस्थिरता ) इत्यादि । वर्तमानकालिक जो भी समस्याएँ हैं । उनके पीछे यही नव विघ्न हैं । इनके साथ ही कुछ और पुच्छभूत आते हैं । यथा - दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेप सहभुवः ॥ और आगे यह भी बताया गया है कि उन विघ्नों के निवारणार्थ उपाय भी निर्दिष्ट है। यथा - तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥ अर्थात् मन ( चित्त ) की एकाग्रता के लिए अभ्यास करना चाहिए । अब हम अपना दृष्टि निक्षेप करेंगे अष्टांग योग पर । वो कौन - कौन से हैं ? महर्षि पतंजलि कृत योगसूत्र जो चार भागों में विभक्त है - समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद, कैवल्यपाद । साधनपाद के अन्तर्गत अष्टांगयोग का वर्णन किया गया है । यथा - यमनियमाSSसनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाध्योSष्टावङ्गानि ॥ इसमें से पाँच बहिरङ्ग हैं तथा तीन अन्तरङ्ग । यदि इन पाँचों पर ही ध्यान दिया जाये तो समस्त मानसिक समस्याएं दूर हो सकती हैं । जैसे कि वर्तमान में रक्तचाप को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न प्रकार के प्राणायाम बताये जा रहे हैं । जबकि रक्तचाप का सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण कारण है चिन्ता । जोड़ो से सम्बन्धित दर्द निवारण हेतु आसन का निर्देश निर्देश चिकित्सकों द्वारा दिया जा रहा है। 


अवसाद की समस्या का सामना कर रहे लोगों के लिए ध्यान करने का निर्देश दिया जा रहा है । साथ ही खान - पान पर भी विशेष ध्यान देने का निर्देशन किया रहा है जो कि प्रत्याहार के अन्तर्गत आता है । श्रीमद्भगवत गीता में योग का स्वरूप श्रीमद्भगवत गीता में भी योग की विशद विवेचना की गयी है । भगवान् श्री कृष्णा स्वयं ही एक महायोगी के रूप में द्वापर युग में प्रकट हुए थे । उन्होंनेकुरुक्षेत्र मेंअर्जुन को तब गीता का उपदेश दिया जब युद्ध स्थल में वह विचलित हो गया तथा उसकी मनःस्थिति स्वयं के नियंत्रण में नहीं थी । अर्थात् हम सामान्य रूप से देखें तो समझ सकते हैं कि वर्तमान में जो समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं ।वह कहीं ना कहीं प्राचीन काल से ही उत्पन्न होती आ रही हैं। इसके निवारणार्थ ही श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया तथा उपदेश में योग की महत्ता का वर्णन किया । जिससे सामान्य मनुष्य उच्चकोटि को प्राप्त कर सकता है ,मात्र चित्त नियंत्रण से । श्रीमद्भगवत गीता के पांचवें अध्याय में श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है कि - स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ।॥ २७ ॥ यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८ ॥ अर्थात् समस्त इन्द्रियविषयों को बाहर करके, दृष्टि को भौंहों के मध्य में केन्द्रित करके, प्राण तथा अपान वायु को नथुनों के भीतर रोककर और इस तरह मन, इन्द्रियों तथा बुद्धि को वश में करके जो मोक्ष को लक्ष्य बनाता है वह योगी इच्छा, भय तथा क्रोध से रहित हो जाता है। जो निरन्तर इस अवस्था में रहता है, वह अवश्य ही मुक्त है। वर्तमान में हम जो योग के आसन करते हैं, उस संबंध में विभिन्न प्रकार के निर्देश दिए जाते हैं । जैसे - खाली पेट योगासन करना चाहिए,शांत वातावरण व सुरम्य प्राकृतिक दृश्य होना चाहिए । ये निर्देश मनगढ़ंत नहीं हैं , अपितु इसका भी प्रमाण श्रीमद्भगवत गीता के छठे अध्याय में प्राप्त होताहै । जो इस प्रकार है - तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ।। १२ ।। अर्थात् योगाभ्यास के लिए योगी एकान्त स्थान में जाकर भूमि पर कुशा बिछा दे और फिर उसे मृगछाला से ढके तथा ऊपर से मुलायम वस्त्र बिछा दे। आसन न तो बहुत ऊँचा हो, न बहुत नीचा। यह पवित्र स्थान में स्थित हो। योगी को चाहिए कि इस पर दृढ़तापूर्वक बैठ जाय और मन, इन्द्रियों तथा कर्मों को वश में करते हुए तथा मन को एक बिन्दु पर स्थिर करके हृदय को शुद्ध करने के लिए योगाभ्यास करे । 


यदि हमारा जीवनशैली व दिनचर्या संयमित व नियमित है तो हमें किसी भी प्रकार की मानसिक व कायिक असमानताओं का सामना नहीं करना पड़ेगा । किंतु ऊपर ही कहा जा चुका है कि विभिन्न प्रकार की मानसिक बीमारियों का कारण हमारी अस्त- व्यस्त दिनचर्या और अनुचित खान-पान है । योग सूत्र में उसे प्रत्याहार के रूप में निर्दिष्ट किया गया है तथा श्रीमद्भगवत गीता में भी इसके प्रमाण प्राप्त होते हैं । यथा - युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥ अर्थात् जो खाने, सोने, आमोद-प्रमोद तथा काम करने की आदतों में नियमित रहता है, वह योगाभ्यास द्वारा समस्त भौतिक क्लेशों को नष्ट कर सकता है। चिंता से विमुक्त रहना ही मानसिक स्थिरता का परम कारण है । क्योंकि वर्तमान में जितनी भी मानसिक विकृतियां उत्पन्न हो रही हैं । जिससे आज लगभग 85% जनता इन समस्याओं का सामना कर रही है । उनके समाधान का एकमात्र उपाय है योग । इस संबंध में श्रीमद्भगवत गीता में एक प्रमाण द्रष्टव्य है - अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥ मेरा ऐसा भक्त जो सामान्य कार्य-कलापों पर आश्रित नहीं है, जो शुद्ध है, दक्ष है, चिन्तारहित है, समस्त कष्टों से रहित है और किसी फल के लिए प्रयत्नशील नहीं रहता, मुझे अतिशय प्रिय है। इस प्रकार से हमनें विभिन्न प्रमाणों के माध्यम से योग को महत्ता व उपयोगिता पर प्रकार डाला । वास्तव में योग हमारे ऋषि - मुनियों द्वारा दी हुयी अक्षय पूंजी व सम्पदा है । जिसका सदुपयोग कर आनन्दमय जीवन व्यतीत किया जा सकता है ।  ११ जून २०१४ को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा प्रत्येक वर्ष २१ जून को विश्व योग दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया । तात्कालिक प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी ने इस दिशा में सराहनीय प्रयास किया । क्योंकि योग तो भारत के रोम - रोम में बसा है । हमारे भारतीय शास्त्रीय ग्रन्थों में विभिन्न प्रकार के धरोहरों को संभालकर रखा गया है । प्रथम बार योग दिवस भारत में २१ जून २०१५ को सामूहिक रूप से मनाया गया । चूंकि विश्व वर्तमान में भयावह समस्याओं से गुजर रहा है जिसके निराकरण के लिए प्राचीन पद्धति को अपनाकर महनीय कदम उठाया गया जोकि वर्तमान की आवश्यकता है । योग से काया निरोगी रहेगी । क्योंकि कहा भी गया है कि शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम् । अर्थात् समस्त धर्मों के सम्पादनार्थ स्वस्थ शरीर का होना परमावश्यक है ।





संजय गोस्वामी

स्तंभकार

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