उन्होंने युवराज सिंह (15 वर्ष 57 दिन) का रिकॉर्ड तोड़ दिया, जबकि अलीमुद्दीन का रिकॉर्ड अब भी कायम है, जिन्होंने 1942–43 सीज़न में राजपुताना की ओर से 12 वर्ष और 73 दिन की आयु में पदार्पण किया था। हम लोगों ने अपने दौर में ग्राउंड में खुब प्रैक्टिस की यहाँ तक की मैं जिला स्तर पर 1989 में खेला अच्छी बल्लेबाजी की जो बस एक मनोरंजन के लिए हुआ क्योंकि उस समय टीम इंडिया में रणजी ट्रॉफी के बाद भी मौका नहीं मिलता था लेकिन जब हम लोग अपने समय 1985 के दौर में खेला करते थे तो वहाँ भी उस समय नए अच्छे क्रिकेटर भी खेला करते थे मुझे याद है कि हम लोग अपने नानी घर नयागांव में खाना खाने के बाद आम के पेड़ के निचे क्रिकेट खेलते थे वहाँ भी ग्राउंड था लेकिन उसमें बहुत अच्छा खेल सिर्फ मनोरंजन के लिए हुआ करता था कुछ वहाँ के लोग देखते और शाबाशी देते थे उस समय ना हेलमेट था ना सही मजबूत जूता और पैड बस काम चल जाता था लेकिन क्रिकेट में बैटिंग और बॉलिंग दोनों करना सभी पसन्द करते थे भले ही स्पिन हो जो ऊपर क्रम के बल्लेबाज होते वो ज्यादातर स्पिन बॉलिंग ही करते ताकि थकान कम हो दरअसल क्रिकेट में दो मुख्य बैटिंग और बॉलिंग और बारी-बारी से होने वाली विधाएँ हैं, जिनमें बैटिंग करने वाली टीम के खिलाड़ी रन बनाने की कोशिश करते हैं, और फील्डिंग करने वाली टीम के बॉलर गेंद को इस तरह फेंकने की कोशिश करते हैं कि बैटर आउट हो जाएँ या रन बनाने से रुक जाएँ। हालांकि विकेटकीपिंग भी बहुत अच्छा होता है क्योंकि हमसे अगर पूछिए तो सबसे मेहनत का काम विकेटकीपिंग का होता है नयागांव से हमलोग छपरा के मैदान से एक अच्छी टीम के साथ खेलने निकलें रात भर खूब प्रैक्टिस किया और 5 बजे सुबह की ट्रेन से 2घंटे में छपरा पहुँच गए वहाँ भी टीम तैयार थी मैदान में बहुत से लोग मैच देखने आए थे हमारी टीम टॉस हार गई और पहले बल्लेबाजी के लिए आमंत्रित किया मेरे भाईसाहब और उनके दोस्त ने ओपनिंग की उस समय हम लोगों ने गलब्स पैड बॉल अच्छे क्वालिटी के लिए थे और एक हार्ड प्लास्टिक के कैप को अंदर डालते थे।
शुरुआत में एक तेज गेंदबाज ने पहली ही बॉल पर बोल्ड कर दिया और उस ओवर में मात्र 3 रन ही बना दूसरे ओवर में एक और विकेट रन आउट हो गया और 5 रन बने फिर 3 ओवर में 1और कैच आउट ठीक बाउंड्री लाइन पर हुआ 5 ओवर में तीन विकेट पर 14 रन था जैसे ही 30 रन पर एक स्टंप आउट हुआ मुझे मौका मिला खेलने का और पहली ओवर में एक कट मारा जो बाउंड्री लाइन पर रोका गया मैं लेफ्ट हैंड से बैटिंग करता था फिर हमने देखा बॉल में बहुत गति है तो छोड़ दिया और कभी वाइड तो कभी विकेटकीपर से छूटता और 4 रन बाई में मिल जाता था फिर एक बॉल आया और गलती से टच हुआ और कैच हुआ इस तरह 30 ओवर के मैच में कुल 102 रन बने दूसरी टीम को बल्लेबाजी के लिए उतरा तो उसके भी विकेट गिरते कभी स्कोर बढ़ता रहा एक समय 94 रन पर 6 विकेट था तो ऐसा लग रहा था मैच हाथ से निकल गया लेकिन हारते देख मुझे बोलिंग दिया और मेरे एक ओवर में दो फूल टॉस बॉल पर दो कैच हुआ और उस ओवर में मात्र 4 रन मिला अब दबाब बैट्समैन पर आया और 8 विकेट गिर चूंके थे अब जीत के लिए 4 रन की जरुरत थी तभी दूसरे गेंदबाज ने तेज बॉल की और एक और विकेट गिरा जो विकेटकीपर के हाथों कैच हुआ और अंतिम बल्लेबाज मात्र एक रन पर एलबीडब्लू आउट हुआ मैच 1 रन से जीत गया फिर वहाँ के विधायक ने ट्राफ़ी दि उस दिन इतना थकने के बावजूद नींद नहीं आया बाद में पटना सिटी कॉलेज में एक ग्राउंड था वहाँ हमलोग दोस्तों के साथ मिलकर खेला करते और मेरी आदत थी बॉल को स्वीप करना कभी शून्य पर आउट कभी 50 रन के ऊपर बन जाता था एक बार पटना के मोनुलहक़ स्टेडियम में रेलवे और सहकारी विभाग बिहार सरकार ने एक टीम बना कर मैच कराया था जिसमें कपिलदेव, अमरनाथ, सबाकरीम, मनिंदर सिंह जैसे खिलाड़ियों ने भाग लिया जो 4 दिन तक चली और मैं वहाँ पहली बार स्टेडियम में मैच देखने गया वह समय था 1987 के विश्वकप से पहले का और मेरे सामने मनिंदर सिंह दिखे और ऑटोग्राफ लिया वहाँ मैंने अपने ही स्थल पर स्टेडियम में 6 लगती बॉल को पकड़ लिया था और टीवी में मैच देखने का मजा अलग था बाद में जब 1991 के आसपास टेनिस बॉल का जमाना आया तो खुब मजा आया उसमें छोटे बच्चे से लेकर बड़े सभी खेलते थे मेरी बैटिंग काफी प्रैक्टिस के बाद सुधार हुआ और जब मुंबई में नौकरी लगी और 1998 में यहाँ भी अनुशक्तिनगर के ग्राउंड पर अच्छी बल्लेबाजी की और एक ड्राइव कर शानदार कैच पकड़ लिया था।
एक मैच जो 1999 में डी ए ई बनाम आईएएस अफसर का मैच था जिसमें जाने माने परमाणु वैज्ञानिक डॉ आर चिदंबरम साहब थे उसमें किसी खिलाड़ी के चोट लगने पर चिदंबरम साहब ने मुझे सुबटिटूयूट के तौर पर रखा मैंने कहा आप मुझे कैसे जानते हैं तभी उनकी यादास्त इतनी तगड़ी थी कि उन्होंने कहा भाभा ऑडिटोरियम में मई 1998 के पोखरण परीक्षण में मैं जब उस सफलता की वैज्ञानिक जानकारी दे रहा था तो आपने ही मंच से मेरे सम्मान में एक कविता पढ़ी लेकिन इसमें मेरा नहीं टीम का योगदान था और मैं यहाँ अकेले नहीं टीम के साथ खेल रहा हूँ आप जवान है और अच्छा फील्डिंग करेंगे वो हाफ टाइम था बाद में मैं फील्डिंग करने गया और जब बॉल तेजी से मेरे पास आता तो उससे पहले ही लेट जाता और 10 रन तो बचे कुछ लोग ऐसा देख कर हॅसते भी थे और उस समय मुझे याद है बाउंड्री पर जब किसी बल्लेबाज ने गेंद ठोका तो वहाँ एक ही हाथ से अचानक मेरे हाथ में बॉल फंस गई और बाद में डीएई 5 रन से जीता था जब आप प्रैक्टिस करते हैं तो समझ में आता है किसे मारना है टप्पा खा कर कहाँ गिर सकती है और कैसे मारना है हमने एक बात ग़ौर की कि उस समय यदि आईपीएल होता तो कुछ लोग को अवसर मिल सकता था क्योंकि वो सुबह से शाम तक ग्राउंड पर ही समय निकाल देते थे उस समय 1987 के वर्ल्ड कप में ब्लैक एंड वाइट टीवी पर देखने का अलग मजा था गांव में पोर्टबल टीवी होती और बिजली रहे ना रहे कार बैटरी से मैच देख लेते थे अब नए ज़माने में क्रिकेट खेल और फैशन दोनों हो गया है लेकिन उस समय क्रिकेट एक खेल था जब 1987 में इंग्लैंड और इंडिया का सेमीफइनल हुआ तो इंडिया जीतते जीतते रह गया 251 रन का टारगेट था और इंडियन बल्लेबाज कभी आउट होते कभी टिके रहते सारी उम्मीद कपिलदेव पर टिकी थी लेकिन 35 रन बनाकर जैसे ही आउट हुए विकेट गिरना चालू हो गया और टीम कुछ रनो के अंतर से हार गई सब जगह मायूसी था सुबह निकला तो क़ोई चेतन शर्मा की बैटिंग पर अफ़सोस कर रहा था तो क़ोई किरण मोरे तो क़ोई कपिलदेव पर और पुरी दिन यही चर्चा चली उस समय हमलोग पटना के मंगल तालाब और सिटी स्कूल के ग्राउंड में मैच खेलते थे अच्छा मैच होता उस समय बल्ला भी मामलू होता और गेंद भी काफी हार्ड होता था अगर गलती से लगा तो सर फट जाएगा मुझे अच्छा बल्ला खरीदने का मन तो बहुत था लेकिन पैसे की कमी से वो लकड़ी वाला ही चल जाता था बाद में मेरे मामा ने जो कोलकत्ता में रहते थे उन्हें भी क्रिकेट में रूचि थी एक कायदे का बैट ख़रीदा था।
कड़ी मेहनत, अभ्यास और बल्लेबाज़ के ख़िलाफ़ कैसे खेलना है, इसके लिए थोड़ी समझदारी—ये सब ज़रूरी हैं। बिना अभ्यास के आप 'लाइन और लेंथ' पर महारत हासिल नहीं कर पाएँगे, जो बल्लेबाज़ को हराने की कुंजी है। क्रिकेट में आपकी 'लाइन और लेंथ' की बुनियादी बातें सही होनी चाहिए। गेंद में एक 'लूप' (घुमाव) होना चाहिए। यह लूप—जिसे हम पहले 'फ़्लाइट' कहते थे—लगातार बना रहना चाहिए। समय के साथ, आप इस लूप को बढ़ाते हैं और इसे अपने हिसाब से ढालते हैं। आप पहले बल्लेबाज़ को एक जगह पर रोकते हैं और फिर अपना जाल बिछाते हैं—और वह धीरे-धीरे उसमें फँस जाता है। लेकिन ये बातें इतनी आसानी से नहीं सीखी जातीं। शीर्ष स्तर तक पहुँचने के लिए सालों-साल की मेहनत लगती है। "लाइन, लेंथ और नियंत्रण केवल बहुत ज़्यादा कड़ी मेहनत और अभ्यास से ही हासिल किया जा सकता है। कोई भी आपको यह सिखा नहीं सकता।" आईपीएल के 2026 के मैच में रॉयल चैलेंर्जर बगलौर जीती तो जरूर है लेकिन गुजरात टाइटन ने कुछ धीमा खेला और रन ज्यादा बना ही नहीं पायी क्योंकि गुजरात टाइटन ने मात्र 154 रन का स्कोर किया जो 20-20 के क्रिकेट में मामूली स्कोर होता है राशिद खान को बाद में लाया गया अगर 2 सरें या तीसरे ओवर में लाते तो 1-2 विकेट जब उस समय गिरते तो दबाब होता और बाद में रोमांचक हो सकता था क्योंकि यह पिच में स्पिन था लेकिन जीत तो जीत है विराट कोहली ने शानदार पारी खेली बाद में मैच एक तरफ़ा हो गया चलो क़ोई भी जीते टीम तो इंडिया के राज्यों के नाम पर है इसलिए इसमें मनोरंजन हुआ. आर सी बी को जीत की बधाई व शुभकामनायें।
संजय गोस्वामी
दूँदी बाजार
पटना


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