विशेष : सुगौली संधि से पूर्व नेपाल का क्रमिक इतिहास - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

रविवार, 7 जून 2026

विशेष : सुगौली संधि से पूर्व नेपाल का क्रमिक इतिहास

प्रागैतिहासिक काल

History-of-nepal
हिमालय क्षेत्र में मनुष्यों का आगमन लगभग 9,000 वर्ष पहले होने के तथ्य की पुष्टि काठमाण्डू घाटी में पाये गये नव पाषाण औजारौं से होती है। सम्भवतः तिब्बती-बर्मीज मूल के लोग नेपाल में 2,500  वर्ष पहले आ चुके थे।


नेपाल का इतिहास 

प्राचीन काल के नेपाल में छोटे राज्यों, मध्ययुगीन राजवंशों, गोरखा एकीकरण, राणा शासन के अत्याचार और अंततः एक आधुनिक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य में बदलने की एक लंबी और संघर्षपूर्ण यात्रा मिलती है। नेपाल के इतिहास के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं-


1. प्राचीनकाल प्रारंभिक निवासी

नेपाल में सबसे पहले दक्षिण भारत से द्रविड़ लोग आए थे बाद में तिब्बती-बर्मी और इंडो-आर्यन लोग यहां आकर बसे। 1500 ईशा पूर्व के आसपास इन्डो-आर्यन जतियों ने काठमाण्डू घाटी में प्रवेश किया था। करीब 1,000 ईसा पूर्व में अनेक छोटे-छोटे राज्य और राज्य संगठन बनें। सिद्धार्थ गौतम (ईसा पूर्व 563- 483) शाक्य वंश के राजकुमार थे, जिन्होंने अपना राजकाज त्याग कर तपस्वी का जीवन निर्वाह किया था और वह बुद्ध बन गए थे।


2. गौरवपूर्ण प्राचीन काल

नेपाल, जिसे एशिया के सबसे प्राचीन देशों में से एक माना जाता है, को यह सौभाग्य प्राप्त है कि अपने इतिहास में कभी भी किसी अन्य देश या धार्मिक समूह द्वारा उपनिवेश नहीं बनाया गया। 


नेपाल विश्व शक्तियों (अमेरिका, चीन और भारत सहित) के लिए दो मुख्य कारणों से केंद्र बिंदु बना रहा है

(क) हिमालयी नदियों के जल, खानों और जैविक संसाधनों जैसे नेपाल के संसाधनों का दोहन किया जाना।

 (ख) अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिए नेपाली भूमि का सैन्य उपयोग किया जाना। 


नेपाल, एक अहिंसक और स्वतंत्र देश होने के बावजूद, लगभग 300 वर्ष पूर्व साम्राज्यवादी शक्तियों (अर्थात ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी) के साथ संघर्ष करने लगा था। नेपाल का प्राचीन काल सभ्यता, संस्कृति और र्शार्य की दृष्टि से बड़ा गौरवपूर्ण रहा है। प्राचीन काल में नेपाल राज्य की बागडोर क्रमश: गुप्तवंश किरात वंशी, सोमवंशी, लिच्छवि वंशी और सूर्यवंशी राजाओं के हाथों में रही है। किरात वंशी राजा स्थुंको, सोमवंशी लिच्छवी, राजा मानदेव, राजा अंशुवर्मा के राज्यकाल बड़े गौरवपूर्ण रहे हैं। कला, शिक्षा, वैभव और राजनीति के दृष्टिकोण से लिच्छवि काल 'स्वर्णयुग' रहा है। जन साधारण संस्कृत भाषा में लिख पढ़ और बोल सकते थे। राजा स्वयं विद्वान्‌ और संस्कृत भाषा के मर्मज्ञ होते थे। 


3. 'पैगोडा' शैली की वास्तुकला की प्रधानता

'पैगोडा' शैली की वास्तुकला नेपाल में बड़ी उन्नत दशा में थी और यह कला सुदूर महाचीन तक फैली हुई थी। मूर्तिकला भी समृद्ध अवस्था में थी। धार्मिक सहिष्णुता के कारण् हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म समान रूप से विकसित हो रहे थे। काफी वजनदार स्वर्णमुद्राएँ व्यवहार में प्रचलित थीं।विदेशों से व्यापार करने के लिए व्यापारियों का अपना संगठन भी था। वैदेशिक संबंध की सुदृढ़ता वैवाहिक संबंध के आधार पर कायम थी।


4. भारतीय साम्राज्यों का प्रभाव

लिच्छवी राजवंश चौथी से आठवीं शताब्दी के मध्य था। इसे नेपाल का 'स्वर्णिम युग' माना जाता है। इसी काल में कला, व्यापार और बौद्ध व हिंदू धर्म का तेजी से विकास हुआ। स्वयंभूनाथ जैसे प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण इसी काल में हुआ। 250 ईशा पूर्व तक इस क्षेत्र में उत्तर भारत के मौर्य साम्राज्य का प्रभाव पडा। सम्राट अशोक नेपाल में कई महत्वपूर्ण स्थापनाओं के निर्माण के लिए जिम्मेदार थे। इनमें शामिल हैं रामग्राम का स्तूप, गोटिहवा स्तंभ, निगली सागर अभिलेख, और लुम्बिनी स्तंभ अभिलेख। चीनी तीर्थ यात्री फाह्यान (337–422 ई.) और ह्वेन त्सांग (602– 664 ई.) में अपनी यात्रा के वर्णन में नेपाल क्षेत्र के कनक मुनि स्तूप और अशोक स्तम्भ का उल्लेख करते हैं। ह्वेन त्सांग ने स्तम्भ के शीर्ष पर सिंह की मूर्ति का उल्लेख किया है। गोटिहवा पर एक अशोक स्तम्भ का आधार मिला है, जो निगली सागर से कुछ मील दूर है। यह निगली सागर स्तम्भ का आधार था। इस क्षेत्र में पांचवी शताब्दी के उत्तरार्ध में आकर वैशाली के लिच्छवियो के राज्य की स्थापना हुई थी। 


5. मध्यकाल में नेपाल

8वी शताव्दी के उत्तरार्ध में लिच्छवि वंश का अस्त हो गया और सन् 879 ई से नेवार (नेपाल की एक जाति) युग का उदय हुआ था। नेवार एक विशिष्ट भाषाई और सांस्कृतिक समूह हैं, जो मुख्य रूप से इंडो-आर्यन और तिब्बती-बर्मी जातीय समूह हैं, जिनकी एक सामान्य नेपाल भाषा है, और वे मुख्य रूप से नेवार हिंदू धर्म और नेवार बौद्ध धर्म का पालन करते हैं। इन लोगों का नियन्त्रण देश भर में कितना बना था, इसका आकलन कर पाना मुश्किल है। 

मल्ल राजाओं ने काठमांडू घाटी में शासन किया और इसे नेवार संस्कृति का केंद्र बनाया। उन्होंने पशुपतिनाथ मंदिर और विभिन्न पैगोडा शैली के मंदिरों का निर्माण कराया था। 

ई.सन्‌ 880 में लिच्छवि राज्य की समाप्ति पर नुवाकोटे ठकुरी राजवंश का अभ्युदय हुआ। इस समय नेपाल राज्य की अवनति प्रारंभ हो गई थी। केंद्रीय शासन शिथिल पड़ गया था। फलत: नेपाल अनेक राजनीतिक इकाइयों में विभाजित हो गया। हिमालय के मध्य कछार में मल्लों का गणतंत्र राज्य कायम था। लिच्छवि शासन की समाप्ति पर मल्ल राजा सिर उठाने लगे थे।

11वी शताब्दी के उत्तरार्ध में दक्षिण भारत से आए चालुक्य साम्राज्य का प्रभाव नेपाल के दक्षिणी भू भाग में दिखा था। चालुक्यों के प्रभाव में आकर उस समय राजाओं ने बौद्ध धर्म को छोडकर हिन्दू धर्म का समर्थन किया और नेपाल में धार्मिक परिवर्तन होने लगा।

13वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में संस्कृत शब्द “मल्ल” कुल नाम वाले राजवंश का उदय होने लगा। 200 वर्ष में इन राजाओं ने शक्ति एकजुट की। 

14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में देश का बहुत ज्यादा भाग एकीकृत राज्य के अधीन में आ गया। लेकिन एकीकरण कम समय तक ही टिक सका था। 

सन्‌ 1350 ई. में बंगाल के शासक शमशुद्दीन इलियास ने नेपाल घाटी पर बड़ा जबरदस्त आक्रमण किया था। उस समय धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था अस्त व्यस्त हो गयी। 


6. तीस रियासतों में विभाजित

सन्‌ 1480 ई. में अंतिम वैश राजा अर्जुन देव (अर्जुन मल्ल देव ) को उनके मंत्रियों ने पदच्युत करके स्थितिमल्ल नामक राजपूत को राज सिंहासन पर बैठाया था। इस समय तक केंद्रीय राज्य पूर्ण रूप से छिन्न-भिन्न होकर काठमाडू, गोरखा, तनहुँ, लमजुङ, मकबानपुर आदि लगभग तीस रियासतों में विभाजित हो गया था। 1482 में ये राज्य तीन भाग में विभाजित हो गये थे - कान्तिपुर, ललितपुर और भक्तपुर – जिसके बीच मे शताव्दियौं तक मेल नहीं हो सका। राजा स्थितिमल्ल अस्त व्यस्त आर्थिक, धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में पूर्ण रूप से समर्थ हुए। राजा पक्षमल्ल ने केंद्रीय शासन को सुदृढ़ करने का प्रयत्न किया, किंतु उनके निधन पर पश्चात्‌ उनके उत्तराधिकारियों ने राज्य को आपस में बाँटकर पुन: राजनीतिक इकाइयाँ खड़ी कीं। 


7. साम्राज्य से पहले का नेपाल

प्राचीन काल से ही नेपाल के अविभाजित भारत और चीन दोनों के साथ आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध रहे हैं। विभिन्न शासकों के बीच सामाजिक संबंधों में दरार आने और 16वीं शताब्दी के अंत तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की बढ़ती शक्ति के कारण भारत के साथ व्यापारिक संबंधों में प्रभुत्व बढ़ने से 1400 ईस्वी के बाद चीन के साथ संबंध बिगड़ने लगे। मध्य कालीन नेपाल साहित्य, संगीत और कला की दृष्टि से उन्नत होने पर भी राजनीतिक दृष्टि से अवनति की ओर ही बढ़ा। जनजीवन अशांत था। यूरोपीय साम्राज्य वादियों की कुदृष्टि भारत के पश्चात्‌ नेपाल पर भी पड़ गई थी। नेपाल के विरुद्ध किनलोक का सैनिक अभियान और घाटी में ईसाई पादरियों की चहल पहल इस तथ्य के प्रमाण हैं।


8. आधुनिक गोरखा राज्य की स्थापना

गोरखा राज्य इन दिनों काफी सबल हो चुका था। नेपाल की छोटी -छोटी राजनीतिक इकाइयों पर और नेपाली जनजीवन पर गोरखा राज्य का प्रभाव छा गया था। न्यायमूर्ति राजा राम शाह के न्याय की चर्चा नेपाल भर में फैल गयी थी। राजा पृथ्वी पति शाह के राज्यकाल में बंगाल के नवाब ने गुर्गिन खाँ के नेतृत्व में नेपाल पर आक्रमण करने के लिए पचास साठ हजार फौज भेजी थी। नवाब की सेना मकवान पुर के तराई क्षेत्र में पड़ाव डाले हुई थी। मकबानपुर ने गोरखा राज्य से सहायता की याचना की। गोरखा के कुछ जवानों ने नवाब की सेना को गाजर मूली की तरह काट डाला। बचे हुए सैनिक अपनी जान बचाकर भाग निकले। उपर्युक्त इन दो कारणो से गोरखा राज्य नेपाली जन जीवन के सुखद भविष्य का आशा केंद्र हो गया था। जन जीवन की इस आकांक्षा को नेपाल राष्ट्र के जनक महाराजाधिराज पृथ्वीनारायण शाह ने समझा और नेपाल के एकीकरण के लिए अभियान प्रारंभ किया। मध्यकालीन नेपाल के अंतिम चरण में अर्थात्‌ राष्ट्र के जनक पृथ्वीनारायण शाह के उदय होने से पूर्व विदेशी लोग नेपाल पर दाँत गड़ाने लगे थे। नेपाल घाटी में पादरी लोग ईसाई धर्म का प्रचार करने लगे थे। मल्ल राजा आपसी फूट-वैमनस्य, झगड़ा, युद्ध आदि बातों में निरंतर व्यस्त थे।


1765 ई मे, गोरखा के शाह वंशी राजा पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल के छोटे छोटे बाइस व चोबिस राज्य के ऊपर चढाँइ करते हुए उन्हें एकिकृत किया, बहुत ज्यादा रक्तरंजित लडाँईयौं पश्वात उन्हौने तीन वर्ष बाद कान्तीपुर, पाटन व भादगाँउ के राजाओं को हराया और अपने राज्य का नाम गोरखा से नेपाल में परिवर्तित किया। कान्तिपुर विजय के लिये तीन बार युद्ध करना पडा, महान्पि सेनानायक कालू पाण्डे भी इस युद्ध में शहीद हो गए। पृथ्वीनारायण शाह ने कूटनीति अपनाकर नेपाल घाटी के बाहर के देशों से लडाई की  और कीर्तिपुर में नाकाबन्दी कर दिया, पानी का मूल भी बन्द कर दिया अन्तिम या तीसरी बार में उन्हे कान्तिपुर विजय में कोई युद्ध नहीं करना पड़ा। वास्तव में, उस समय इन्द्रजात्रा पर्व में कान्तिपुर की सभी जनता फसल के देवता भगवान इन्द्र की पूजा और महोत्सव (जात्रा) मना रहे थे, जब पृथ्वी नारायण शाह ने अपनी सेना लेकर धावा बोला और सिंहासन पर कब्जा कर लिया। इस घटना को आधुनिक नेपाल का जन्म भी कहते है। गोरखा के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने 25 सितंबर 1768 में काठमांडू घाटी को जीतकर आधुनिक नेपाल (शाह राजवंश) की नींव रखी और इसे देश की राजधानी बनाया। उन्होंने काठमांडू ,पाटन और भक्तपुर राज्यों को अपने शाह वंश के अंतर्गत एक राज्य में एकीकृत करने में सफलता प्राप्त की थी। अपने इतिहास के अधिकांश समय तक नेपाल राज्य विधिवत रूप से एक निरंकुश राजतंत्र था। 1768 तक नेपाल 54 छोटे राज्यों में विभाजित था। नेपाल के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने इन राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया और नेपाल राज्य की स्थापना की। इस दौरान, नेपाल ने तत्कालीन ब्रिटिश भारत के साथ कई युद्ध लड़े। 


 नेपाल ने सैन्य रूप से मजबूत ब्रिटिश भारत को अधिकतर बार हराया और भारत के पड़ोसी क्षेत्रों में अपना नियंत्रण बढ़ाया, जहाँ नेपाली संस्कृति और भाषाएँ काफी हद तक प्रचलित थीं। नेपाल घाटी के बाहर के राज्य भी आपस में लड़-झगड़कर अपनी जन- धन-शक्ति को क्षीण कर रहे थे। राजाओं ने आपसी झगड़े, मल्ल राजाओं द्वारा देव- मंदिर की संपत्ति का व्यक्तिगत उपभोग, राजा भास्कर मल्ल द्वारा हिंदू भावना के विरुद्ध एक मुसलमान को प्रधान मंत्री बनाने का कार्य आदि मध्य कालीन राजनीतिक स्थिति को धूमिल बनाते हैं और साथ ही नेपाल की सार्वभौम स्वतंत्रता को अधर में डाल देते हैं। शमशुद्दीन इलियास के आक्रमण के पश्चात्‌ राजा स्थितिमल्ल ऐतिहासिक आवश्यकता के रूप में दिखाई पड़ते हैं उसी प्रकार साम्राज्यवादियों से नेपाल का बचाने वाले के रूप में पृथ्वीनारायण शाह ऐतिहासिक आवश्यकता स्वरूप दिखलाई पड़ते हैं। नेपाली गोरखों ने 1790 में तिब्बत पर आक्रमण किया किंतु यह आक्रमण नेपाल को महँगा पड़ा। चीन ने 1791 में तिब्बत का पक्ष लेकर अपनी सेनाएँ नेपाल में प्रविष्ट करा दीं और 1792 में गोरखों को संधि करने पर विवश किया। इसी वर्ष ग्रेट ब्रिटेन और नेपाल में द्वितीय वाणिज्य संधि संपन्न हुई और नेपाल में एक अंग्रेज कूटनीतिज्ञ की नियुक्ति की व्यवस्था हो गई थी ।





आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी, 

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती

मोबाइल नंबर +91 9412300183

कोई टिप्पणी नहीं: