रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में heat stress से होने वाले कुल work hour losses का लगभग 63.5 प्रतिशत हिस्सा agricultural workers से जुड़ा था। Low Human Development Index वाले देशों में यह आंकड़ा 75 प्रतिशत से ज्यादा पहुंच जाता है। यानी दुनिया का सबसे vulnerable workforce वही है जो दुनिया का खाना उगाता है। ECIU के Head of International Programme Gareth Redmond-King कहते हैं कि climate change अब सिर्फ फसलों को नहीं, बल्कि उन लोगों को भी प्रभावित कर रहा है जो खेतों में काम करते हैं। उनके मुताबिक भारत जैसे देशों में जहां तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जा रहा है, वहां बाहर काम करना खतरनाक होता जा रहा है। वे कहते हैं कि इससे स्वास्थ्य, livelihoods और steady food supplies तीनों खतरे में पड़ रहे हैं। World Meteorological Organisation यानी WMO ने आने वाले महीनों में एक शक्तिशाली El Niño बनने की संभावना 80 प्रतिशत बताई है। रिपोर्ट कहती है कि 2027 दुनिया का सबसे गर्म साल बन सकता है। यानी heat stress का संकट और गहरा सकता है। International Labour Organisation यानी ILO के मुताबिक 2024 में दुनिया के 71 प्रतिशत workers excessive heat के संपर्क में थे। एशिया में यह आंकड़ा लगभग 75 प्रतिशत, अरब देशों में 83 प्रतिशत और अफ्रीका में 93 प्रतिशत तक पहुंच गया।
भारत की rice farmer और Intercontinental Network of Organic Farmers की President Shamika Mone कहती हैं कि extreme heat खेती को पहले से ज्यादा मुश्किल बना रही है। उनके मुताबिक एक “super El Niño” फसलों को नुकसान पहुंचा सकता है और छोटे किसानों के सामने बड़ा संकट खड़ा कर सकता है। वे कहती हैं कि छोटे किसानों तक climate finance पहुंचाना और nature-friendly farming को बढ़ावा देना जरूरी है ताकि खेतों का तापमान कम किया जा सके और किसानों को extreme heat से कुछ राहत मिल सके। रिपोर्ट यह भी कहती है कि दुनिया के कई vulnerable देशों के पास climate adaptation की क्षमता सीमित है। यानी जिन देशों के किसान सबसे ज्यादा गर्मी झेल रहे हैं, वही उससे निपटने के लिए सबसे कम तैयार हैं। कई सालों तक climate change की चर्चा glaciers, floods और rising sea levels के इर्द-गिर्द होती रही। लेकिन अब इसकी सबसे बड़ी तस्वीर शायद खेतों में दिखाई दे रही है। जहां किसान काम रोकने के लिए नहीं, बल्कि गर्मी से बचने के लिए छांव ढूंढ रहा है। जहां सूरज सिर्फ मौसम नहीं, productivity तय कर रहा है। और जहां बढ़ती गर्मी धीरे-धीरे दुनिया के खाने के घंटे भी कम कर रही है।

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